अपने आप से घबरा गया हूँ (कविता)

अपने आप से घबरा गया हूँ,
छाया से धूप में आ गया हूँ।

मेरे अपने से कुछ सवाल थे,
जैसे अँधेरे में मशाल थे।
दूजों से बच चलता रहा,
बस अपनों से गच्चा खा गया हूँ,
छाया से धूप में आ गया हूँ।

और एक क़िस्सा तमाम किया,
आँखों को आँसुओं का जाम दिया।
सहते सहते जीवन को,
आख़िर में चिल्ला गया हूँ,
छाया से धूप में आ गया हूँ।

अपने आप से घबरा गया हूँ,
छाया से धूप में आ गया हूँ।


  • विषय : -  
लेखन तिथि : 11 जुलाई 2026
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