कौन तम के पार?—(रे, कह)
अखिल-पल के स्रोत, जल-जग,
गगन घन-घन-धार-(रे, कह)
गंध-व्याकुल-कूल-उर-सर,
लहर-कच कर कमल-मुख-पर
हर्ष-अलि हर स्पर्श-शर, सर,
गूँज बारंबार!—(रे, कह)
उदय में तम-भेद सुनयन,
अस्त-दल ढक पलक-कल तन,
निशा-प्रिय-उर-शयन सुख-धन
सार या कि असार?—(रे, कह)
बरसता आतप यथा जल
कलुष से कृत सुहृत कोमल,
अशिव उपलाकार मंगल,
द्रवित जल नीहार!—(रे, कह)

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