गहरा सन्नाटा (कविता)

कभी कोई रात इतनी उदास होती है
जैसे ग़म के सागर में डूबी
अन्यमनस्क, अपलक, अतीत में
ढूॅंढ रही हो कुछ!
जिसका चित्र मानस में सजीव होता है।
पर, आँखों में उसकी छवि
धूमिल और रेखाहीन होती है।
रात का नीलाभ आकाश
पसरा सन्नाटा और अकेलापन।
चूर-चूर कर देते हैं सब कुछ
एक गहरा घाव का निशान, जिसे समय ने
कभी पर्दा ढक दिया था;
हरे हो जाते हैं तत्क्षण।
उम्र की बढ़ती ढलान संकेत देती है कि
बहुत काम अभी अधूरे हैं;
जिसे–
आँखों को मूंदने के पूर्व ही
किया जाना अनिवार्यतः
एक शर्त है,
इस जीवन का...


रचनाकार : प्रवीन 'पथिक'
लेखन तिथि : 15 जुलाई 2026
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