साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3604
अयोध्या, उत्तर प्रदेश
1927 - 2017
लगभग मान ही चुका था मैं मृत्यु के अंतिम तर्क को कि तुम आए और कुछ इस तरह रखा फैलाकर जीवन के जादू का भोला-सा इंद्रजाल कि लगा यह प्रस्ताव ज़रूर सफल होगा। ग़लतियाँ ही ग़लतियाँ थी उसमें हिसाब-किताब की, फिर भी लगा गलियाँ ही गलियाँ हैं उसमें अनेक संभावनाओं की बस, हाथ भर की दूरी पर है, वह जिसे पाना है। ग़लती उसी दूरी को समझने में थी।
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