साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3580
कटनी, मध्य प्रदेश
1966
तम जहाँ में पल रहा है, रौशनी को छल रहा है। मैं करूँ तो क्या करूँ अब, आग है कुछ जल रहा है। सूर्य भी दिन भर चला औ, शाम होते ढल रहा है। रात कितनी बेहया है, गो ग़लत कुछ चल रहा है। आँख में आँसू भरे हैं, वक्त ही तो खल रहा है।
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