साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
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इटावा, उत्तर प्रदेश
1958
काए मारे है फिर जफ़ा करके, हम मरे थे ख़ुदा ख़ुदा करके। दिल ने हर चीज़ मुफ़्त में चाही, हक़ हुआ है तो हक़ अदा करके। जो मिला वो कहीं नहीं मिलता, उस बियाबान से वफ़ा करके। फ़िक्र आवाज़ है परिंदे की, चाँदनी में पिया पिया करके।
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