छोड़ दी मुहब्बत मैंने!
पकड़ ली लेखनी।
जिससे लिख सकूँ सदियों का संताप,
जो हमारे मध्य;
चक्की के दो पाटों के बीच,
पिसता था निरंतर;
मंथर चाल से।
एक सपना,
जो वासना के भार से दबा;
खो गया था अतीत के अँधेरे में।
परन्तु आज फिर,
ललकार रहा अपनी चुनौतियों के साथ,
जिन्हे कभी आत्मसात किया था मैं।
मानता हूँ;
ये मार्ग सहज नहीं है।
तेरा विस्मरण भी आसान,
महज़ नहीं है।
फिर भी,
वो सब करूँगा;
जो तुम्हे प्रिय है।
कारण, मेरा लक्ष्य आज भी
सजीव है।
निर्मित होगा सपनों का महल;
बिन खिड़कियों के,
बिना कपाट के,
जिसके भीतर एक सुनहरा कल पनप सके;
निर्बाध, अक्षुण्ण।

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