Covid19 / किसान / देशभक्ति / सुविचार / बेटी / प्रेरक / माँ / जानकारी / ज्ञान / नारी / भक्ति / दोस्ती / इश्क़ / ज़िंदगी / ग़म

अंधविश्वास अखबार अधिकार अपराध अनमोल अब्दुल कलाम अभिलाषा अरमान अवसाद असफलता अहंकार


आँख आँसू आईना आकाश आत्मनिर्भर आत्महत्या आदत आदमी आधुनिकता आंनद आयु आवाज़


इंसान इंसानियत इश्क़


ईद ईश्वर


उद्देश्य उम्मीद उम्र


"ऊ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



एकता


"ऐ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"ओ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"औ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



क़ब्र कमजोरी कर्म कलम कवि काँटा कामना कामयाब कारगिल विजय दिवस किताब किसान किस्मत कुदरत कृष्ण जन्माष्टमी


ख़ामोशी खुशबू खुशी खेल ख़्याल ख़्वाब


ग़म गरीब गाँधी जयंती गाँव गुरु पूर्णिमा गैर


घर


चन्द्रशेखर आजाद चाँद चाय चाहत चिंता चुनाव चुनौती चूड़ियाँ चेहरा चैन


छठ पर्व छाँव


जनता जमाना जमीन जल जवानी जान जानकारी ज़िंदगी जीवन


"झ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"ट" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"ठ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



डर डोली


"ढ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



तन्हा तारा तिरंगा तीज तीर्थ तुलसीदास


"थ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



दर्द दान दिल दिवाली दीया दीवाना दुःख दुर्घटना दुश्मन दुश्मनी दुष्कर्म दूर देर देश देशभक्ति दोस्ती दौर


धन धनतेरस धरती धूप धैर्य


नज़र नफ़रत नव वर्ष नवरात्रि नाग पंचमी नारी नास्तिक निर्णय निंद न्याय


पक्षी पत्थर परछाई परवाह परिवर्तन परिवार पर्यावरण पशु पहचान पास पिता पितृ पक्ष पूजा पूर्णिमा पृथ्वी पेड़ पौधे प्यार प्रकृति प्रतीक्षा प्रार्थना प्रिय प्रेम प्रेमचंद प्रेरक


फरिश्ता फूल फौजी


बचपन बच्चे बहन बाघ बात बाबा साहब बारिश बुद्ध पूर्णिमा बूढ़ी बेटी बेरोजगारी बेवफ़ाई


भक्ति भगवान भगवान कृष्ण भगवान गणेश भगवान बुद्ध भगवान राम भगवान विश्वकर्मा भगवान शिव भगवान हनुमान भाई भाग्य भारत भावना भूख भूल भोजन भोर भ्रूण हत्या


मंज़िल मजदूर मजाक मधुशाला मन मर्यादा मसीहा महत्व महबूबा महान माँ माँ काली माँ दुर्गा माता पिता मानव मानवता मालिक मिट्टी मुलाकात मुस्कान मुसाफिर मृत्यु मोहब्बत मौत मौन मौसम


यात्रा याद युवा योग योगदान


रंग रक्षा बंधन राज राजनीति राजा राधा कृष्ण रावण राष्ट्र रिश्ता रोटी


लड़की लफ़्ज़ लम्हा लहू लेखक लॉकडाउन लोग


वक़्त वतन वफ़ा विजय विदा विश्वास वृक्ष वृद्ध व्यथा व्यर्थ व्यवहार


शक्ति शब्द शरद पूर्णिमा शरद ऋतु शराब शहीद शांति शान शिक्षक शिक्षा शिष्टाचार शोक श्रद्धांजलि श्रम श्राद्ध श्रृंगार


संकल्प संघर्ष संस्कार संस्कृत भाषा संस्कृति सत्य सपना सफर सफलता समय समस्या समाज समाधान सरकार सलाम सवेरा साजन साथ सादगी सावन साहस साहित्य सिनेमा सिपाही सीख सुख सुख दुःख सुखी सुरक्षा सुविचार सूरज सृष्टि सेवा सैनिक सोशल मीडिया सौतेला सौदा स्त्री स्वच्छता स्वतंत्रता स्वतंत्रता दिवस स्वदेशी स्वस्थ स्वास्थ्य


हत्या हमसफर हाथी हिंदी भाषा हृदय हैवानियत

क्ष

"क्ष" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।


त्र

"त्र" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।


ज्ञ

ज्ञान
क्ष त्र ज्ञ

निरपेक्ष (लघुकथा)

अब क्या लिखा है पत्र में तेरी मैम ने? ओह! पत्र नहीं मैसेज में? पत्रों के ज़माने अब कहाँ रहे! मैसेज आते-जाते हैं अब तो मोबाइलों में। मुझे मोबाइल में कुछ पढ़ते देख एक उचटती सी दृष्टि मेरे मोबाइल पर डाल, बहन बोली। उनकी बात को अनसुनी सी करती हुई मैं उनकी लिखी चार पंक्तियों को पढ़ी
“तिनका चुनचुन घरौंदा बनाया,
दोनों ने मिल संसार बसाया;
कीट पतंगे लाए खिलाया,
पंख उगे उड़ना सिखाया।
निरपेक्षता मुझे पाठ पढ़ाया।।"

डूबी रही कुछ पलों तक पंक्तियों में, सोचती हुई- क्या लिखूँ? इतने में ट्रे में दो कप चाय लेकर माँ आ बैठी मेरे पास, बहन को कहते हुए “बेटा तनिक दूध देख लेना, उफन न जाए! गैस पर रख आई हूँ मैं उसे। “जी मां!" उत्तर पाकर निश्चिंत सी हो अब वे मुझसे बोलीं “अरी ओ मेरी बावली पढ़ाकू! कहाँ लगे रहते हो तुम लोग इस खिलौने में? ले अब शांति से पहले चाय पी ले"। ऐसा वात्सल्य सागर उमड़ रहा था उनके आदेश में कि मैं मना न कर, उनके स्नेह आदेश का पालन करते हुए चाय का कप हाथ में उठा बोली “माँ आप भी ना जाने कहाँ खटती रहती हो इस सब में इस उम्र में भी? क्यों रखती हो इतना मोह? अब भी आप से निरपेक्ष नहीं हुआ जाता?"

क्या कहती है रे तू? यह मुझे कोई मोह वोह नहीं है। वह वहाँ होता है जहाँ कोई किसी से कुछ अपेक्षा रखता है। मुझे किसी से कोई अपेक्षा नहीं है। मैं तो सब कुछ निरपेक्ष ही रहकर करती हूँ। माँ हूँ, पत्नी हूँ, पुत्री हूँ, बहन हूँ, हूँ सबके प्रति निरपेक्ष ही। मेरा तो प्रेम है सबके प्रति। इसलिए यह सब जितना बन पड़ता है करती हूँ। उन लोगों की धारणा ही गलत है कि ये मेरे सहारे हैं। ना! सहारा तो एक उसका है बस। वह प्रेममय है। प्रेम करना ही उस का भजन है, उसे भजना है।
माँ! मैं आश्चर्य से मुँह बाए उनके मुख की ओर देखती रह गई। वे रुकी नहीं। फिर बोली “बीज का बीज बन जाना ही तो बीज की मंज़िल है। नदी का नदी, बादल का बादल, फूल का फूल, कली का कली, भोर का भोर, साँझ का साँझ बन जाना, बन पाना ही तो सभी की मंज़िल है। पंछी माँ-बाप को छोड़ उड़ जाते हैं। उड़ेंगे ही। हम को किसी ने बनाया। हमने किसी को बनाया। फिर जिस उद्देश्य के लिए बनाया, अब वही तो वे भी बनाएँगे। बनाएँगे क्यों? अखंड अनादि, अनंत प्रेम पाश में बंध कर। यही तो उनकी नियति है, यही कर्तव्य है। प्रेममय, प्रेम रूप है परमेश्वर। वही आत्मा बनाता है, परमात्मा बनने के लिए। यह प्रेम ही तो है जो सब कुछ करता-कराता है सभी से। हम ही घोंसले के निर्माता हैं। हम ही उड़ जाने वाले हैं। प्रेम पाश से बंध कर। फिर उड़ जाने में निरपेक्षता कहाँ? प्रेम का स्वरूप ही सापेक्ष है। निरपेक्ष नहीं। निष्काम कर्म पथ पर अग्रसर होना है- उड़ जाना। न मानें, न जानें बात अलग है।

अरे! मैं तेरे जितनी तो पढ़ी-लिखी तो हूँ नहीं। बस कभी-कभी तेरे बाऊजी कुछ कुछ कहते रहते हैं। उसे ही मैंने दोहरा दिया है। अब चाय पी। ठंडी हुई जा रही है। मैं फिर कुछ पल माँ के कथन में डूबी रह गई। मुझे मिल गया समर्थन जो मैं चाह रही थी। निरपेक्षता? कौन है निरपेक्ष? घोंसले के निर्माता या फिर पंख उगे उड़ जाने वाले? मेरे ख़्याल में दोनों में कोई नहीं। वे तो अनादि, अनंत, अखंड प्रेम पंथ के पथिक हैं। और हूँ मैं उसी प्रेम पंथ की पुरानी पगली पथिक।


ममता शर्मा 'अंचल'
सृजन तिथि : 2021
            

रचनाएँ खोजें

रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें