मेरे और तुम्हारे सपनें (ग़ज़ल)

मेरे और तुम्हारे सपनें,
कितने प्यारे-प्यारे सपनें।

हम दोनों ने रंग भरे हैं,
अजब अनोखे न्यारे सपनें।

इन पलकों पर ही सोते हैं,
आँखों के हैं तारे सपनें।

छल औ' कपट नहीं आता है,
सच में बड़े दुलारे सपनें।

अब तो रह गए मन के हो कर,
पहले थे बनजारे सपनें।

इनके अंदर सभी स्वाद हैं,
मीठे तीखे खारे सपनें।

ख़ुशबू-फूल बहुत मन भाते,
खेले हैं अंगारे सपनें।

कभी धूप बनते वसंत की,
बनें कभी बौछारें सपनें।

पल-पल रंग बिखेरा करते,
रहकर साथ हमारे सपनें।


लेखन तिथि : 2026
यह पृष्ठ 20 बार देखा गया है
×

अगली रचना

मुझे देखकर अब उसका शर्माना चला गया


पीछे रचना नहीं है
कुछ संबंधित रचनाएँ


इनकी रचनाएँ पढ़िए

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।

            

रचनाएँ खोजें

रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें