साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3574
कटनी, मध्य प्रदेश
1966
मंडराते खतरे ज्यों चील औ कौआ! कतर ब्योंत है आपसदारी में! पूरे मौक़े हैं रंगदारी में!! ज़हरीले नाते हैं मानो अकौआ! छीना झपटी फ़ैशन हो गई! मेल मिलाप नागफनी बो गई!! आदमी लगने लगा है कोई हौआ!
अगली रचना
पिछली रचना
साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें