साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
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कटनी, मध्य प्रदेश
1966
जल ओक में भरने लगी, वह आचमन करने लगी। जब भी हवा आँधी बनी, ये सृष्टि भी डरने लगी। होता अगर है कोसना, मुझमें दुआ झरने लगी। खाली जगह है देखिए, अब फूल से भरने लगी। जब-जब मिली शुभकामना, है पीर को हरने लगी।
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