दूसरों को दोष मत दो,
अपनी कारदानियों का।
ख़ुद से उपजाई,
बे-तुकी परेशानियों का।।
तुम ही तो ज़िम्मेदार हो
अपनी विफलताओं के।
तुम्हीं ने तो तोड़े थे,
अध-खिले फूल लताओं के।।
फिर क्यों व्याकुल हो,
चिंतित और अचंभित।
देख किसी की सफल ज़िंदगी,
स्वयं पर सशंकित।।
मानो ख़ुद की ग़लती
और शुरू करो प्रायश्चित।
अन्य न कोई मार्ग है दूजा,
है यही सर्वोचित।।

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