साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3595
पटना, बिहार
1916 - 1961
सरोद पर तुमने था बजाया, मैं समझा नहीं। मैंने देखा, पीतल और लोहे से तुमने मधु निचोड़ा: सारा कड़वापन दूर हो गया, मधु विंदुत होकर बँट गया।
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