साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
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कटनी, मध्य प्रदेश
1966
निराधार तथ्यों से लबरेज याचिका! मढ़ते आरोप होती संघाते हैं! मिर्च मसाला सी भरी हुई बातें हैं! वकील हुए ऐसे जैसे हो पाचिका! मुद्दई निरापद प्रतिवादी को घंट है! मुंसिफ़ का फ़रमान लगता अंट-संट है! इसलिए पिटीशन लगती है पिशाचिका!
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