कविता

मातृभाषा
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
मातृभाषा होती है माँ की तरह स्नेह देने वाली। जब जाता है इंसान किसी दूर-दराज़ इलाके में नौकरी की तलाश में, तो वहाँ �
अश्रु सर्वथा जीते होंगे
राघवेंद्र सिंह
अश्रु सर्वथा जीते होंगे, उत्कंठित स्वर हारा होगा। प्रणत दृष्टि से जब भी हे प्रिय! तुमने हमें निहारा होगा। अश्रु �
प्रेम की पगडंडी
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
चलो आज फिर एक पगडंडी चुनें, जहाँ पाँव से पहले दिल चल पड़ें। जहाँ शब्द ना हों, बस नयन बोलते, और चुप्पी में भी भाव छलक प�
आदमी झुकता वहीं है
प्रवीन 'पथिक'
आदतन आदमी झुकता वहीं हैं, जहाॅं उसने समय व्यतीत किया हो। समय, जो निरंतर आगे बढ़ता जाता है। हम बीते लम्हों में रुक ज�
सुना है गाँव में
हेमन्त कुमार शर्मा
सुना है गाँव में, सुबह के समय, कोयल अब भी कूकती है, टिटहरी सुर मिलाती है, गिनी चुनी चिड़ियाँ, चहचहाती हैं। और सुबह क
माशूका
प्रवीन 'पथिक'
बशर यूँ किसी से बेइंतहा मोहब्बत करता है। जिसके ख़्यालों में, शाम-ओ-सहर; जिसे पाने की चाहत में ताउम्र गुज़ार देता ह�
नई सड़क
मयंक द्विवेदी
जैसे सोलह शृंगार कर एक नवनवेली दुल्हन-सी जब गाँव में सड़क आती है बड़े-बुज़ुर्गों, बच्चों, युवाओं— सबके मन को भाती ह�
आत्मग्लानि
प्रवीन 'पथिक'
सोचता हूॅं, हार जाऊॅं उन लम्हों से, जिनसे लड़ते झगड़ते साल बीते। टूट कर बिखर गया जिनके लिए यूँ, हाथ खाली, हाल भी बदहा
स्त्री
संजय राजभर 'समित'
जेठ की दुपहरी में एक नव यौवना जिसके पीठ पर बंधा बच्चा है सिर पर ईंटे झुलसती हुई गर्म हवाएँ हैं, एक स्त्री कैसे झेल
छोटी-सी आशा
मदन लाल राज
बंजर धरती पर अंकुर क्या फूटा! उपजाऊ भूमि भी तिलमिला उठी। जब जुगनू की छोटी-सी आशा से अंधेरे में रोशनी झिलमिला उठी।
एक और अर्थ
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
कभी-कभी एक स्मृति अपना चेहरा उतारकर हमारी तरफ़ रख देती है, और हम समझते हैं ये हम हैं। पर वो हम नहीं— हमारी सम्भाव�
अधर पर सँवारूँ तुझे
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
साँझ की तीर पर बैठकर निहारूँ तुझे, स्वप्न की ओट से मैं पुकारूँ तुझे। भाव मेरे सिमटते रहें मौन में, शब्द बनकर अधर पर �
अवगुण सदा रहे हैं
हेमन्त कुमार शर्मा
अवगुण सदा रहे हैं, निश्चय भी सदा रहा। लाख बार गिर जाऊँ, फिर उठना है, मन में यह सदा रहा है, निश्चय भी सदा रहा है। भाव�
आदमी टूट जाता है
प्रवीन 'पथिक'
बहुत कुछ टूट जाता है, छूट जाता है; जब आदमी ख़ुद से रूठ जाता है। एक खालीपन से, उसका जीवन भर जाता है। जब वह खो जाता है, क�
यही बुद्ध हैं
सुरेन्द्र प्रजापति
एक शब्द जो बड़ी क्रूरता से उछाला गया घृणा की आग पर तपाया गया उड़ाया गया उपहास तीखे वचनों से दूरदुराया गया "दुर हटो! द�
न आदि न अंत
प्रवीन 'पथिक'
हर रोज़ एक वही विचार आता है मेरे मन में; उसी रंगीन चिड़िया की भाँति जो मेरे नीम के पेड़ पर लगे घोंसले में चुपके से आत�
अपनी हिन्दी
प्रवीन 'पथिक'
जब छोटा था, सीखा हिन्दी, हुआ बड़ा तो छोड़ चला। जिसकी छाया में पला बढ़ा, उसी से निज मुख मोड़ चला। हिन्दी हमारी माता ह
थोड़ी-सी रोशनी
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
पलकों पर ठहरी नमी अब शब्द नहीं खोजती, बस रिसती है अनकहे अपराध-भाव की तरह। भीतर का शोर इतना भारी हो गया है कि मौन भी
अधूरी कविताएँ
प्रवीन 'पथिक'
आख़िरी साँसों तक पूर्ण नहीं होता जीवन का उपन्यास। कुछ शेष रह जाती हैं, प्रेम कविताएँ; छंद नहीं बनते उस क्षण के, टूट �
ईश्वर और नैतिकता
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
ईश्वर है या नहीं, कोई नहीं जानता। कुछ ईश्वर के अस्तित्त्व को मानते हैं और कुछ ईश्वर के अस्तित्त्व को काल्पनिक कहक�
एक ख़ुशनुमा शाम
प्रवीन 'पथिक'
इसी नदी के किनारे एक ख़ुशनुमा शाम सूर्य लालिमा लिए छिप रहा था। संध्या के आँचल में, चिड़ियों का कलरव, झिंगुरों की झं�
तुम्हीं तो हो
प्रवीन 'पथिक'
हर सुबह मेरे ख़्वाबों में आकर मुझे अपनी सुगंधों से भर देने वाली तुम ही तो हो। तुम्हारा आहट पाकर ही तो, पंछी बोलते है�
दिशाहीन पथिक
प्रवीन 'पथिक'
कुछ विचित्र-सा हो गया हूॅं मैं! कुछ चकित, द्रवित, अन्यमनस्क-सा। स्मृतियाॅं पीछा नहीं छोड़ रही मेरा प्रश्न कभी उलझ क
स्मृति के झूंडों में
हेमन्त कुमार शर्मा
किसी ठिकाने का नहीं, बरबस आँखें छलक पड़ी। बादल घने थे हृदय पर, बूँदे पलकों से ढलक पड़ी। होश में कब था, और न होने की आ
आया है सावन
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
बादल उड़ते हैं जल लेकर, दो-एक? ना, पूरा दल लेकर। ज्यों पड़ी तप्त भू पर दृष्टि, करते शीतल, करके वृष्टि। लगता है आया पृ�
मौन का भी अर्थ है
श्वेता चौहान 'समेकन'
मौन का भी अर्थ है। ग़र समझ तुम जाओगे। शब्द से मौन का, निहितार्थ अधिक पाओगे। बात करती है नज़र भी, इनसे भी संवाद हो। चा
तुम चाँद की बातें करते हो
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
तुम चाँद की बातें करते हो, शहरों की सड़के ठीक नहीं, झरने पहाड़ जीव ये जंगल, क्या जीवन का प्रतीक नहीं। काट रहे हो जंग
जीवन एक पुस्तक
अजय कुमार 'अजेय'
जीवन अनुभव की किताब जिसमें कुछ रचनाऍं। सुख दुःख की रची इबारत शीर्षक विरत कथाऍं। जीवन में शीतलता लाती भोर हवा रव�
तू मेरी अन्तर्नाद बनी
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
तू सुरभित पुष्पों-सी कोमल, मैं तेरा मधुमास बना। तू जलती दीपक की लौ-सी, मैं उसका विश्वास बना। तू सागर की शांत लहर-सी,
मौन में प्रेम की वाणी हो तुम
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
जब नयन मौन होकर पुकारें तुम्हें, उन दृगों की कहानी हो तुम। छाँव बनकर मेरे पथ में चलो, इस धरा की रवानी हो तुम। शब्द ब

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