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ये दलीलें और ये इल्ज़ाम यानी (ग़ज़ल)

ये दलीलें और ये इल्ज़ाम यानी,
वो करेगी अब मुझे बदनाम यानी।

बेवजह जो मशवरा देते रहे हैं,
अब करूँगा दूर से प्रणाम यानी।

हाल मेरा पूछते हो आज मुझसे,
लग गया है आज कोई काम यानी।

बोलते हैं जो अभी तोते के जैसे,
वो बिके हैं कौड़ियों के दाम यानी।

याद अब जाती नहीं है, आ रही है
तो करो एक काम, ले लो जाम यानी।

मैं नहीं जाता कभी भी बिन बुलाए,
भेज सकते थे मुझे पैग़ाम यानी।

ख़ुश रखे माँ-बाप को जो भी हमेशा,
ख़ुश किए हैं उसने चारों धाम यानी।


प्रशान्त 'अरहत'
  • विषय :
सृजन तिथि : नवम्बर, 2021
अरकान : फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
तक़ती : 2122 2122 2122
            

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