आसमान को देखूँ,
पर रंग सभी धूमिल हैं,
धरती से पूछूँ तो
उत्तर बड़े निर्जीव हैं।
हवा की सरगम भी
अब शोर सी लगती है,
मन की हर परत पर
बस पीर सजग रहती है।
खिलखिलाहटों के पल,
स्मृतियों में छिप गए,
और उन यादों के संग
आँसू भी चिपक गए।
जीवन की इस गाथा में
कहीं उजाला बाक़ी नहीं,
हर क़दम पर घाव हैं,
पर मरहम कोई साथी नहीं।
क्या यह मेरी नियति है,
या जीवन का कोई छल?
हर प्रश्न का उत्तर बस
निःशब्द, रिक्त और विफल।
फिर भी इस वेदना में
जीने की क़सम खाई है,
दर्द को अपना साथी मान,
अकेले राह बनाई है।

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
सहयोग कीजिएप्रबंधन 1I.T. एवं Ond TechSol द्वारा
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें
