सूर्य डूबा, साँझ ने जब
रात का आँचल ओढ़ लिया,
एक अकेला दीप तब भी
अँधियारे से जोड़ लिया।
बोला—
"मुझमें कहाँ सामर्थ्य इतनी,
जो तम का अंत करूँ;
पर जब तक यह श्वास शेष है,
अपना धर्म अवश्य धरूँ।"
वायु आई प्रलय-वेश धर,
लौ से करने युद्ध प्रखर;
दीप हँसा—
"जो सत्य-पथिक है,
उसका भय भी होता नश्वर।"
काजल पीकर ज्योति बनाना,
यही अग्नि का तप होता है;
जो स्वयं पिघलकर मुस्काए,
वही प्रकाश-कल्प होता है।
तेल घटा, बाती झुकने लगी,
रात और गहरी होने लगी;
किन्तु उसी क्षण दूर क्षितिज पर
अरुणिमा मुस्काने लगी।
दीप बुझा—
पर हार न मानी,
उसका स्वप्न अमर हो गया;
जिस उषा की राह निहारी,
वह स्वयं प्रखर हो गया।
जीवन भी उस दीप सदृश है—
क्षणभंगुर, सीमित, लघु, अल्प;
किन्तु ध्येय यदि सूर्य-समुज्ज्वल,
तो मृत्यु भी बन जाती कल्प।
इसलिए हे मन!
तम से लड़ना,
फल की इच्छा त्याग देना;
यदि बन न सको तुम स्वयं प्रभाकर,
तो कम-से-कम एक दीपक बनकर
किसी भटके पथिक को
घर का मार्ग बता देना।

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