कोरोना / देशभक्ति / सुविचार / प्रेम / प्रेरक / माँ / स्त्री / जीवन

यही सोचता हूँ (ग़ज़ल)

लिखूँगा तुम पे ग़ज़ल, हर रात यही सोचता हूँ।
बनेगी या नहीं कोई बात यही सोचता हूँ।।

तुमसे कुछ कह ना सका इसका मलाल है मुझको,
न जाने होगी कब मुलाक़ात यही सोचता हूँ।

तेरी ख़ामोश निगाहों पे ये ज़ुल्फ़ों की घटा,
कर ना दे फिर कहीं बरसात यही सोचता हूँ।

दिल के कोने में दुल्हन सा सजा देखा तुमको,
कौन आएगा लेकर बारात यही सोचता हूँ।

आँखों में आँसू होठों पे नग़्मा दिल में उदासी
होगी क्या इससे बुरी हालात यही सोचता हूँ।


पारो शैवलिनी
सृजन तिथि : 1980
अरकान : मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
तक़ती : 1222 1222 1222 122
            

रचनाएँ खोजें

रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें