साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3595
इटावा, उत्तर प्रदेश
1971
मेरे दरवाज़े यदि सुबह आई तो मैं अपने दरवाज़े बंद कर लूँगा और कहूँगा कि अब बहुत देर हो चुकी है देर से मिले न्याय की तरह सुबह आएगी मेरे दरवाज़े रोकर लिपट जाएँगे उससे दरवाज़ों के पीछे मैं खड़ा रहूँगा कहीं उसे देखता
अगली रचना
पिछली रचना
साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें