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ग़ज़ल

तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है - अकबर इलाहाबादी
  सृजन तिथि :
तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है, बला के पेच में आया हुआ है। न क्यूँकर बू-ए-ख़ूँ नामे से आए, उसी जल्लाद का लिक्खा ह
मेहरबानी है अयादत को जो आते हैं मगर - अकबर इलाहाबादी
  सृजन तिथि :
मेहरबानी है अयादत को जो आते हैं मगर, किस तरह उन से हमारा हाल देखा जाएगा। दफ़्तर-ए-दुनिया उलट जाएगा बातिल यक-क़लम, ज
आह जो दिल से निकाली जाएगी - अकबर इलाहाबादी
  सृजन तिथि :
आह जो दिल से निकाली जाएगी, क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी। इस नज़ाकत पर ये शमशीर-ए-जफ़ा, आप से क्यूँकर सँभाली जाएगी।
कब वो सुनता है कहानी मेरी - मिर्ज़ा ग़ालिब
  सृजन तिथि :
कब वो सुनता है कहानी मेरी, और फिर वो भी ज़बानी मेरी। ख़लिश-ए-ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ न पूछ, देख ख़ूँनाबा-फ़िशानी मेरी।
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही - मिर्ज़ा ग़ालिब
  सृजन तिथि :
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही, मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही। क़त्अ कीजे न तअल्लुक़ हम से, कुछ नहीं है तो अदावत ही सही
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे - मिर्ज़ा ग़ालिब
  सृजन तिथि : 1816
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे, ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे। हसरत ने ला रखा तिरी बज़्म-ए-ख़याल में, गुल
तम जहाँ में पल रहा है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 7 नवम्बर, 2021
तम जहाँ में पल रहा है, रौशनी को छल रहा है। मैं करूँ तो क्या करूँ अब, आग है कुछ जल रहा है। सूर्य भी दिन भर चला औ, शाम हो
दी अगर सबने ढिलाई - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 25 जुलाई, 2022
दी अगर सबने ढिलाई, क्यों नहीं करते भलाई। लोग केवल ढूँढ़ते हैं, अब भलाई में बुराई। जन्म दिन में दीजिएगा, ढेर सी उन
रात भर चराग़ों की लौ से वो मचलते हैं - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 12 जुलाई, 2022
रात भर चराग़ों की लौ से वो मचलते हैं, नींद क्यों नहीं आती करवटें बदलते हैं। भीड़ क्यों जमा की है चाँद ने सितारों की,
बात में भी जान हो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 1 नवम्बर, 2021
बात में भी जान हो, रास्ता आसान हो। बाग़ ने अब ये कहा, कोकिला की तान हो। बुद्धि मानो है प्रखर, झोपड़ी में ज्ञान हो।
हमीं से दूर जाना चाहता है - प्रशान्त 'अरहत'
  सृजन तिथि : जून, 2021
हमीं से दूर जाना चाहता है, तभी वो पास आना चाहता है। नई दुनिया बनाई है वहाँ पर, वही मुझको दिखाना चाहता है। मुझे माल
ज़माने में नहीं कुछ बस तुम्हारा साथ काफ़ी है - प्रशान्त 'अरहत'
  सृजन तिथि : 7 मार्च, 2022
ज़माने में नहीं कुछ बस तुम्हारा साथ काफ़ी है, बिताने को अवध की शाम, ये सौग़ात काफ़ी है। इरादा है अभी मेरा क्षितिज तक स
जीवन तो इक अफ़साना है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 15 नवम्बर, 2021
जीवन तो इक अफ़साना है, मानव का फ़र्ज़ निभाना है। चाकू, कट्टा और कटारी, इन सबका पोषक थाना है। बूढ़ों का ज्ञान लगा अद्भ
ज़माना तो सितमगर है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि :
ज़माना तो सितमगर है, हवाओं का यहाँ डर है। जहाँ में बस झमेले हैं, अमन को चाहने घर है। डकैती पड़ गई होगी, अगरचे पास मे
शोर यूँही न परिंदों ने मचाया होगा - कैफ़ी आज़मी
  सृजन तिथि :
शोर यूँही न परिंदों ने मचाया होगा, कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा। पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था, जिस्म जल
बहारो मेरा जीवन भी सँवारो - कैफ़ी आज़मी
  सृजन तिथि :
बहारो मेरा जीवन भी सँवारो, कोई आए कहीं से यूँ पुकारो। तुम्हीं से दिल ने सीखा है तड़पना, तुम्हीं को दोश दूँगी ऐ नज़ा
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो - कैफ़ी आज़मी
  सृजन तिथि :
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो। आँखों में नमी हँसी लबों पर, क्या हाल है क्या दिखा रहे हो
पंख को आसमाँ चाहिए - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2021
पंख को आसमाँ चाहिए, ज़िंदगी को जहाँ चाहिए। धूप निकली हुई है यहाँ, औ उसे आस्ताँ चाहिए। दीप जलने लगे हैं अगर, पर्व को
बढ़े जा रहे हैं - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 9 जून, 2022
बढ़े जा रहे हैं, चले जा रहे हैं। सद गुरू कृपा बिन, फँसें जा रहे हैं। चकाचौंध माया, ठगे जा रहे हैं। दिखावे की रिश्त
दो जहाँ की हसीं जज़ालत है - नवीन नाथ
  सृजन तिथि :
दो जहाँ की हसीं जज़ालत है, ख़ुल्द से बड़के ख़ूबसूरत है। मुल्क रब की निगाहों सा दिल-जू, पाक एकता की पाक मूरत है। दिल
ये दलीलें और ये इल्ज़ाम यानी - प्रशान्त 'अरहत'
  सृजन तिथि : नवम्बर, 2021
ये दलीलें और ये इल्ज़ाम यानी, वो करेगी अब मुझे बदनाम यानी। बेवजह जो मशवरा देते रहे हैं, अब करूँगा दूर से प्रणाम यानी
जीवन से लुप्त दयानत है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 19 अप्रैल, 2022
जीवन से लुप्त दयानत है, उपदा पाने की उज्लत है। कितनी बार उन्हें समझाया, पर उनकी भद्दी आदत है। हथियारों की होड़ लग
अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं, घर के हालात घर से पूछते हैं। क्यूँ अकेले हैं क़ाफ़िले वाले, एक इक हम-सफ़र से पूछते हैं
किस पर है दुख भारी दुनिया - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 8 अप्रैल, 2022
किस पर है दुख भारी दुनिया, क्या सच है बतला री दुनिया। दुख है तो कारण भी होगा, ठीक-ठीक समझा री दुनिया। कह दे जो महसूस
वो चुपके से बोल गए - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 27 मार्च, 2022
वो चुपके से बोल गए, झट मिसरी सी घोल गए। हमने जब भी सच पूछा, दे बातों में झोल गए। अबतक छुपी मुहब्बत में, करते टालमटो
गुनाह तो नहीं है मोहब्बत करना - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 28 फ़रवरी, 2022
गुनाह तो नहीं है मोहब्बत करना, मगर हाँ जब करो इसकी अज़्मत करना। ये इश्क़ प्यार मोहब्बत जो भी बोलो, है अर्थ तो ज़माने क
रोज़ जोश-ए-जुनूँ आए - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 4 जनवरी, 2022
रोज़ जोश-ए-जुनूँ आए, साथ बख़्त-ए-ज़बूँ आए। अब भला क्या सुकूँ आए, हाँ भला अब ये क्यूँ आए। हाल क्या है कहे क्या अब, जब क
मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे - बशीर बद्र
  सृजन तिथि :
मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे, मुक़द्दर में चलना था चलते रहे। मिरे रास्तों में उजाला रहा, दिए उस की आँखों में जलते र
सितारों से उलझता जा रहा हूँ - फ़िराक़ गोरखपुरी
  सृजन तिथि :
सितारों से उलझता जा रहा हूँ, शब-ए-फ़ुर्क़त बहुत घबरा रहा हूँ। तिरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ, जहाँ को भी समझता जा रह
जितना कम सामान रहेगा - गोपालदास 'नीरज'
  सृजन तिथि :
जितना कम सामान रहेगा, उतना सफ़र आसान रहेगा। जितनी भारी गठरी होगी, उतना तू हैरान रहेगा। उस से मिलना ना-मुम्किन है,

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