मेरे पैरों के नीचे
एक छोटी-सी सुरंग थी,
जहाँ चींटियों की फ़ौज में
ग़ज़ब की उमंग थी।
किसी के हाथ में फूल था,
तो किसी के हाथ में मिठाई,
किसी के हाथ में उपहार था,
उत्सव की छटा थी छाई।
पूछने पर मालूम हुआ,
आ रही थीं चींटियों की रानी।
रानी कोई भगवान है,
सुन रहा था मैं चींटियों की जुबानी।
एक बड़े पैरों वाला आदमी
मस्ती में मचल रहा था,
अनजाने में वह न जाने
कितनी चींटियों को कुचल रहा था।
"अरे, तुमने रानी चींटी को कुचल दिया,
यह कैसी तुम्हारी नीति है?"
वह बोला, "भैया, लाल हो या काली हो,
रानी हो या साधारण हो—
मेरे लिए तो सब चींटी ही हैं।"

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