साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
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बक्सर, बिहार
1963
चूल्हा फूँकते झुकी हुई पीठ हो तुम गोयठे की मद्धिम आँच पर रात को रोटियों-सी गोल करती तुम सघन वृक्ष की टहनी विनम्र नदी की गरम साँस हो तुम पहाड़ी रातों-सी यातना के बाद नींद की ख़ुशी हो तुम।
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