तम जहाँ में पल रहा है,
रौशनी को छल रहा है।
मैं करूँ तो क्या करूँ अब,
आग है कुछ जल रहा है।
सूर्य भी दिन भर चला औ,
शाम होते ढल रहा है।
रात कितनी बेहया है,
गो ग़लत कुछ चल रहा है।
आँख में आँसू भरे हैं,
वक्त ही तो खल रहा है।

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