कितना आसान है
किसी को आहत करना,
जले पर नमक छिड़कना।
पर ज़रा सोचिए
कोई आपको यूँ आहत करेगा
तब कैसा लगेगा?
मगर हम सब आदत से लाचार हैं,
अपने क्षणिक मनोरंजन, ख़ुशहाली
या उदंडतावश ऐसा जब तब करते ही हैं,
सामने वाले की पीड़ा बढ़ाते हैं
उसकी बेबसी का मज़ाक बनाते हैं,
औरों की नज़रों में भी उसे
हँसी का पात्र बनाते हैं,
अपने को बड़ा होशियार समझते हैं।
मगर जब ऐसा हमारे साथ होता है
तब हम किंकर्तव्यविमूढ़ से
होकर रह जाते हैं,
आहत होने का दर्द वास्तव में
तब ही समझ पाते हैं,
लोगों की मानसिकता पर
सवाल उठाते हैं,
समझ पर ऊँगलियाँ उठाते हैं,
आहत होने और करने का फ़र्क़
महसूस कर पाते हैं।

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