घोर अंधड़ (कविता)

हर दिन
एक नया सबेरा लिए आता है।
पर बात;
वही पुरानी होती है।
मन में घोर अंधड़, पुरानी स्मृतियाँ, वही विचार
एक साथ कौंधता है हृदय में
जीवन की गतिविधियाँ पैंतरे बदल
पहुॅंच जाती है;
उसी मनोदशा में।
जहाॅं मन पुनः उदास हो जाता है।
कोई रंगत नहीं, कोई उत्साह नहीं
सभी चेहरे मायूसी के तम सागर में डूबे
एक गहरे पीड़ा को अभिव्यक्त करते हैं।
कुछ मुख पर झूठी मुस्कान टाँगे,
अपने दर्द को छिपाने का
झूठा प्रयत्न करते हैं।
तो कुछ टूट जाते हैं
समाज द्वारा की गई निंदा, तिरस्कार
अथवा व्यंग बाणों के प्रहारों से।
जीवन भार लगने लगता है।
व्यर्थ लगने लगता है सब कुछ।
सभी क्रियाएँ–
अव्यवस्थित और अप्रयोजित हो जाती हैं।
तब एकांत और मौन ही
शांत करता है
उतप्त भावनाओं को
तत्क्षण।


रचनाकार : प्रवीन 'पथिक'
  • विषय : -  
लेखन तिथि : 3 सितम्बर 2026
यह पृष्ठ 45 बार देखा गया है
×

अगली रचना

गहरा सन्नाटा


पीछे रचना नहीं है
कुछ संबंधित रचनाएँ


इनकी रचनाएँ पढ़िए

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।

            

रचनाएँ खोजें

रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें