साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3574
कटनी, मध्य प्रदेश
1966
चेहरे पर रातों के कालिख अँधेरों की। आँगन में उतरे हैं धूप के पखेरू। उम्र ढली उड़ जाते रूप के पखेरू।। आई याद मेड़ों पर खट-मिट्ठे बेरों की। मधुऋतु फ़सलों के रंगों को चूम गई। अमराई में हवा- बसंती झूम गई।। पिटारी राज़ खोलती साँप की-सँपेरों की।
अगली रचना
पिछली रचना
साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें