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कविता

सबका जीवन आनंदमय बना दे - रविंद्र दुबे 'बाबू'
  सृजन तिथि : 19 जून, 2022
मिले मुंडेर पर, सोंधी-सोंधी ताज़ी हवा का, ये झोंका जो, कभी धूप खिले, कभी छाँव बने कुदरत ने रंग बिखेरा जो। आसमान में, ह
किनारा - अर्चना मिश्रा
  सृजन तिथि : 2022
मैं स्तब्ध हूँ या मौन हूँ समझ नहीं आता कौन हूँ? जब अपनी ही जड़े उखड़ने लगे भेदभाव बढ़ने लगे होके, चुपचाप खड़ी हो
छवि विमर्श - अवनीत कौर 'दीपाली'
  सृजन तिथि : 2021
तेरे जाते क़दमों के निशान समंदर की रेत पर, आज भी नज़र आते है उन राहों पर बिखरे मेरे अरमाँ तेरे क़दमों में मिले, आज भी न
चाँदनी - अवनीत कौर 'दीपाली'
  सृजन तिथि : 2021
नभराज तारकेश्वर ने तारिका नक्षत्रों की सभा बुलाई चन्द्रप्रभा रानी श्वेत पोशाक में सज कर आई शीतल सौम्य हवा भी स्व
हे! हिन्द धरा के वीर पुत्र - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 25 जून, 2022
हे! हिन्द धरा के वीर पुत्र, बलिदान तुम्हारा लिखता हूँ। निज शब्द सुमन की स्याही से, सम्मान तुम्हारा लिखता हूँ। तुम
दर्द - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 1 अप्रैल, 2022
दिल के दरवाज़े पर हुई एक दस्तक, किसी के सिसकने की आ रही थी आवाज़, टटोला अंदर तो पाया मैंने, निकल रहे थे कुछ दर्द भरे अल्फ़
एक साया आया - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 31 मई, 2022
मन में बेचैनी संग अनचाहा डर समाया था, उलझनों का फ़ैसला मकड़जाल जाने क्यों समझ से बाहर था। नींद आँखों से कोसों दूर थ
पछतावा - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 13 मई, 2022
सत्पथ जीवन चल रे मानव, पुरुषार्थ सृजित नवकीर्ति गढ़ो। झूठ कपट छल लालच दानव, कर्मों पर पछतावा आप करो। बनो धीर साह
यही जीवन चक्र है - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 26 अप्रैल, 2022
जीवन क्या है यह समझाने नहीं ख़ुद समझने की ज़रूरत है अदृश्य से जीवन की शुरुआत पल-पल, छिन-छिन विकास की गति कितने रंग और
यारों ना करना क्रोध - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 13 मई, 2022
ख़ुशियों से भरा रहता है उन सब का जीवन, सकारात्मक सोच रखें एवं काबू रखतें-मन। काम क्रोध मद लोभ मात्सर्यो से जो रहें दू
मुझे गर्व है माँ तेरा बेटा हूँ - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 28 मई, 2022
पहली बार जब पलकें खोली, देखा मैंने तू हँस कर बोली, मेरे गालों को चूम-चूम कर, ममता मुझ पर लुटाई है। तेरे आँचल में पला
साहब हम मज़दूर हुए - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 1 मई, 2022
हम अँतड़ियों की सूखी हैं, हम ही रोटी वो रूखी हैं। हमको ईश्वर ने है ढाला, शायद मेहनत ने है पाला। जलती जेठ दुपहरी देख
तपिश - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 16 मई, 2022
भयंकर तपिश के दरमियाँ, ये जो शीतल जल है। यही तो बस आजकल, जीने का सम्बल है। उफ़ ये जलती फ़िज़ाएँ, अंधड़ की डरावनी सदाएँ।
शोर - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 15 मई, 2022
अश्रव्य शोर आर्तनाद हृदय का अरण्यनिनाद सम करता उत्पन्न विस्फोटक प्रभाव पसरता एकाकीपन भीड़ भाड़ के मध्य यद्य
शादियाँ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 6 मई, 2022
शादियाँ वास्तव में एक अनुबंध है दो परिवारों, दो दिलों का, जिसमें निभाई जाती हैं परंपराएँ, धारणाएँ, मान्यताएँ। निभ
नित जीवन रण मैं लड़ता हूँ - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 22 मई, 2022
हे! कालचक्र तुम सुनो आज, अस्तित्व मेरा क्या चुनो आज। मैं समरभूमि का एक बिगुल, बजता रहता हूँ नित ही खुल। हूँ कभी बाँ
संयुक्त परिवार हमारा - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 8 मई, 2022
बच्चों-जवानों बुज़ुर्गों से भरा है आँगन सारा, संस्कारो से जुड़ी हमारी जिसमें विचारधारा। तुलसी पूजन की हमारी यह पु
प्रकृति का सुकुमार कवि : सुमित्रानंदन पंत - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 20 मई, 2022
जयति जय हे! हिमालय पुत्र, बन मकरंद तुम निकले। हरित आँचल हिमानी से, बनकर छंद तुम निकले। प्रकृति के अंक तुम खेले, नदी
मृग व खग - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 10 मई, 2022
मृग के दृग में झाँकता खग, प्रेमिल नैनों में बसा है जग। मूक संवाद करें द्वय नयन, दृश्य अति मनोरम रहा लग। मधुमय भाषा
बच्चों को ख़ूब लुभाते आम - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 16 मई, 2022
खट्टे मीठे पीले आम, कितने हैं रसीले आम। सभी फलों के राजा हैं, सबसे ऊँची इनकी शान। आई गर्मी लेकर आम, सूझा ना कोई और क
नारी - रमेश चंद्र बाजपेयी
  सृजन तिथि : 12 मार्च, 1980
नारी है तो जग है, नारी है तो जीवन का सुंदरतम मग है। अबला नहीं हो तुम तुम तो हो सबला, बचपन में माँ-बाप का खिलौना और आ
परिस्थितियाँ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2 मई, 2022
जीवन है तो परिस्थितियों से दो चार होना ही पड़ता है, अनुकूल हो या प्रतिकूल हमें सहना ही पड़ता है। बहुत ख़ुश होकर भी अ
जीवन का निष्कर्ष लिखा - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 17 मई, 2022
पग-पग जीवन गलियारों में, हमने भी संघर्ष लिखा। पीड़ाओं के प्रथम द्वार पर, जीवन का निष्कर्ष लिखा। लिखा भाग्य का सूख
क़लम की अभिलाषा - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 6 मई, 2022
चाह नहीं मैं लहू से अपने, प्रकृति का शृंगार लिखूँ। चाह नहीं मैं योद्धाओं की, लहू युक्त तलवार लिखूँ। चाह नहीं मैं र
उठो गरल विष के प्यालों - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 25 अप्रैल, 2022
हे युद्धभूमि के मतवालों, तुम उठो गरल विष के प्यालों। है युद्धभूमि ललकार रही, निज जीवन राह पुकार रही। फूको तुम बिग
जब तक है ज़िंदगी - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 26 अप्रैल, 2022
ज़िंदगी जब तक है गतिमान रहती है, न ठहरती है, न विश्राम करती है। सुख दुख, ऊँच नीच की गवाह बनती है। ज़िंदगी के गतिशीलन म
चिलचिलाती धूप - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 2 अप्रैल, 2022
इस चिलचिलाती धूप ने जीना किया दुश्वार है। गर्म लू जलती फ़िज़ाएँ, हर तरफ़ अंगार है। आँधियाँ लू के थपेड़े, मन बदन बेज़ा
हाँ मैं श्रमिक हूँ - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 1 मई, 2020
मैं श्रमिक हूँ हाँ मैं श्रमिक हूँ। समय का वह प्रबल मंज़र, भेद कर लौटा पथिक हूँ। मैं श्रमिक हूँ हाँ मैं श्रमिक हूँ।
जीवन की तृष्णा नहीं मिटी - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 30 अप्रैल, 2022
उठी आज मन गरल विपाशा, हृदय पुष्प को गला गई। जीवन की तृष्णा नहीं मिटी, अस्तित्व जीव का जला गई। गंतव्य से दोनों नयन ड
यही सोचकर आता हूँ - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 29 अप्रैल, 2022
जीवन में अभिलाषा लेकर, घूम रहा हूँ मैं मग में। पथ भी न जाने पथरीला, काँटे चुभते हैं पग में। फिर भी दीप जलाकर मैं, मध

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