साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3615
जयपुर, राजस्थान
1952
मेरे भीतर हाथ से छूट कर गिरता है एक कप मुझे भी बिखेरता मन के फ़र्श पर चला नहीं गया है सब कुछ सांत्वना में कहता अपने आपसे कभी अंत नहीं होता उम्मीद का वह साबुत है : एक नया अदृश्य कप उठाता हूँ दिमाग़ की शेल्फ़ से और सामने टूटे-बिखरे हुए कप पर ख़ुद को समेटते हुए फिर लिखता हूँ...
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