साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3615
बरेली, उत्तर प्रदेश
1940
दूसरों को मिटाने की धुन में आदमी ख़ुद को यूँ मिटाता है जैसे चुभने की फ़िक्र में काँटा शाख़ से ख़ुद ही टूट जाता है
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