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इंतज़ार (कविता)

ग़ज़ब की छुअन थी
रोमांचित था तन-मन,
हया आँखों में थी
आग दोनों तरफ थी।

चुप्पी थी
फिर भर न जाने क्यूँ
हम दोनों रुके थे
इंतज़ार था
दोनों तरफ़ से
बड़ी मासूमियत से घुटनों के बल
इज़हार का।

वो चली गई धीरे-धीरे
वो पलटकर मुझसे लिपटना चाहती थी।
कुछ सुनकर
आइ लव यू
पर मैं...
चेतनाशून्य...
कुछ बोल न सका,
पता नहीं क्या हो गया था!
शायद सबसे बड़ी ग़लती थी।

आज मेरा भरा परिवार है
फिर भी न जाने क्यूँ?
आज भी उसका इंतज़ार है।
काश एक बार
इज़हार कर लिया होता।


संजय राजभर 'समित'
सृजन तिथि : 2020
            

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