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प्रेयसी का ख़त (कविता) Editior's Choice

बंद लिफ़ाफ़े में आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त
छुपते-छुपाते आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

लिफ़ाफ़े की कोर-कोर कुंद हो गई थी
लगता है सबसे लड़ के आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

आँसुओ का अंबार लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।
धड़कनों का हिसाब लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

मैं उसे पढूँ उससे पहले ही
नमी थी मेरी भी आँखों में,
लगता है पीड़ाओ का पहाड़ लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

कुछ हृदय के घाव, कुछ गुज़रे लम्हे
और कुछ मन के भाव
सब अंदाज़-ए-बयाँ लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।
शिकायतों का सार लेकर आया,
मेरी प्रेयसी ख़त।

व्याकुलता है ख़त पढ़ने को
फिर भी सिसक-सिसक के रोऊँ,
लगता है हादसो का ज्वार लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

शिकायतों का अम्बार लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।
भावनाओ का ज्वार लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

शायद चढ़ी हुई धड़कनों पर
अख़्तियार नही आज उनका,
इसलिए टेढे-मेढे सवाल लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

बोसो की बौछार लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त
होठो का आकार लेकर आया,
मेरी प्रेयसी ख़त।

अभी भी उनकी गर्माहट
बरकरार है मेरी साँसों में,
लगता है फिर से शाम-ए-बहार लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

पाज़ेब की झंकार लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त
चूड़ियों की खनकार लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

उनके झुमके पर थिरकती थी
मेरी प्रत्येक धड़कने,
लगता है धड़कनों का हिसाब लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

मिलन का पयाम लेकर आया,
मेरी प्रेयसी ख़त
आँखों का जाम लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

इस बार मिलकर
अख़्तर हो जाएँगे हम दोनों,
इसलिए मेहबूब का पैग़ाम लेकर आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

बंद लिफ़ाफ़े में आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त
छुपते छुपाते आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।

लिफ़ाफ़े की कोर-कोर कुंद हो गई थी
लगता है सबसे लड़ के आया,
मेरी प्रेयसी का ख़त।


मनोज यादव 'विमल'
सृजन तिथि : 2020
            

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