साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3604
आगरा, उत्तर प्रदेश
1923 - 1962
ओ ज्योतिर्मयि! क्यों फेंका है, मुझको इस संसार में। जलते रहने को कहते हैं, इस गीली मँझधार में। मैं चिर जीवन का प्रतीक हूँ निरीह पग पर काल झुके हैं, क्योंकि जी रहा हूँ मैं अब तक प्यार-भरों के प्यार में...
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