मिल क़तरा-क़तरा बूँद बनी
उसको भी गिरना होता है।
बादल तक का छोड़ के आँचल
पत्थर पर झरना होता है।
बैठ न जाना ख़ामोश कहीं
तुम सागर के हमराही हो।
ढाल से ढलना सीख पथिक
फिर तेरी भी मनचाही हो।
आसान नहीं है सफ़र तेरा
साहस की दुनियादारी में।
सब तुझसे ही पुष्पित बहारें
महक अलग है क्यारी में।
लड़ना है तुझे आठ पहर से
ख़ुद धीरज मत खो जाना तूँ।
साँसों की सरगम बोल रही
ख़ुद जीवित एक तराना तूँ।
स्वयं की हो पहचान अगर
फिर उसकी जीत निराली है।
मेहनत के उठते क़दमों में
जन जीवन की ख़ुशहाली है।।

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