राग यह अनुराग का
खेल पानी आग का
भोग दुख; सुख-त्याग का
कंठ से कढ़ता कि चढ़ता सुर; उतरता सुर!
नयन झरते ज्यों गगन
बरसते ज्यों प्राण-घन
बिसुधपन या सुधि-मगन
छहरता हिम जोत से या स्रोत से भुर्भुर!
सुर उड़ा लाते कहाँ
पुरातन-नूतन ‘न-हाँ’
जननि, एकायन जहाँ
गरल गल जाता गले में, चू अमृत सुमधुर!
दिन ढले संध्या न हो
प्राण चुप हों, गान हो
जगत् जन्मे, माँ न हो!
निष्प्रयोजन करुण क्रंदन, निष्प्रयोजन डर!

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