साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3615
कटनी, मध्य प्रदेश
1966
भोर हुई प्राची की गोद में खेले दिनमान! दिन उदय होते ही अँधेरा दूर हुआ! रात में नीड़ों में आराम भरपूर हुआ! दिन चढ़े सूरज ने कर दिया धूप का है दान! किरनें हैं प्राणी के देह को दुलारतीं! तालों के दर्पण में ख़ुद को निहारतीं! ढलता हुआ सूरज चला गया छोड़कर जहान!
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