अपनी बस्ती से गुज़रते हुए
मुझे याद आया कि
पहले मैं पहाड़ों पर जाना चाहता था
‘पहाड़ पर जाना' महज़ एक वाक्य नहीं
एक झूला था
जो मुझे घंटों झुलाता था
पहाड़, घाटियाँ और परिंदे
सिर्फ़ संज्ञाएँ नहीं हैं
आप एक बार ज़ोर से चिल्लाइए—पहाड़
आपके अंदर से प्रतिध्वनियाँ आएँगी—
पहाड़... पहाड़... पहाड़!
कुछ चीज़ें ज़िंदगी में ऐसी ही होती हैं
जिनके बारे में
फ़िलहाल सोचा ही जा सकता है।

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