साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3574
अयोध्या, उत्तर प्रदेश
1935
ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएँगे रोएँगे बहुत लेकिन आँसू नहीं आएँगे कह देना समुंदर से हम ओस के मोती हैं दरिया की तरह तुझ से मिलने नहीं आएँगे वो धूप के छप्पर हों या छाँव की दीवारें अब जो भी उठाएँगे मिल जुल के उठाएँगे जब साथ न दे कोई आवाज़ हमें देना हम फूल सही लेकिन पत्थर भी उठाएँगे
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