सब चींटी है (कविता)

मेरे पैरों के नीचे
एक छोटी-सी सुरंग थी,
जहाँ चींटियों की फ़ौज में
ग़ज़ब की उमंग थी।
किसी के हाथ में फूल था,
तो किसी के हाथ में मिठाई,
किसी के हाथ में उपहार था,
उत्सव की छटा थी छाई।
पूछने पर मालूम हुआ,
आ रही थीं चींटियों की रानी।
रानी कोई भगवान है,
सुन रहा था मैं चींटियों की जुबानी।
एक बड़े पैरों वाला आदमी
मस्ती में मचल रहा था,
अनजाने में वह न जाने
कितनी चींटियों को कुचल रहा था।
"अरे, तुमने रानी चींटी को कुचल दिया,
यह कैसी तुम्हारी नीति है?"
वह बोला, "भैया, लाल हो या काली हो,
रानी हो या साधारण हो—
मेरे लिए तो सब चींटी ही हैं।"


  • विषय : -  
लेखन तिथि : 2026
यह पृष्ठ 54 बार देखा गया है
×

अगली रचना

जो पहले था आज नहीं है


पीछे रचना नहीं है
कुछ संबंधित रचनाएँ


इनकी रचनाएँ पढ़िए

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।

            

रचनाएँ खोजें

रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें