साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
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कटनी, मध्य प्रदेश
1966
जब जिसने है अपकार किया, कुछ भी हो अंगीकार किया। थोड़ी सी राहत माँगी थी, पर उनने है इंकार किया। युद्ध अगर हल ही होगा तो, मैंने भी चीख़-पुकार किया। है नहीं उतरती बात गले, औ उस वक्त प्रतीकार किया। ये दुनिया पागलखाना है, दुश्मन माना जो प्यार किया।
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