झगड़े मुझको बहना ताड़े, दुश्मन सी इतराती है,
ख़ुद बिखरे, गले लगाती, फिर पुचकार मनाती है।
छेड़े मुझको करे शृंगार, मान करे हँस कर, रूठे जो,
पुचकार दुलार आतिथ्य करे, स्वर्ग परी बन जाती है।
पक्की डोर बनी संगिनी, सूख दुख के कच्चे धारों से,
ताक़त ऐसी नहीं धरा पर, जो काटे इसे तलवारों से।
बचपन की यादों को सहेजे, पिया घर अनजान चली,
सारे बंधन तोड़ ससुराली, मिलने मुझसे व्याकुलाती है।
तिलक लगाए माथ सँवारे, आरती कर जीवन बढ़वाए,
वाणी मीठा भोग लगा के, मनोकामना संग सुहाए।
इक धागे का गाँठ सजाने, हर पर्वत से टकराती है,
देख भाई की सुनी कलाई, बहन व्यथित हो जाती है।
धन दौलत की नहीं लालसा, चंदन ख़ातिर साथ ही माँगे,
रक्षाबंधन उपहार स्वरूप, शीश झुका बस रक्षा माँगे।
अहो भाग्य है धरती माँ, बहना सा प्यार संगवारी है,
प्रीत का धागा रेशम वाला, सतरंगी उपहार सजाती है।

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