साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3574
कटनी, मध्य प्रदेश
1966
शहर की व्यथाएँ कह रहीं हवाएँ। लग रहा ऐसे पत्थर के लोग हैं। कर्मों के भोग भोग रहे भोग हैं।। गले में अटक गईं जैसे सदाएँ। एक किला विश्वास का ढह गया। और कलुषित मन आँखों से बह गया। चौकन्ने पहरू हैं दाएँ-बाएँ। खिले सभी फूल गंधहीन हो गए। आचरण बहारों के ख़ौफ़ बो गए।। लोगों की टोली लोकगीत गाएँ।
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