साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3574
कटनी, मध्य प्रदेश
1966
गुलमोहर मानो स्वर्ग का फूल! लबालब भरा है पराग! खुले मधुमक्खी के भाग! मधुका का छत्ता रहा है झूल! धधके अंगार सा रंग! खिले हैं मधुऋतु के अंग! फूलों की नदी गंधों के कूल! लाल हैं और हैं पीले! गाँव में इनके क़बीले! वैशाख जेठ नहीं जाते भूल!
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