अपने आप से घबरा गया हूँ,
छाया से धूप में आ गया हूँ।
मेरे अपने से कुछ सवाल थे,
जैसे अँधेरे में मशाल थे।
दूजों से बच चलता रहा,
बस अपनों से गच्चा खा गया हूँ,
छाया से धूप में आ गया हूँ।
और एक क़िस्सा तमाम किया,
आँखों को आँसुओं का जाम दिया।
सहते सहते जीवन को,
आख़िर में चिल्ला गया हूँ,
छाया से धूप में आ गया हूँ।
अपने आप से घबरा गया हूँ,
छाया से धूप में आ गया हूँ।

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