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ग़ज़ल

पंख को आसमाँ चाहिए - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2021
पंख को आसमाँ चाहिए, ज़िंदगी को जहाँ चाहिए। धूप निकली हुई है यहाँ, औ उसे आस्ताँ चाहिए। दीप जलने लगे हैं अगर, पर्व को
बढ़े जा रहे हैं - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 9 जून, 2022
बढ़े जा रहे हैं, चले जा रहे हैं। सद गुरू कृपा बिन, फँसें जा रहे हैं। चकाचौंध माया, ठगे जा रहे हैं। दिखावे की रिश्त
दो जहाँ की हसीं जज़ालत है - नवीन नाथ
  सृजन तिथि :
दो जहाँ की हसीं जज़ालत है, ख़ुल्द से बड़के ख़ूबसूरत है। मुल्क रब की निगाहों सा दिल-जू, पाक एकता की पाक मूरत है। दिल
ये दलीलें और ये इल्ज़ाम यानी - प्रशान्त 'अरहत'
  सृजन तिथि : नवम्बर, 2021
ये दलीलें और ये इल्ज़ाम यानी, वो करेगी अब मुझे बदनाम यानी। बेवजह जो मशवरा देते रहे हैं, अब करूँगा दूर से प्रणाम यानी
जीवन से लुप्त दयानत है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 19 अप्रैल, 2022
जीवन से लुप्त दयानत है, उपदा पाने की उज्लत है। कितनी बार उन्हें समझाया, पर उनकी भद्दी आदत है। हथियारों की होड़ लग
अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं, घर के हालात घर से पूछते हैं। क्यूँ अकेले हैं क़ाफ़िले वाले, एक इक हम-सफ़र से पूछते हैं
किस पर है दुख भारी दुनिया - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 8 अप्रैल, 2022
किस पर है दुख भारी दुनिया, क्या सच है बतला री दुनिया। दुख है तो कारण भी होगा, ठीक-ठीक समझा री दुनिया। कह दे जो महसूस
वो चुपके से बोल गए - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 27 मार्च, 2022
वो चुपके से बोल गए, झट मिसरी सी घोल गए। हमने जब भी सच पूछा, दे बातों में झोल गए। अबतक छुपी मुहब्बत में, करते टालमटो
गुनाह तो नहीं है मोहब्बत करना - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 28 फ़रवरी, 2022
गुनाह तो नहीं है मोहब्बत करना, मगर हाँ जब करो इसकी अज़्मत करना। ये इश्क़ प्यार मोहब्बत जो भी बोलो, है अर्थ तो ज़माने क
रोज़ जोश-ए-जुनूँ आए - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 4 जनवरी, 2022
रोज़ जोश-ए-जुनूँ आए, साथ बख़्त-ए-ज़बूँ आए। अब भला क्या सुकूँ आए, हाँ भला अब ये क्यूँ आए। हाल क्या है कहे क्या अब, जब क
मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे - बशीर बद्र
  सृजन तिथि :
मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे, मुक़द्दर में चलना था चलते रहे। मिरे रास्तों में उजाला रहा, दिए उस की आँखों में जलते र
सितारों से उलझता जा रहा हूँ - फ़िराक़ गोरखपुरी
  सृजन तिथि :
सितारों से उलझता जा रहा हूँ, शब-ए-फ़ुर्क़त बहुत घबरा रहा हूँ। तिरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ, जहाँ को भी समझता जा रह
जितना कम सामान रहेगा - गोपालदास 'नीरज'
  सृजन तिथि :
जितना कम सामान रहेगा, उतना सफ़र आसान रहेगा। जितनी भारी गठरी होगी, उतना तू हैरान रहेगा। उस से मिलना ना-मुम्किन है,
मेरी निजी ज़ुबान है, हिन्दी ही दोस्तों - शमा परवीन
  सृजन तिथि : नवम्बर, 2021
मेरी निजी ज़ुबान है, हिन्दी ही दोस्तों, मेरे लिए महान है, हिन्दी ही दोस्तों। जो भी लिखूँ वही पढूँ, देखो तो ख़ासियत, हम
ख़ुद से मिलने की ज़िद कर के - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि :
ख़ुद से मिलने की ज़िद कर के, बैठी हूँ नज़दीक भँवर के। आज सुकूँ से क़दम बढ़ रहे, खिलता है दिल, रोज़ निखर के। दोपहरी भी ठंडी
एक प्यार का बाग़ लगाया कुछ दिन पहले - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 21 मार्च, 2022
एक प्यार का बाग़ लगाया कुछ दिन पहले, ख़ूब सँवारा और सजाया कुछ दिन पहले। आने लगे बहुत शैलानी रोज़ घूमने, उनमें से कुछ क
दिल के घाव कभी तो भर जाएँगे - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 2 फ़रवरी, 2022
दिल के घाव कभी तो भर जाएँगे, पर नज़रों से लोग उतर जाएँगे। हम सच की कुटिया के बाशिंदे हैं, झूठ अगर बोले तो मर जाएँगे।
जिस्म को चादर बनाया ही नहीं - प्रशान्त 'अरहत'
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2021
जिस्म को चादर बनाया ही नहीं, रात भर दीपक बुझाया ही नहीं। ज़िंदगी में जो सिखाया वक़्त ने, वो किताबों ने सिखाया ही नहीं
प्यारी क़िस्मत - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : मार्च, 2022
अहा! अहा! क्या प्यारी क़िस्मत, जागी ख़ूब हमारी क़िस्मत। मिली मुहब्बत उनकी जब से, लगती है सुखकारी क़िस्मत। महक कहाँ है
हम जान गए साधो दरबार सियासी है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 1 मार्च, 2022
हम जान गए साधो दरबार सियासी है, बातें तो अदब की हैं किरदार सियासी है। इक नर्सरी वाले ने हमको ये बताया था, कुछ पौध है
दोस्तों को आज़माना सीख ले - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 13 मार्च, 2022
दोस्तों को आज़माना सीख ले, ख़्वाब में है घर बनाना सीख ले। ये पराया सा शहर है भाइयो, इस शहर में आबदाना सीख ले। ज़िंदगी
मेरी क़ीमत घटाती जा रही हो - प्रशान्त 'अरहत'
  सृजन तिथि :
मेरी क़ीमत घटाती जा रही हो, मुझे अपना बनाती जा रही हो। तुम्हें मैं चाहता था भूल जाना, मग़र अब याद आती जा रही हो। नहीं
बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो - कुँअर बेचैन
  सृजन तिथि :
बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो, बस एक तुम पे नज़र है हमारे साथ रहो। हम आज ऐसे किसी ज़िंदगी के मोड़ पे हैं, न कोई रा
गगन में जब अपना सितारा न देखा - कुँअर बेचैन
  सृजन तिथि :
गगन में जब अपना सितारा न देखा, तो जीने का कोई सहारा न देखा। नज़र है, मगर वो नज़र क्या कि जिस ने, ख़ुद अपनी नज़र का नज
कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ - कुँअर बेचैन
  सृजन तिथि :
कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ, तेरी तरफ़ नहीं है उजाला तो क्या हुआ। चारों तरफ़ हवाओं में उस की महक तो है, मुरझ
तू तो सब समझता है ऐ मेरे मौला - शमा परवीन
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2022
तू तो सब समझता है ऐ मेरे मौला, दिल नही मानता है ऐ मेरे मौला। आती है याद दोस्ती हमे यूँ ही, मन मेरा हारता है ऐ मेरे मौल
ये तो नहीं कि ग़म नहीं - फ़िराक़ गोरखपुरी
  सृजन तिथि :
ये तो नहीं कि ग़म नहीं, हाँ मिरी आँख नम नहीं। नश्शा सँभाले है मुझे, बहके हुए क़दम नहीं। कहते हो दहर को भरम, मुझ को
रोज़ यूँ तो ज़िन्दगी मिलती रही - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 23 फ़रवरी, 2022
रोज़ यूँ तो ज़िन्दगी मिलती रही, साथ लेकिन बेबसी मिलती रही। चाँद सूरज तो रहे बस ख़ाब में, असलियत में तीरगी मिलती रही।
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया - बशीर बद्र
  सृजन तिथि :
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया, जिस को गले लगा लिया वो दूर हो गया। काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के, दीवा
एक जुट तेरे क़बीले हो गए - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 9 अक्टूबर, 2020
एक जुट तेरे क़बीले हो गए, आज क्यों पत्थर लचीले हो गए। खेलकर आए हो होली ख़ून से, यार तुम कितने रँगीले हो गए। आइनों को त

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