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निरपेक्ष (लघुकथा)

अब क्या लिखा है पत्र में तेरी मैम ने? ओह! पत्र नहीं मैसेज में? पत्रों के ज़माने अब कहाँ रहे! मैसेज आते-जाते हैं अब तो मोबाइलों में। मुझे मोबाइल में कुछ पढ़ते देख एक उचटती सी दृष्टि मेरे मोबाइल पर डाल, बहन बोली। उनकी बात को अनसुनी सी करती हुई मैं उनकी लिखी चार पंक्तियों को पढ़ी
“तिनका चुनचुन घरौंदा बनाया,
दोनों ने मिल संसार बसाया;
कीट पतंगे लाए खिलाया,
पंख उगे उड़ना सिखाया।
निरपेक्षता मुझे पाठ पढ़ाया।।"

डूबी रही कुछ पलों तक पंक्तियों में, सोचती हुई- क्या लिखूँ? इतने में ट्रे में दो कप चाय लेकर माँ आ बैठी मेरे पास, बहन को कहते हुए “बेटा तनिक दूध देख लेना, उफन न जाए! गैस पर रख आई हूँ मैं उसे। “जी मां!" उत्तर पाकर निश्चिंत सी हो अब वे मुझसे बोलीं “अरी ओ मेरी बावली पढ़ाकू! कहाँ लगे रहते हो तुम लोग इस खिलौने में? ले अब शांति से पहले चाय पी ले"। ऐसा वात्सल्य सागर उमड़ रहा था उनके आदेश में कि मैं मना न कर, उनके स्नेह आदेश का पालन करते हुए चाय का कप हाथ में उठा बोली “माँ आप भी ना जाने कहाँ खटती रहती हो इस सब में इस उम्र में भी? क्यों रखती हो इतना मोह? अब भी आप से निरपेक्ष नहीं हुआ जाता?"

क्या कहती है रे तू? यह मुझे कोई मोह वोह नहीं है। वह वहाँ होता है जहाँ कोई किसी से कुछ अपेक्षा रखता है। मुझे किसी से कोई अपेक्षा नहीं है। मैं तो सब कुछ निरपेक्ष ही रहकर करती हूँ। माँ हूँ, पत्नी हूँ, पुत्री हूँ, बहन हूँ, हूँ सबके प्रति निरपेक्ष ही। मेरा तो प्रेम है सबके प्रति। इसलिए यह सब जितना बन पड़ता है करती हूँ। उन लोगों की धारणा ही गलत है कि ये मेरे सहारे हैं। ना! सहारा तो एक उसका है बस। वह प्रेममय है। प्रेम करना ही उस का भजन है, उसे भजना है।
माँ! मैं आश्चर्य से मुँह बाए उनके मुख की ओर देखती रह गई। वे रुकी नहीं। फिर बोली “बीज का बीज बन जाना ही तो बीज की मंज़िल है। नदी का नदी, बादल का बादल, फूल का फूल, कली का कली, भोर का भोर, साँझ का साँझ बन जाना, बन पाना ही तो सभी की मंज़िल है। पंछी माँ-बाप को छोड़ उड़ जाते हैं। उड़ेंगे ही। हम को किसी ने बनाया। हमने किसी को बनाया। फिर जिस उद्देश्य के लिए बनाया, अब वही तो वे भी बनाएँगे। बनाएँगे क्यों? अखंड अनादि, अनंत प्रेम पाश में बंध कर। यही तो उनकी नियति है, यही कर्तव्य है। प्रेममय, प्रेम रूप है परमेश्वर। वही आत्मा बनाता है, परमात्मा बनने के लिए। यह प्रेम ही तो है जो सब कुछ करता-कराता है सभी से। हम ही घोंसले के निर्माता हैं। हम ही उड़ जाने वाले हैं। प्रेम पाश से बंध कर। फिर उड़ जाने में निरपेक्षता कहाँ? प्रेम का स्वरूप ही सापेक्ष है। निरपेक्ष नहीं। निष्काम कर्म पथ पर अग्रसर होना है- उड़ जाना। न मानें, न जानें बात अलग है।

अरे! मैं तेरे जितनी तो पढ़ी-लिखी तो हूँ नहीं। बस कभी-कभी तेरे बाऊजी कुछ कुछ कहते रहते हैं। उसे ही मैंने दोहरा दिया है। अब चाय पी। ठंडी हुई जा रही है। मैं फिर कुछ पल माँ के कथन में डूबी रह गई। मुझे मिल गया समर्थन जो मैं चाह रही थी। निरपेक्षता? कौन है निरपेक्ष? घोंसले के निर्माता या फिर पंख उगे उड़ जाने वाले? मेरे ख़्याल में दोनों में कोई नहीं। वे तो अनादि, अनंत, अखंड प्रेम पंथ के पथिक हैं। और हूँ मैं उसी प्रेम पंथ की पुरानी पगली पथिक।


ममता शर्मा 'अंचल'
सृजन तिथि : 2021
            

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