हिंद के माथे पर हिंदी
बिंदी सा चमके है,
आज विश्व के हर कोने में
तू मोतियों सा दमके है।
बग़ैर तेरे क्या करूँ कल्पना,
होती न तू तो क्या कोई
सृजन कर पाता रचना।
लिपियों में है तू प्राचीन,
हर एक वर्ण लागे नवीन।
स्वर व्यंजन का तू बड़ा खजाना,
तेरे बग़ैर क्या संभव है
सूर कबीर तुलसी की
कल्पना कर पाना?

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
सहयोग कीजिएप्रबंधन 1I.T. एवं Ond TechSol द्वारा
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें
