परिश्रम करता हूँ अविराम, बनाता हूँ क्यारी औ' कुंज।
सींचता दृग-जल से सानंद, खिलेगा कभी मल्लिका-पुंज।
न काँटों की है कुछ परवाह, सजा रखता हूँ इन्हें सयत्न।
कभी तो होगा इनमें फूल, सफल होगा यह कभी प्रयत्न।
कभी मधु राका देख इसे, करेगी इठलाती मधुहास।
अचानक फूल खिल उठेंगे, कुंज होगा मलयज-आवास।
नई कोंपल में से कोकिल, कभी किलकारेगा सानंद।
एक क्षण बैठ हमारे पास, पिला दोगे मदिरा-मकरंद।
मूक हो मतवाली ममता, खिले फूलों से विश्व अनंत।
चेतना बने अधीर मिलंद, आह वह आवे विमल वसंत।

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
सहयोग कीजिएप्रबंधन 1I.T. एवं Ond TechSol द्वारा
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें
