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श्रीलंका की एक लड़की (कविता)

तेरी हस्त लेखनी से खुदे,
तमिल भाषा में मेरा नाम;
मेरी पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर;
आज भी सजीव है।
जब भी देखता हूँ, उन स्वर्णाक्षरों को
तेरी स्मृति; तेरे सौम्य मुख की आभा;
चक्षुओं पर तैर जाती है।
तमाम तत्कालीन घटनाक्रम
श्रृंगल जीवंत हो उठते हैं।
हिन्दू विश्वविद्यालय के सिंहद्वार पर प्रथम दर्शन,
भूला नहीं हूँ मैं
तेरी मधुर वाणी, चंचल दृग;
एक आत्मीय भाव लिए,
अप्रत्याशित मिलन
जैसे वर्षों का संबंध;
सब स्मरण है मुझे।
मधुबन की वसंती शाम!
जहाँ कॉफ़ी पीते हुए हरी हरी घास पर;
घण्टों नगें पाँव घूमना।
एक अपूर्व आनन्द की अनुभूति!
तत्पश्चात,
रात्रि में
दूर्वा पर लेटे, एक दूसरे के बाहों पर सिर रखे;
चाँदनी निर्मल आकाश में,
अनिमेष ताकना।
फलस्वरूप
एक अजीब रोमांच का अंग प्रत्यंगो में प्रस्फुटन;
आज भी रोमांचित कर देते हैं।
"मैत्री जलपान गृह" में चाय के साथ,
हमारी मैत्री का आरंभ।
तुम्हारी शर्माती आँखें औ काँपते अधर;
तुम्हारी टूटी-फूटी हिन्दी का एक-एक शब्द,
जैसे रस घोल रहे थे कानों में।
तुमने बताया था;
श्रीलंका की रहने वाली हो।
सुनकर;
आश्चर्य विस्मय नेत्रों से देखने लगा था मैं।
मैत्री हेतु बढ़ा हुआ हाथ खींच लिया था,
क्योंकि; विरह की अंतिम तारीख हो गई थी ज्ञात
(जब शिक्षा_समावर्तन के पश्चात
लौट जाओगी अपने देश)
कुछ सोचकर;
पुनः बढ़ा दिया था अपना हाथ,
बना लिए मैत्री सम्बन्ध।
निश्चय कर;
अपितु! दो दिलों का मैत्री संबंध न टिके,
तथापि! दो देशों का मैत्री संबंध तो बन ही सकता है!
तत्पश्चात
सिलसिला शुरू हुआ मिलने का,
कभी विश्वनाथ मंदिर की सीढ़ियों पर;
तो कभी अस्सी घाट के अंतिम छोर पर
जहाँ धरती और आकाश मिलते प्रतीत होते थे।
गहन निशा में,
एकांत अपलक निश्चेष्ट।
उन क्षणिक अलौकिक आनन्द की स्मृति,
भान कराती आज की घटना सी।
उफ़!
उस एयरपोर्ट के अंतिम मिलन को कैसे भूलूँ मैं?
अन्तिम मिलन कहूँ,
या
अश्रुपूरित नेत्रों का बरसना।
जिसे आज भी सँजो के रखा है अपनी आँखों में;
अमूल्य धरोहर के रूप में।
जो समय समय पर,
अपने होने का एहसास कराते रहते हैं।


प्रवीन 'पथिक'
सृजन तिथि : 17 सितम्बर, 2020
            

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