वचन के दीप जलाकर तुम, अँधियारा सौंप गई,
सपनों की हर हरित डाल को, पतझारा सौंप गई,
जिसे समझा था जीवन-सरिता का अंतिम तट मैंने,
वह बीच भँवर में छोड़ मुझे, बस किनारा सौंप गई।
अब हँसता हूँ तो लगता है, जैसे कोई अभिनय हो,
हर उत्सव के पीछे छिपा, एक मौन-सा क्रंदन हो,
जो चेहरा दुनिया देख रही, वह मेरा चेहरा कब है,
अंतर में तो प्रतिपल केवल, स्मृतियों का दाहन हो।
मेरी आँखों के आँसू का अंतिम साक्षी तुम ही थीं,
मेरी टूटी उम्मीदों की अंतिम रागिनी तुम ही थीं,
अब जो पीड़ा उमड़ेगी, वह भीतर ही मर जाएगी,
इन भीगी पलकों की शायद अंतिम चाँदनी तुम ही थीं।
समय चलेगा अपनी धुन में, ऋतुएँ भी बदल जाएँगी,
सूनी राहों पर चलती पदचापें भी ढल जाएँगी,
कुछ घाव समय के आगे भी आख़िर कहाँ भर पाते हैं,
लोग सँभल जाते हैं बाहर, भीतर से मर जाते हैं।

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