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तुम्हारी कमी (कविता)

राधिके!
आज तुम्हारी कमी,
महसूस हो रही है मन को।
लगता
कोई नहीं है मेरा,
तुम्हारे सिवा।
कभी डाँटना तो
सुन लेती चुपचाप,
मूक समान।
कभी पलट जवाब नहीं दिया मेरा!
सब अंगीकार किया
जो मैंने दिया
दुःख या सुख।
आज तुम्हारी पीड़ा,
साल रही उर को मेरे।
घोर निराशा और पश्चाताप की अग्नि में,
जल रहा हूँ।
तुम्हारा मुझे मिलना,
ईश्वर की अभूतपूर्व परिकल्पना रही
जो मुझे मिली।
कदाचित सुख के समय तुम्हे सताना,
अच्छा लगता हो
पर!
तुम्हारी अस्वस्थता,
मेरा साहस और संबल खो देती।
मन अत्यंत दुःखी हो जाता
तेरी स्मृति भावुक कर देती,
अपने किए पर।
आँसू पोछ लेता यह निर्णय कर,
कुछ भी ऐसा नहीं करूँगा,
जो तुम्हे पसंद नहीं,
सच में,
राधिके!


प्रवीन 'पथिक'
सृजन तिथि : 2021
            

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