साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
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नई दिल्ली, दिल्ली
1963
मकड़ी सिद्धहस्त है, ख़ुद जाल बनाने में। फिर तरकीब लगाती है, शिकार को फँसाने में। अपने रसायन से वो बेतोड़ जाल बुनती है। पकड़ने को कीड़े-मकौड़े अपने हुनर से चुनती है। इसी तरह आदमी भी श ग़ज़ब के जाल बुनता है। पर अफ़सोस, फँसाने हेतु आदमी को ही चुनता है।
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