साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3604
इन्दौर, मध्य प्रदेश
1946 - 2009
तुम्हारी हँसी होती तो चुप हो, छिप जाते हवा की ओट में हँसी होती अगर हवा पर रक़्साँ खिल जाते तारामंडलों के चुपचाप गुलाब छिप जाते तुम्हारी ओट में हँसी होती तो चुप्पी होती छिप जाते तारामंडलों की ओट में हवा में गुलाबों की महक रक़्सा होती तुम्हारी हँसी होती तो किस-किसकी हँसी होती हवा की ओट में गुलाब खिलते या मुरझाते हुए
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