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एकान्त - नमन शुक्ला 'नया'
  सृजन तिथि : 17 अप्रैल, 2021
जूठनें ना उठाई, न जूठा पिया। इसलिए दूर संसार ने कर दिया। मोह, संकोच, सम्बन्ध सब त्यागकर, आत्म सन्तोषवश सत्य ही कह सक
पुरुष होना कहाँ आसान है - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 2021
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो, मगर पुरुष होना कहाँ आसान है! पुरुष के सिर पर है ज़िम्मेदारी सारी, पत्नी मेरा हक़ है तुम
विरह गाते हो - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2021
जब मन होता है आते हो। जब जी चाहे तब जाते हो।। आते जाते बिना बताए, हमको अक्सर चौंकाते हो। या तो तुम मनमौजी हो जी, या
निरपेक्ष - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2021
अब क्या लिखा है पत्र में तेरी मैम ने? ओह! पत्र नहीं मैसेज में? पत्रों के ज़माने अब कहाँ रहे! मैसेज आते-जाते हैं अब तो मोब
इसका पैमाना क्या होता है - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2021
सब की नज़रों से गिर जाना क्या होता है। बोलो गिरकर फिर उठ पाना क्या होता है।। कैसे कहा गिरा कोई सबकी नज़रों से, कहो ज़र
जो धरती पर थे - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2021
जो धरती पर थे अब भी हैं धरती पर ही, उनसे सीखो क़दम जमाना क्या होता है।
धब्बे - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2021
मेरी दैवीय (मोटी सी) दैहिक संरचना को देख-देख कर कब मेरी बहन ने मुझे 'गोलू' और गोलू से 'गुल्लड़' की उपाधि से विभूषित कर डा
नारी शक्ति: आदिशक्ति - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2021
आदिशक्ति जगत जननी का इस धरा पर जीवित स्वरूप हैं हमारी माँ, बहन, बेटियाँ हमारी नारी शक्तियाँ। जन्म से मृत्यु तक कि
कम बोलें, मीठा बोलें - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2021
एक आम कहावत है कि अधिकता हर चीज़ की नुकसान करती है, फिर भला अधिक बोलना इससे अछूता कैसे रह सकता है। हम सबको अपने आप की व
छुटकी - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2021
दिसंबर 2020 के आखिरी दिनों की बात है। सुबह सुबह एक फोन कॉल आता है। नाम से थोड़ा परिचित ज़रूर लगा, परंतु कभी बातचीत नहीं ह
वतन से जुड़ो - नमन शुक्ला 'नया'
  सृजन तिथि : 9 जनवरी, 2021
आज तक तुम जिए हो, कलह-स्वार्थ में, अब तनिक राष्ट्र के संगठन से जुड़ो। जाति, भाषा, धरम, प्रान्त सब भूल कर, हिन्द की पूज्
जय जवान जय किसान - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : 2021
भारत माँ के पूत महान, जय हो जवान और किसान। एक देश की रक्षा करता, एक पेट देश का भरता। इनसे ज़िंदा है हिंदुस्तान, जय हो
फूलों सा तुम खिलते रहना - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : 2021
नेकी के रास्ते पर चलते रहना, प्यार से आगे बढ़ते रहना। सफलता रुक नहीं सकती, मेहनत तुम करते रहना। राहों में हैं काँ
बड़ा झमेला है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2021
गाँव लगे हैं ठीक शहर में- बड़ा झमेला है। दरका-दरका लग रहा आकाश। है चुभ रहा काँटों सा भुजपाश।। तारे तो हैं मगर स्
दो बातों को सहना सीखो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2021
दो बातों को सहना सीखो। औ नदिया सा बहना सीखो।। कोई शख़्स गले पड़ जाए, बेबाकी से कहना सीखो। आलीशान महल दे डाला, इन मह
सख़्त शहर नहीं क़बीले हैं - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2021
सख़्त शहर नहीं क़बीले हैं। हरकत से ढीले-ढीले हैं।। लगे हुए जो घर के सम्मुख, कनेर वे पीले-पीले हैं। बादाम-दशहरी या चौ
चिड़िया - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 2021
एक चिड़िया चमन में चहकने लगी, जनक अँगना बहारें महकने लगी। काँध बेटी चढ़े पग चले पग धरे, तात की लाड़ली ख़्वाब पूरे कर
मरहम - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 2021
ज़ख़्म बहुत गहरे हैं उनके, हर आँख यहाँ भीगी है। किस किसके आँसू पोछेंगे, मानवता ही ज़ख़्मी है।। मरहम ही कम पड़ जाएगा, तन
मेंहदी हाथ में झिलमिलाए सदा - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 2021
मेंहदी हाथ में झिलमिलाए सदा। संग ख़ुशियाँ सुता की सुनाए सदा।। पत्तियाँ बाग़ से तोड़ के लाड़ली, हस्त प्रिय प्रेम दु
शिवशरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' - विमल कुमार 'प्रभाकर'
  सृजन तिथि : 18 अप्रैल, 2021
हिन्दी साहित्य के सुविख्यात वरिष्ठ कवि, लेखक, आलोचक, सुधी सम्पादक शिवशरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' समकालीन साहित्य में
सौन्दर्यस्थली कालाकाँकर - विमल कुमार 'प्रभाकर'
  सृजन तिथि : 2 मई, 2021
प्राकृतिक सौन्दर्य की सुरम्यस्थली कालाकाँकर में मैंने अपने जीवन के सुखद दो वर्ष बिताएँ हैं। मैं बी.एच.यू से कालाक
विश्वास - सैयद इंतज़ार अहमद
  सृजन तिथि : 2021
मंज़िल इतनी भी दूर नहीं, कि ख़ुद चल कर, उसे पा न सके, हालात हमारे, इतने न विकट कि अपनों को आज़मा न सके। थोड़ी कोशिश बस बाकी
नसीहत - सैयद इंतज़ार अहमद
  सृजन तिथि : 2021
दूसरों को दोष मत दो, अपनी कारदानियों का। ख़ुद से उपजाई, बे-तुकी परेशानियों का।। तुम ही तो ज़िम्मेदार हो अपनी विफलता
मध्यम वर्ग - सैयद इंतज़ार अहमद
  सृजन तिथि : 2021
संघर्ष करते रहो, कयोंकि तुम मध्यम वर्ग हो, तुम किसके काम के हो, जो कोई तुमको सहारा देगा। तुम में से आगे निकल चुके, ज
तुम्हारी कमी - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 2021
राधिके! आज तुम्हारी कमी, महसूस हो रही है मन को। लगता कोई नहीं है मेरा, तुम्हारे सिवा। कभी डाँटना तो सुन लेती चुपचा
जब यादें उनकी आती - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 2021
जब यादें उनकी आती, आँखें-आँसू भर लाती। थी जब साथ वो मेरे, रहता दुःख अधिक घनेरे। आँखों में सपनें उनके, लेकर ख़ुशियाँ
फागुन में - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 2021
उनकी यादें सताने लगे फागुन में। कोयलिया कूकी डारी पे लगा मुझे तुम बुला रही हो। बंशी सी माधुरी सूरों में सरगम डोर ब
यही सोचता हूँ - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 1980
लिखूँगा तुम पे ग़ज़ल, हर रात यही सोचता हूँ। बनेगी या नहीं कोई बात यही सोचता हूँ।। तुमसे कुछ कह ना सका इसका मलाल है मुझ
यही सच है - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 2021
यही सच है, कि- ज़िन्दगी है तो मौत भी होगी। फिर, मौत से डरना कैसा? बावजूद, हमने देखा है हर शख़्स को ताकते हुए दूर कहीं श
आँखों में आँसू होठों पे नग़्मा - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 2021
आँखों में आँसू होठों पे नग़्मा दिल में उदासी, होगी क्या इससे बुरी हालात यही सोचता हूँ।
सौतेला - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2021
माँ को रोता देख रवि परेशान सा हो गया। पास में बैठे गुम-सुम बड़े भाई से पूछा तो माँ फट पड़ी। उससे क्या पूछता है? मैं ही बत
जीवन में हर व्यक्ति को... - विमल कुमार 'प्रभाकर'
  सृजन तिथि : 2020
जीवन में हर व्यक्ति को अपना कीर्तिमान स्थापित करना पड़ता है। जीवन में परिश्रम ख़ूब करना चाहिए इससे जीवन निखरता है
पुनः धर्मयुद्ध - मनोज यादव 'विमल'
  सृजन तिथि : 2018
बस काल-काल में अंतर है, और समय में थोड़ा परिवर्तन है। नही तो द्युत सभा तो आज भी जारी, और सत्ता का भरपूर समर्थन है। धृ
ख़्वाहिश है बोलता ही रहूँ - मनोज यादव 'विमल'
  सृजन तिथि : 2020
ख़्वाहिश है बोलता ही रहूँ। वहाँ तक, जहाँ तक धरती दम तोड़ती हो। वहाँ तक, जहाँ तक आकाश का किनारा हो। वहाँ तक, जहाँ तक किस
प्रेयसी का ख़त - मनोज यादव 'विमल'
  सृजन तिथि : 2020
बंद लिफ़ाफ़े में आया, मेरी प्रेयसी का ख़त छुपते-छुपाते आया, मेरी प्रेयसी का ख़त। लिफ़ाफ़े की कोर-कोर कुंद हो गई थी लगता ह
महँगाई - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 2021
गैस सिलेंडर महँगा क्या हुआ, बस्ती का हर चूल्हा अब सुर्ख़-ओ-राख़ हुआ। माँओं ने बड़ी कुशलता से सीख लिया था गैस चूल्हा चल
मेरा मुस्तक़बिल नज़र आता हैं - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 2021
सुनकर ये मधुर धक-धक की आवाज़ ये सच मन में जागा है, हो न हो दिल रुपी सरिता में तेरे नाम का कंकड़ तसव्वुर ने फेंका है। तुम
तन्हाई को लगी हैं उम्र तो लगने दें - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : जुलाई, 2020
तन्हाई को लगी हैं उम्र तो लगने दें, ज़िंदा रहना हैं तो घर पर रहने दें। जिसने बेचा हैं ईमान दूकानदारी में, लानतें आएग
संघर्ष सफलता की कुंजी है - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 2020
संघर्ष एक ऐसा अनुभव है, जो जीवन में आने वाली हर एक पड़ाव को पार करने के लिए एक मूल्यवान अस्त्र के तरह हमारे सामने आ खड
स्त्री तू ही क्यों? - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 15 जनवरी, 2021
स्त्री तू ही क्यों अपने शब्दों को मिटाकर अपने ही एहसास को मन में ही मार देती है...! स्त्री तू ही क्यों अपने भीतर की श
मज़दूर की क़िस्मत - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 2021
ऊँचे कँगूरे किलों में, मीनार और महलों में, अपना ख़ून पसीना लगाता हूँ। संगमरमर से सुंदर दीवार सजाता हूँ।। शाम को चटन
टेक्नोलॉजी और शिक्षा - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 2021
प्रौद्योगिकी विषय अंग्रेजी में टेक्नोलॉजी के नाम से जाना जाता है। यह एक ग्रीक शब्द "टेकनॉलाजिया" से लिया गया है जह
मेरी प्रिय - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 2021
तुझको ना देखूँ तो मन घबराता है, तुझ से बातें करके दिल बहल जाता है। मेरा खाना पानी भूल जाना, तुझे भूखी देखकर तुरंत खा
प्रेम की फ़सल - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
वक़्त के साथ सोहन भी बड़ा हो रहा था, जिस क़बीले में वो रहता था। वहाँ अक्सर लड़ाई-झगड़ा, गाली-गलौज लोग एक दूसरे को बिल्कुल न
शाम ढले घर का रस्ता देख रहे थे - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 2021
शाम ढले घर का रस्ता देख रहे थे। कुछ क़ैद परिन्दे पिंजरा देख रहे थे।। सब बच्चे देख रहे थे खेल खिलौने, और मियाँ हामिद
कोरोना योद्धाओं को सलाम - संस्कृती शाबा गावकर
  सृजन तिथि : सितम्बर, 2020
कोरोना वैश्विक महामारी ने अब तक पूरी दुनिया को अपने चपेट में ले लिया है। दुनिया भर में इस वाइरस की वजह से संक्रमण तथ
शिक्षित बेरोज़गारी की समस्या - संस्कृती शाबा गावकर
  सृजन तिथि : मई, 2021
"तड़प रही है भूखी जनता, विकल मनुजता सारी। भटक रहे है नवयुवक देश के, लिए उपाधियाँ भारी॥ काम नहीं, हो रहे निकम्मे, भारत क
उसकी अब रहबरी हो गई है - दिलशेर 'दिल'
  सृजन तिथि : 2021
उसकी अब रहबरी हो गई है। ज़ीस्त आसान सी हो गई है।। हर तरफ़ रोशनी हो गई है, शायरी जब मिरि हो गई है। अब अकेले नहीं चल सकू
उसकी अब रहबरी हो गई है - दिलशेर 'दिल'
  सृजन तिथि : 2021
उसकी अब रहबरी हो गई है। ज़ीस्त आसान सी हो गई है।।
रोशनदान - मनोज यादव 'विमल'
  सृजन तिथि : 2020
खुली किताब से धूल झाड़ लो तो पूछो, नई सुबह का आग़ाज़ देख लो तो पूछो। कहीं कुछ भूल तो नही गए हो घबराहट में तुम, ज़रा भूल को
आओ मिल कर पेड़ लगाएँ - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 2021
आओं सभी मिल कर पेड़ लगाएँ, पर्यावरण को साफ़ स्वच्छ बनाएँ। पेड़ो से ही मिलती है ऑक्सीजन, जिससे जीवित है जीव और जन।।
संविदा शिक्षक का दर्द - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 1 फ़रवरी, 2014
मास्टर साहब हमारा बक़ाया कब दोगे? भाई दे दूँगा तनख्वाह आने दो। अगर आप हमारे मुन्ने को कुछ दिन पढ़ाये ना होते तो कसम स
बस यही कहानी है - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 2021
पापा की परियों की बस यही कहानी है, आँखो मे है सपने और थोड़ा सा पानी है। जुनून है हौसला है आगे बढ़ने के लिए, इस लिए सब
कहानी नहीं हैं - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 2021
माना कि मुझमें अभी वो रवानी नहीं हैं, लेखनी निखार दे वो कहानी नहीं हैं। कोशिश भी ना करूँ गिर कर उठने की, इतनी कमज़ोर
इश्क़ से गर यूँ डर गए होते - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 5 अप्रैल, 2021
इश्क़ से गर यूँ डर गए होते। छोड़ कर यह शहर गए होते।। मिल गए हमसफ़र से हम वर्ना, आज तन्हा किधर गए होते। होश है इश्क़ में
सौंदर्य - सतीश मापतपुरी
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
तुम खुले केश छत पे ना आया करो, शब के धोखे में चँदा उतर आएगा। बेसबब दाँत से होंठ काटो नहीं, क्या पता कौन बे-वक़्त मर जाए
मन - रमेश चंद्र बाजपेयी
  सृजन तिथि : 2020
मन से उत्पन्न हुए कई विकार मन से बनी कितनी ही बातें, मन ही देता है अभिव्यक्ति जिसने दी कल्पना की सौग़ातें मन के लड्
संघर्ष - सलिल सरोज
  सृजन तिथि : 2020
जीवन की शुरुआत के बारे में कोई निर्णायक सबूत नहीं है। हमने अनुमान और शोध किए हैं। हम सच्चाई के बहुत क़रीब आ गए हैं, या
हे जगत जननी! तुझे प्रणाम - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 2021
गोद में बालक है, कर में बालटी, या सर में डलिया खाद गोबर, या है गट्ठा लकड़िया या घास भारी, सर पे इतना बोझ, उसके रोज़ है। प
जाने क्यों लोग - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 2021
जाने क्यों लोग राह से यों, भटक जाते हैं। जाने क्यों लोग...।। दर्द सह लेते हैं, दवा नहीं लेते हैं। दर्द सस्ता, दवा को म
जलना उचित है - दीपक राही
  सृजन तिथि : मई, 2021
उन सब धारणाओं का, जलना उचित है, जो करती है भेद, मनुष्य का मनुष्य से। मेरा जलना उचित नहीं, उन सब विचारों का, जलना उ
जवानी - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : मई, 2021
हँसाए जवानी रुलाए जवानी। अजी रंग कितने दिखाए जवानी।। मिले मुश्किलें ज़िंदगी में हमेशा, कि हर मोड़ पर आज़माए जवानी।
माँ कात्यायनी वन्दना - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
हे! मात! नत मस्तक नमन नित, वन्दना कात्यायनी। अवसाद सारे नष्ट कर हे, मात! मोक्ष प्रदायनी। हे! सौम्य रूपा चन्द्र वदनी,
शारदे वन्दना - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
तुम्हें कर जोड़कर माँ शारदे प्रणाम करता हूँ। हमें सुरताल दो माता तुम्हारा ध्यान करता हूँ। मिटाकर द्वेष माँ मेरे ह
माँ अम्बे स्तुति - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 25 मार्च, 2021
नमामि मातु अम्बिके त्रिलोक लोक वासिनी! विशाल चक्षु मोहिनी पिशाच वंश नाशिनी!! समस्त कष्ट हारिणी सदा विभूति कारिणी!
गणेश वंदना - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
पधारो देव शिवनंदन। करूँ मैं आपका वन्दन। न पूजा पाठ पूरा है। तुम्हारे बिन अधूरा है। प्रथम तुम पूज्य प्रथमेश्वर।
अवध में जन्मे हैं श्रीराम - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 15 अप्रैल, 2021
हुए सब हर्षित हैं पुर ग्राम। अवध में जन्मे हैं श्रीराम। बज रहे ढोल नगाड़े साज। छा गईं घर घर ख़ुशियाँ आज। मचा है चहुँ
कृष्ण वन्दन - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 25 अप्रैल, 2021
जय मोहन माधव श्याम हरे। मधुसूदन रूप ललाम धरे।। धर ध्यान करूँ विनती मन से। अँधियार मिटे इस जीवन से।। प्रभु निर्मल
आवारा परदेशी - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : जून, 2021
मै आवारा परदेशी हूँ, मेरा नही ठिकाना रे, ओ मृग नयनों वाली सुन ले, मुझसे दिल न लगाना रे। जब तीर नज़र का किसी जिगर को पा
क्या तुम मेरे हो - प्रवीण श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
सर्वस्व त्याग किया मैंने, प्रेम भी, दुख भी, और वह अहसास भी जो कभी मन में था कि तुम मेरे हो, तुम मेरे हो। जीवन मे तुम्ह
आशा दीप - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : मई, 2021
आओ आशा दीप जलाएँ। अंधकार का नाम मिटाएँ।। फूलों से महकें महकाएँ, दुखियारों के दुःख मिटाएँ। रूह जलाकर ज़िंदा रहना,
सदा सुखी रहो बेटा - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : जून, 2021
रिटायर्ड इनकम टैक्स ऑफिसर कृष्ण नारायण पांडे आज अपनी आलीशान कोठी में बहुत मायूसी महसूस कर रहे थे, क्योंकि उनकी दो
जगत जननी दुर्गमा - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2020
हे! माँ जगत जननी दुर्गमा, अब विश्व का कल्याण कर दे। हम सभी तो शिशु तुम्हारे, प्यार का आँचल प्रहर दे। हे! दयामयि हे!
समर्पण - अभिषेक अजनबी
  सृजन तिथि : 2021
हम बुलाते रहे, वह भूलाते रहे। इश्क़ में ख़ूब जलते जलाते रहे।। वह हमें छोड़ करके चले ही गए, हम उन्हें आज तक गुनगुनाते
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 10 अप्रैल, 2021
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम। बनो तो मिरी शोअरा तुम।। ये सोना ये चाँदी ये हीरा, है खोटा मगर हो खरा तुम। तिरा ज़िक्र हर बज़
नज़ारे - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 20 मार्च, 2021
देखते ही खूबसूरत नज़ारे... एक चित्रकार उतार लेता है नज़ारों को कैनवास पर, एक फ़ोटोग्राफ़र क़ैद कर लेता है उन नज़ारों को कै
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 10 अप्रैल, 2021
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम, बनो तो मिरी शोअरा तुम।
आबादी अवसर या अवसाद - परमजीत कुमार चौधरी 'सोनू'
  सृजन तिथि : 11 जुलाई, 2021
आज जनसंख्या दिवस है यानी 11 जुलाई 2021। आज के दिन में ही उत्तर प्रदेश की सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण क़ानून की ड्राफ्ट पे
सतत विकास में कहाँ हैं हमारा समाज? - परमजीत कुमार चौधरी 'सोनू'
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
हमारा देश और समाज निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर है और हमने काफी सारे उपलब्धियां भी हासिल की है। परंतु क्या हमारा समा
क्या क्या देखा - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : मार्च, 2021
बदला इंसान नही, हटा उसका मुखौटा देखा। मैने तो बदलते ज़ुबान अरु, पलटते इंसान को देखा।। भाई-भाई में जंग लड़ते देखा, प
कोख का बँटवारा - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : जून, 2021
रामनारायण के दो बेटों का नाम रमेश और सुरेश है। युवा अवस्था में रामनारायण के मृत्यु होने के बाद उनकी पत्नी रमादेवी
कमी हैं एक दोस्त की - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 23 अप्रैल, 2021
जो बिन कहे, मेरा हाल समझ ले! ख़ुद तो पागल हो, मुझे भी पागल कर दे! अल्फ़ाज़ कम, ख़मोशी ज़्यादा समझे! उदासी में भी हँसा दे,
मिलेगी एक दिन मंज़िल - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : जून, 2021
मिलेगी एक दिन मंज़िल अभी यह आस बाक़ी है। अजी मकसद अभी तो ज़िंदगी का ख़ास बाक़ी है।। रहेगा कुछ दिवस पतझड़ उसे हँस कर गुज़ार
तन पर यौवन - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2020
ओ रे बचपन! फिर से सच बन। मायूसी में, ख़ामोशी में, चिंताओं में, दुविधाओं में, निर्धनता में, नीरसता में, पीर भुलाकर कर
मिलेगी एक दिन मंज़िल - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : जून, 2021
मिलेगी एक दिन मंज़िल अभी यह आस बाक़ी है। अजी मक़सद अभी तो ज़िंदगी का ख़ास बाक़ी है।।
उपहार - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : मार्च, 2021
हमें जो मिला है ये मानव शरीर इस पर गर्व कीजिए, इसे ईश्वर से मिला ख़ूबसूरत उपहार समझिए। उपहार मिलने पर जैसे हम नाचत
ख़ुद का निर्माण करें - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
मानव जीवन अनमोल है, इस बात से इंकार कोई नहीं करता। परंतु यह भी विडंबना ही है कि ईश्वर अंश रुपी शरीर का हम उतना मान सम्
बात बिगड़ गई बात बताने में - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 20 अप्रैल, 2021
बात बिगड़ गई बात बताने में, यार हिचकते हाथ मिलाने में। चौकीदार चुरा ले गया जेबर, लोग बिजी थे फूल लगाने में। देखी दु
मुझे सब याद है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 17 जनवरी, 2021
मुझे सब याद है! तपती ज़िन्दगी की उदास दोपहर में; तुम गुलाब की सुगंध की तरह; मेरी हृदय में समाई थी। अपने अलकों को बिख
हारना हमको नहीं गवारा - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
जिगर में हमारे आग हम रखते, बाँधे है कफ़न काल से न डरते। दहाड़ मारकर शिकार है करते, शेरों बीच रहे किसी से न डरते।। कठि
अपनी ज़िम्मेदारी समझो - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 24 अप्रैल, 2021
अपनी ज़िम्मेदारी समझो, आदतें छोड़ क्यों नही देते,  समाज की धारा में बहो, बेइज़्ज़ती छोड क्यों नहीं देते। रात को लौटते
माँ की ममता - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 26 फ़रवरी, 2021
माँ की ममता जगत निराली, माँ के बिन सब खाली-खाली। अजब निराली छाया है, माँ का हाथ हो सिर पर जिसके, अनहोनी सब दूर को खिस
जलता जाए दीप हमारा - अनिल मिश्र प्रहरी
  सृजन तिथि : 2020
मिट्टी के दीपों में भरकर तेल-तरल और बाती, तिमिर-तोम को दूर भगाने को लौ हो लहराती। मिट जाए भू का अँधियारा, जलता जाए
ह्यूमर उर्फ़ हास्य - अमृत 'शिवोहम्'
  सृजन तिथि : 30 दिसम्बर, 2020
ह्यूमर; जी हाँ यही वह शब्द है जो सदा से प्रचलन में तो है, मगर जिसके बारे में अभी तक ज़्यादा लिखा नहीं गया है। अंग्रेजी
कर्मवीर बनो - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 8 अक्टूबर, 2020
विधाता को क्यों कोसना जब कर्म पर हैं भरोसा विधाता ने सर्वांग सही सलामत दिए तो भाग्य पर क्यों रखते हो आशा...? बिना क
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2020
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं। जिनपर किया भरोसा वो ही बदल गए हैं।। हालात हैं बुरे तुम वो छोड़कर चले हो, अरमान
आओ इस धरा को हरित बनाएँ - संतोष ताकर 'खाखी'
  सृजन तिथि : जून, 2021
आओ इस धरा को हरित बनाएँ एक एक पेड़ से कर शुरुआत, आओ क़सम ये खाएँ, यह सिलसिला बारंबार अपनाएँ, आओ इस धरा को हरित बनाएँ।
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2020
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं। जिनपर किया भरोसा वो ही बदल गए हैं।।
आने वाला कल अच्छा है - रमेश चंद्र बाजपेयी
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2020
मनसा, वाचा, कर्मणा से, सरसब्ज़ हैं आप, तो आने वाला कल अच्छा है। मन से परोपकार करना, मन से किसी दिल को सांत्वना देना, यह
जय हिन्द जय हिन्द की सेना - सतीश मापतपुरी
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
नहीं छोड़ना उस कायर को, सीमा पर जो चढ़ा सियार। आर-पार का करो फ़ैसला, मारो खींच गले तलवार।। सबक़ सिखाना होगा इनको, जो भारत
कर भला तो हो भला - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 6 जुलाई, 2021
"क्या हुआ मोहन, इतने उदास क्यों हो? तुम तो इंटरव्यू के लिए गए थे, क्या हुआ तुम्हारी नौकरी का?" -जाड़े के दिनों में मोहन
दे दे मुझको तेरा हाथ - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
ना मुझे धन दौलत, ना मुझे स्वर्ग चाहिए। साथ रहो बस तुम मेरे, ऐसा प्यार भरा पल चाहिए।। नयनों में बसे हो बस एक दूजे के
फ़रमान करें तो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 1983
आओ हम संधान करें तो। सिर चढ़ता अभिमान करें तो।। गर नायाब ग़ज़ल लिखना है, रुक्न, बहर, अरकान करें तो। पैसों की लालच
वक़्त सुन कुछ बोलता है - अनिल मिश्र प्रहरी
  सृजन तिथि : 2020
हर क़दम निर्भय बढ़ाना, दृष्टि मंज़िल पर गड़ाना, राह की उलझन अमित से मन विकल क्यों डोलता है? वक़्त सुन कुछ बोलता है।
कैसी दुनिया - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 8 जुलाई, 2021
ईश्वर कैसी दुनिया है तेरी, यहाँ रोते लोग हज़ारों हैं। मंदिर में छप्पन भोग लगें, प्रभु फल मेवा भण्डारे चुगें, तरसते
किरदार - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 2 मार्च, 2021
असली किरदार को कोई जानता नहीं, नक़ली किरदार के चर्चे बड़े हैं। सच्चे ग़रीब की कोई मानता नहीं, झूठे अमीर के साथ खड़े ह
एकता की शक्ति - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 27 जनवरी, 2021
मैं हूँ साथ खड़ा तेरे, फिर डरने की क्या बात, हौसला उम्मीद से कर लेंगे, ये नौका भी पार। तू बन तो सही हिम्मत मेरी, कर थोड़
समय प्रबंधन - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 1 फ़रवरी, 2021
मैं बहुत व्यस्त हूँ, या मेरे पास समय नहीं है, क्या ये वाक्य हमारे जीवन में बाधक है? यह एक बहुत ही दिलचस्प सवाल और समस्
कामयाबी का परिणाम - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 1 जुलाई, 2021
एक छोटे से गाँव की बात है जहाँ चरनदास का परिवार रहता था जिसके दो बेटे राम और श्याम थे। राम और श्याम की माता कमला देवी
वह तो झाँसी वाली रानी थी - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 18 जून, 2021
चलो सुनाऊँ एक कहानी जिसमें एक रानी थी, मुख से निकले तीखे बाण वो शमशीर दिवानी थी। थी वो ऐसी वीरांगना उसकी शौर्य भर
सावन की बरसात - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
आया बरसात का मौसम झूमले, बादल आए झूम झूमके और बादलों को चूमले। ऋतु बदली गया ज्येष्ठ आषाढ़ साल का था इंतज़ार माह बद
लेखनी - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 16 जुलाई, 2021
उम्र के इस गुज़रते पड़ाव में, लिखना जब शुरू किया मैने। लेखनी से हुई दोस्ती मेरी, ज़िंदगी का नया रूप जिया मैने। भावों
निशा चुभाती ख़ंजर - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 14 जुलाई, 2021
प्रेम रस में तेरे, भीगा मेरा मन। तुम हो प्रिये, साहित्य की रतन।। शब्दों की तुम, पिरोई हो माला हो। साहित्य की तुमन
भोर की प्रतीक्षा में - प्रवीण श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2020
सुधा गृह कार्य से निपटकर आराम करने की ही सोच रही थी कि अचानक किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी। मन ही मन कुढ़ती हुई सुधा दरवा
माँ - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
माँ ने मुझे जना, माँ ने मुझको पाला। माँ ने रखा मुँह में मेरे, भोजन का प्रथम निवाला।। माँ ने आँचल में ढककर, है मुझक
अनेकता में एकता - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 26 फ़रवरी, 2021
आओ यारो फिर से, आदर्शवादी स्वरूप की, शृंखला से जुड़ जाएँ। लोकाचारी निर्मित करके, एक नई कहानी लिख जाएँ। हर वक़्त की कश
माँ की परिभाषा - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 16 जुलाई, 2021
वह पढी लिखी नहीं, लेकिन ज़िंदगी को पढा है। गिनती नहीं सीखी लेकिन, मेरी ग़लतियों को गिना है।। दी इतनी शक्ति हर जिव्हा
हिन्दी मेरी पहचान - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2020
आज हिन्दी है तो अपनी बात रख पाता हूँ, अंग्रेजी नहीं आती तो कहाँ पछताता हूँ। अपनी कहूँ तुम्हारी सुनूँ ये हुनर हिन्द
माँ की ममता - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 5 मई, 2021
तुम्हारे हर रुप को मेरा वन्दन है माँ, तेरे इन चरणों को मेरा प्रणाम है माँ। माँ तू ही यमुना और तुम ही जमुना, तुम ही गं
सुन लो सारे - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 20 मई, 2021
रफ़ कॉपी में रंग रखों तुम अब मुक़म्मल सारे, तुम्हें लिखना होगा पढ़ते रहना होगा गरचे स्कूल बंद हो सारे। रूह के लिबाज़
मोगरे का फूल - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 28 अप्रैल, 2021
चश्म-ओ-गोश के तट पे चिड़िया चहचहाने आई, रिज़्क़ लाज़िम हैं, उठ ना, बख़्त कहता है। अब तक ना सजी मिरी सुब्ह-ओ-जीस्त, बग़ैर ति
हालात - दीपक राही
  सृजन तिथि : मई, 2021
मौजूदा हालात का, क्या हम ज़िक्र करें, जो आने वाला है, उसकी फ़िक्र करें, पार्क भी यहाँ शमशान बने, पानी में है लाशें बहे
मददगार - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 5 मई, 2021
वर्तमान में समय और माहौल विपरीत है, हर ओर एक अजीब सा ख़ौफ़ फैला है, ख़ामोशी है, सन्नाटा है कब क्या होगा? किसके साथ होगा?
हमारी राय शुमारी अगर ज़रूरी है - दिलशेर 'दिल'
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2020
हमारी राय शुमारी अगर ज़रूरी है। हमे भी मुल्क की रखनी ख़बर ज़रूरी है।। हरा भरा हो अदब का चमन हमारा तो, हमारे घर में सुख़
हौसला - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : 14 जनवरी, 2021
ना रहता सदा अँधेरा, नित होता नया सवेरा, नित होती है प्रभात, और नित बदल रहे हालात। कर हौसले के साथ, अपनी ज़िंदगी की शुर
अपनों का साथ - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 30 नवम्बर, 2020
साथ अगर हो अपनों का, ये सौग़ातें क्या कम हैं, ख़ुशियाँ दूनीं हो जातीं, साथ में तुम और हम हैं। रिश्ता लम्बा रखना हो तो,
एक मुलाक़ात ख़ुद से - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 12 मई, 2021
औरों से तो सब मिलते हैं, ख़ुद से न होती मुलाक़ात। आज ख़ुद को ख़ुद से मिलाया, यह भी हुई नई एक बात। औरों का साथ ढूँढता हर को
मनोहर पहाड़ - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 5 मार्च, 2021
हरियाली के आँचल में बसती चलती साँसें मेरी, सुखद, शीतल समीर में उड़ती जाती आशाएँ मेरी। मनोहर पर्वत पहाड़ों में बस
नज़रिया - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : जून, 2009
बदल दिया नज़रिया इंसानों ने सोचने का, सही और ग़लत को ना पाए समझ, जब सामने थी अपने मंज़िल, तो भूल चुका था मंज़िल पाने का रा
साहित्यकारों की हर एक रचना... - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 19 जुलाई, 2021
साहित्यकारों की हर एक रचना, उनकी बेशकीमती सम्पत्ति व एक उपलब्धि है।
एक तुम जो छेड़ दो - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 2021
एक तुम जो छेड़ दो हज़ारों तरंगे उत्पन्न हो जाए ह्रदयतल में, तुम जो करो निगहबानी शत् शत् कमल दल खिले अन्त:तल में, अपने
मेरे पापा - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 20 सितम्बर, 2019
शान मान और अभिमान हैं पापा। मेरे जीवन की पहचान हैं पापा। पापा है तो हर सपने अपने, हर मुश्किल का आसान हैं पापा। जर ज़
अपनी अनुभूति - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 2017
बदहवास है हवा की झोंके, यह ज़िंदगी के उलझे हुए नशा, यह संसार के अभावनिय स्थिति, और मनुष्य के मन में भरी हुई अनगिनत चाह
तुम मानव बनना भूले हो - मनोज यादव 'विमल'
  सृजन तिथि : 2016
तुम प्रश्न करना भूले हो, तुम संवेदना को भूले हो। तुम्हे इल्म नही इतना सा की तुम हुक़ूक़ माँगना भूले हो।। तुम सच बोल
वसुंधरा - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 1 अप्रैल, 2021
आसमान रूठ गया, हुई धरती लहूलुहान। जानवर भी रो रहें, पेड़ हुए निष्प्राण। पहाड़ मिट रहें, सुख रही नदियाँ। जाने कहा
रुक ना जाना तू कहीं हार के - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 14 अप्रैल, 2011
जीतता चल राह के हर दंश को तू मारके, रुक ना जाना तू कहीं हार के। तेरी मंज़िल तुझमें है ये तू जान ले, वीर तुझसा नहीं है ज
यारों कोशिशें भी कमाल करती है - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 27 मार्च, 2016
यूँ ही नहीं मिल जाती मंज़िल, सिर्फ़ एक पल भर सोचने से, इंसान की कोशिशें भी कमाल करती हैं, यूँ ही नहीं मिलती रब की मेहरब
नव वर्ष किरण - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 1 जनवरी, 2021
नव नूतन आशा रश्मि बिखरी दिशि चहुँओर, क्षितिज से आई सलज्ज मनभावन सी भोर। प्रफुल्ल उल्लिसित होकर तन मन महक उठा, नई र
प्यार वही है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : मई, 2009
टूट गई तलवार मगर धार वही है, छूट गई मुलाक़ात मगर प्यार वही है। ऐसा कोई संयोग कहाँ, जिसमें छुपा वियोग न हो मिलता उसे
लॉकडाउन और बढ़ती बेरोज़गारी - संस्कृती शाबा गावकर
  सृजन तिथि : सितम्बर, 2020
क्या कोरोना के फैलने के ख़ौफ़ से देशभर में लॉकडाउन की स्थिति पैदा कर बेरोज़गारी को जन्म दिया? दुनियाभर में फैले कोरोन
गाँव में नई सोच - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 2016
सीखा था जो शहर में सिखाना उसे चाहता हूँ, गाँव में एक नई सोच पैदा करना चाहता हूँ। पढ़े बेटा बेटी भविष्य उनका सँवारना च
डगमगाते क़दम - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 12 जून, 2019
मैने डगमगाते क़दमों को देखा है, उन बूढ़ी हड्डियों  को लाठी का सहारा लेते देखा है। पाल-पोसकर बड़ा किया जिस औलाद को
गुरुवर की महिमा - संतोष ताकर 'खाखी'
  सृजन तिथि : 23 जुलाई, 2021
मस्तिष्क के कोने कोने में ज्ञान से रिक्त को, ह्रदय के क़तरा क़तरा भाव से रहित को, कर ज्ञान भाव से युक्त एक सार्थक उत्प
यूँ न खेला करो दिल के जज़्बात से - सतीश मापतपुरी
  सृजन तिथि : 1975
यूँ न खेला करो दिल के जज़्बात से। ज़िन्दगी थक गई ऐसे हालात से।। रोज़ मिलते रहे सिर्फ़ मिलते रहे, अब तो जी भर गया इस मुल
आप भी आ जाइए - सतीश मापतपुरी
  सृजन तिथि : 1976
कब तलक मैं यूँ अकेला इस तरह जी पाऊँगा। इस निशा नागिन के विष को कैसे मैं पी पाऊँगा। इस ज़हर में अधर का मधु रस मिला तो जा
नाम लिखा दाने-दाने में - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 21 जुलाई, 2021
नाम लिखा दाने-दाने में। लुत्फ़ मिला करता खाने में।। सात सुरों की उड़ती खिल्ली, रेंक-रेंक कर है गाने में। उनने उल
प्रेयसी के प्रति - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 6 सितम्बर, 2020
प्रेम का सुखद पल अच्छा था! उन क्षणों में; जब मैं पास होता, बिल्कुल पास। बातों ही बातों में सब कुछ लुटा देता अपना ज्
मित्रता - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 15 अप्रैल, 2010
जीवन में ग़म बहुत है, लेकिन है इक बात। सारे ग़म कट जाते हैं, यदि हो मित्र का साथ। यदि हो मित्र का साथ, सुख दुःख में काम
आम आदमी और कोरोना - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : मई, 2020
यह जीवन जितना दुर्लभ है उतना ही जीना दुष्कर। हमारा देश विगत दो सालों से जिस विषम परिस्थितियों से गुज़र रहा है, उसका
ओटीटी (ओवर-द-टॉप): एंटरटेनमेंट का नया प्लेटफॉर्म - सलिल सरोज
  सृजन तिथि : 22 जुलाई, 2021
ओवर-द-टॉप (ओटीटी) मीडिया सेवा ऑनलाइन सामग्री प्रदाता है जो स्ट्रीमिंग मीडिया को एक स्टैंडअलोन उत्पाद के रूप में पे
गुरु का महत्व - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 24 जुलाई, 2021
जल जाता है दीये की तरह जीवन रोशन कर जाता गुरु। ख़ुद रखे अँधेरा दीपक की तरह जीवन को प्रकाशित करता गुरु।। सड़क की तरह
संशय के दरवाज़े - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 5 दिसम्बर, 2019
आँखें- सपने बग़ैर भग्न खंडहर लगतीं हैं। समय उलूक सा आज बोल रहा। संशय के दरवाज़े खोल रहा। उम्मीदें भी मन को- इक ठगि
चाँद से चेहरे को तारों से सजा रखा है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2021
चाँद से चेहरे को तारों से सजा रखा है। अपने प्रियतम को पलकों में छुपा रखा है।। भूल न पाऊँगा तुझको किसी भी सूरत में,
पतंग की उड़ान - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 23 जुलाई, 2021
पतंग भरती जैसे उड़ान, बढ़ेगा वैसे मेरा मान। सफलता मेरे पंख होंगे, खुला होगा मेरा आसमाँ।। इरादे मेरे बुलंद होंगे,
सुन री हवा तू धीरे चल - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 14 जून, 2021
सुन री हवा तू धीरे चल उसके सर से दुपट्टा सरक रहा है... सज सँवरकर निकली है वो यहाँ सारा चमन महक रहा है। सौन्दर्य ऐसे
तुम ही हो - गौतम कुमार कुशवाहा
  सृजन तिथि : 25 मार्च, 2020
तुम ही अरमान हो मेरी, तुम ही जान हो मेरी। तुम ही दुश्मन, तुम ही दोस्त, तुम ही सारा जहान हो मेरी।। मेरे आँखों का तारा
प्रकृति संरक्षण - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2021
सुन बदरा रे! हैं विकल जीव सारे, शिथिल सब थके हारे। तप्त हलक अधरा रे! सुन बदरा रे! सूखे ताल-तलैया, अब कौन ले बलैया?
सत्य - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2020
प्रेम राग बनी रहे, हर हाल में सच बोलिए। बात से कब क्या घटे, तकरार में रस घोलिए।। आसमाँ झुकता रहा, उस व्यक्ति के पग मे
पूनम की चाँद - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2020
सुहाग सेज पर बैठी, जब पूनम की चाँद। तब पूरी हुई मेरी, वर्षो की फरियाद।। आज जगत निहार रहा, कौन धनी है यार। घनी अमावस क
व्यथा धरा की - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2020
चीख़ रही धरती। कौन सुने विनती।। दोहन शाश्वत है। जीवन आफ़त है।। बाढ़ कभी बरपा। लाँछन ही पनपा।। मौन रहूँ कितना!
इंतज़ार - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2020
ग़ज़ब की छुअन थी रोमांचित था तन-मन, हया आँखों में थी आग दोनों तरफ थी। चुप्पी थी फिर भर न जाने क्यूँ हम दोनों रुके थे
वो बारिश का दिन - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2021
वो बारिश का दिन, रहे लवलीन, काग़ज़ी नाव, अच्छे थे। हम बच्चों का दल, देखते कमल, लड़ते थे पर, सच्चे थे।। लड़कपन थी ख़ूब, कीच
इन वादियों में - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 2021
इन वादियों में आकर दिल मेरा बहल गया, बहार देखकर हर तरफ़, मेरा मन मचल गया। इन वादियों में... रंग बिरंगे पुष्पों को चूम त
गुरु - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 24 जुलाई, 2021
गुरु अपने सभी शागिर्दों पर रहमतें बरसाता है अगरचे ज़ुबाँ से बरसे या मास्टरजी के दिव्य डंडे से। जिसने ये ईल्म, नेमते
एक वृक्ष की पीड़ा - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : मई, 2021
मैं वृक्ष हूँ। प्रकृति का फेफड़ा हूँ, मैं निःसंदेह निःस्वार्थ भाव से प्रकृति के संचालन में अनवरत अथक संघर्ष करता ह
विश्वगुरु बनने की राह पर भारत - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 12 जुलाई, 2021
भारत सदा ही विश्वगुरु रहा है जिसका केंद्र बिंदु आध्यात्म रहा है। अध्ययन, आराध्य और आध्यात्म का समायोजन भारत को फिर
डर ही डर - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 25 जुलाई, 2021
कोरोना का आतंक अभी कम हुआ नहीं, कि शुरू हो गया, कुदरत का ये द्वितीय क़हर है। गाँव हो या शहर, नदी या नहर, फँसी ज़िन्दगी, ड
नयापन की तलाश - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
मानव हैं हम हमें थोड़ा नहीं कुछ अधिक चाहिए रिश्ते अब हो चुके हैं पुरानी इसमें हमें परिवर्तन चाहिए...!! आज जो हैं उ
साक्षी हो कर भी मुकर गए - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 19 जुलाई, 2019
साक्षी हो कर भी मुकर गए, ज़मीर पल में क्यों बिसर गए। माँ-बाप भगवान लगते थे, आँखों से अब क्यों उतर गए। विडियो बनाने म
शुरू नॉविल किया पढ़ना लगा वो रहबरी वाला - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
शुरू नॉविल किया पढ़ना लगा वो रहबरी वाला, सफे दो चार पलटे थे कि निकला रहज़नी वाला। गुज़ारिश है यही चश्मा हमें धुँधला क
मेरा सफ़र भी क्या ये मंज़िल भी क्या तिरे बिन - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 27 अप्रैल, 2021
मेरा सफ़र भी क्या ये मंज़िल भी क्या तिरे बिन, जैसे हो चाय ठंडी औ तल्ख़ यूँ पिए बिन। दीद बिन आपके मेरी ज़िंदगी तो जैसे, यू
हक़ हैं हमें भी कहने दो - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 30 जनवरी, 2021
हक़ हैं हमें भी कहने दो, बेटी हूँ हमें भी शान से जीने दो। हम भी करेंगे ऊँचा काम मत रोको हमें, आगे बढ़ने दो, बेटी हूँ
गहराई ज़िंदगी की - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 18 अगस्त, 2018
ज़िंदगी खेल नहीं है, जितना सरल दिखती है, उतनी ही कठिन, प्रतीत होती है। हर वक़्त दिखता, जो गहरा समंदर है, कभी उलझो तो, क
मेहनत के साथ स्मार्ट वर्क ज़रूरी - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 24 अक्तूबर, 2019
दोस्तों यह बहुत ही अच्छा और उचित सवाल है कि मेहनत तो हम बहुत करते हैं, लेकिन हमें मन मुताबिक़ सफलता का परिणाम हासिल न
ज़िंदगी के रूप रंग - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 29 मार्च, 2021
हर एक के लिए अलग रूप है ज़िंदगी किसी के लिए यह जन्नत है तो किसी के लिए जहन्नम है ज़िंदगी...! जहाँ बेरोज़गार के लिए रोज़गा
ख़ुशबू के जाम - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2020
नदिया के घाट पर मेले की धूमधाम। लहरें मेले की ले रहीं बलैंया। औरतें घूमतीं शिशु को ले कैंया।। है चहल-पहल मेले की
जमकर भड़के हैं - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 30 नवम्बर, 2019
हरी भरी ज़रख़ेज़ भूमी, लीलतीं सड़कें हैं। हाइवा-डंपर जो हाईवे में चलते। धुँए से गाँव के परिवेश को छलते। साँप रेंगत
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 25 जुलाई, 2021
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे, आज हसीनों पर शे'र कहेंगे। ज़िक्र क़यामत का होगा तो हम, उसकी अदाओं पर शे'र कहेंगे। ज़िक्
मेरा सावन सूखा सूखा - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 27 जुलाई, 2021
विरह व्यथा की विकल रागिनी, बजती अब अंतर्मन में। कितनी आस लगा बैठे थे, हम उससे इस सावन में। बरस रहे हैं मेघा काले फि
मिलन - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 26 जुलाई, 2021
सावन ने ली जब अँगड़ाई, तब सुधि आई है मधुकर को। चौंक गई मैं उन्हें देखकर, लौटे पिया अचानक घर को। प्यासी नज़रें सबसे च
मान लो यार हमें नशा होगा - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : मई, 2021
मानलो यार हमें नशा होगा, बे-ख़ुदी में ख़ुदा कहा होगा। कल को नस्लें नई ये सोचेंगी, आदमी किस तरह रहा होगा। राज़ खोलें अ
बात पुरानी ताने मार रही है - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 3 जून, 2021
बात पुरानी ताने मार रही है, याद किसी की ताने मार रही है। मेरे अंदर चीख़ रही ख़ामोशी, और उदासी ताने मार रही है। फैल गई
रिश्तों के मोल घट गए - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 5 नवम्बर, 2020
एक खोली थोड़ा दु:ख था, सबका साथ बड़ा सुख था। माता-पिता और भाई-बहन हँसता खेलता परिवार बड़ा ख़ुश था ख़ूब कमाई धन दौलत, ज़िन
पर्यावरण और गाँव - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2020
योगी रोगी हो गए, कहाँ करे अब वास। दूषित पर्यावरण से, मुश्किल में है साँस।। अब कहाँ है पात हरे, सावन में भी पीत। मौसम
व्यथित मन - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 2021
हृदय और भी हो जाता व्यथित! जब सर्वस्व हारकर, जाता तुम्हारे समीप; कर देती कंटकाकीर्ण, उर को मेरे अपने शब्दभेदी बाणो
प्रिये, अब तुम आ जाओ - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
तड़प रहा हृदय ये मेरा, सूरत तो दिखला जाओ। साँझ हो रही मन मधुबन में, प्रिये, अब तुम आ जाओ। कितने दिवस यूँ चले गए, कितन
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 29 फ़रवरी, 2021
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता, मेरा हर दिन का मनाना प्यारा नहीं लगता। आख़िर कौन-सी बात है जो नापसंद है
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 29 फ़रवरी, 2021
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता, मेरा हर दिन का मनाना प्यारा नहीं लगता।
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 25 जुलाई, 2021
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे, आज हसीनों पर शे'र कहेंगे।
बात पुरानी ताने मार रही है - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 3 जून, 2021
बात पुरानी ताने मार रही है, याद किसी की ताने मार रही है।
ख़ुद के दर्द से जाने कब से हूँ परेशाँ मैं - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
ख़ुद के दर्द से जाने कब से हूँ परेशाँ मैं, नींद से गिला क्या कि रात भर नहीं आती।
मुस्कुराहटें हमारी तो अब हुनर की बात है - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 24 जून, 2021
मुस्कुराहटें हमारी तो अब हुनर की बात है, दर्द चीज़ है जो भी ये तो उम्र भर की बात है।
मेरा परिचय - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 28 जुलाई, 2021
वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, दिवस कैलेंडर शुक्रवार। मध्यरात्रि में हुआ अवतरित, हर्षित हुआ पूरा परिवार।। सवा मन ल
राखी भेजवा देना - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 1 अगस्त, 2021
बहन राखी भेजवा देना, अबकी ना मैं आ पाऊँगा। काम बहुत हैं ऑफिस में, मैं छुट्टी ना ले पाऊँगा।। कलाई सुनी ना रहें मेरी,
बुढ़ापा - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 18 अगस्त, 2020
तलवे घिस गए आने जानें में, उम्र गुज़र गई जिसे कमानें में। ज़िन्दगी भर जो कमाई इज़्ज़त, अपनें ही लगे उसे गँवाने में। प
ज़हन होगा प्रखर अब तो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 12 जनवरी, 2020
ज़हन होगा प्रखर अब तो, सुहाना है सफ़र अब तो। यहाँ माहौल ऐसा है, सुख़न की है लहर अब तो। ख़ुशी से हैं लबालब पल, हुए उत्सव प
आज़ाद हिन्दुस्तान - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 20 जनवरी, 2021
यह ममता भरा देश हमारा, सबको प्यारा यह देश मेरा, विभिन्नता में एकता जिसका नाम है, हमारा देश यह भारत महान है। अपनी इस
लोरी - प्रवल राणा 'प्रवल'
  सृजन तिथि : 27 जून, 2020
मेरे लाल आजा सो जा, चंदा भी सो गया है। निंदिया बड़ी ही प्यारी तेरी राह तक रही है। तेरे इंतज़ार में तेरी माता भी जग रही ह
भ्रष्टाचार - प्रवल राणा 'प्रवल'
  सृजन तिथि : 2 जून, 2021
देश के सामने भ्रष्टाचार बहुत बड़ी समस्या है, भ्रष्टाचार के निषेध के लिए क़ानून है, लोगों को शिकायत भी करनी चाहिए। किन
जीवन - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
जीवन चक्र निरंतर चलता, एक-एक दिन घटता जाए। पैदा होते शिशु कहलाए, धीरे-धीरे बुज़ुर्गी पाए। अपना बचपन सच्चा बीता, म
अडिग हौसला - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 2 नवम्बर, 2017
थोड़ा सा धैर्य रखा यारो, और थोड़ा सा विश्वास, माना परिस्थिति थी कठिन पर मन में थी गहरी आस। वो आस मैंने टूटने नहीं दी
आईना ज़िंदगी का - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 3 अगस्त, 2018
हौसला है तो यारो, कुछ काम कर डालो, अपना वक़्त ज़िंदगी में, अपने नाम कर डालो। छोड़ दो ये दुनिया किसको क्या कहेगी, यदि
तुम बिन जीवन कहाँ मिलेगा - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 3 जुलाई, 2021
तुम बिन जीवन कहाँ मिलेगा, गुलशन सा मन कहाँ मिलेगा। पल में राज़ी फिर नाराज़ी, यह परिवर्तन कहाँ मिलेगा। यौवन के दिल म
ऐ घटा - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 27 जुलाई, 2021
ज़रूरत पर नहिं शक्ल कभी तुम दिखलाते हो, ज़रूरत नहिं जब, ज़बरदस्ती नभ घिर आते हो। जाने क्यों निज बल पर इतना इतराते हो।।
छोटे दलों का गठबंधन - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 28 जुलाई, 2021
यहाँ संख्या मंत्र, बने है यंत्र, इस लोकतंत्र, गीत चले। जैसी गति तेरी, वैसी मेरी, तेरी मेरी, मीत भले।। गठजोड़ ज़रूरी, क
विरह पीड़ा - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2 अगस्त, 2021
विरह पीड़ा में तप रहा था, अंतः में अनुराग लिए। कब के बिछड़े आज मिले हैं, हम सावन में प्राणप्रिये। हाड़ कँपाती शिश
सुनो शिकारी - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 31 जुलाई 2021
पहले तुम शिकारी की तरह जाल फैलाते हो। मेरी मजबूरी का फ़ायदा उठाकर पैसा सूद पर देकर मुझे जाल में फँसाते हो।। ब्या
मैं - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 20 जुलाई, 2021
खोज रहा हूँ ख़ुद में ख़ुद को, न पाया कभी ख़ुद को खोज। न जाने कहाँ खो गया मैं? खोज ही रहा ख़ुद को रोज़। फँसा रिश्तों के भँवर
मेरी कविता - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 6 अप्रैल, 2021
मेरी कविता स्वअनुभूति है, सहानुभूति नहीं। यथार्थपरक है, मनोरंजनपरक नही। मेरी कविता झकझोरती, झूठी झूमती नही। सच
जीवन कुछ इस क़दर - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 28 अक्टूबर, 2020
जीवन कुछ इस प्रकार है कि वहाँ रहने के लिए ज़मीन है, छत के लिए आसमान है, खाने के लिए दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं, फिर भी, जी
सपनों के पंख फैलाओ - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 24 अप्रैल 2018
ज़िंदगी मेरी है यारो, तो उम्मीद भी मेरी है, इसलिए आगे बढ़ने की ज़िद भी मेरी है। कोई साथ हो ना हो, कोई साथ दे ना दे, हार अ
नव सृजन करो तुम - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 30 अगस्त, 2020
ख़ामोशी की तह में सिमट कर ना गुज़ारो ज़िंदगी, ग़ुंचा ग़ुंचा दिल खोलकर पुष्पों की तरह खिलो तुम। हँसते, गाते, खिलखिलात
एक बच्चे का मन - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 4 अगस्त, 2021
"माँ क्या कर रही हो" "कुछ नही बेटा, दादा तुम्हारे बूढ़े हो गए हैं और आज कुछ मेहमान आ रहे हैं, तुम्हारा जन्मदिन है बेटा।
सफ़र से हमसफ़र - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 5 अगस्त, 2021
ये सीट मेरी है, विजयवाड़ा स्टेशन पर इतना सुनते अमित ने पीछे मुड़कर देखा तो एक हमउम्र की लड़की एक हाथ में स्मार्ट फोन
आधुनिक भाई - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 29 मई, 2015
देखता हूँ, उन कृतघ्नों को, गले में शराब की बोतल उड़ेलते, भाग्य को सराहते, ख़ुशियाँ मना रहे हैं। याद आता है वह दुर्दि
जब तेरी याद आती है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 1 जून, 2012
जब-जब आँखें नीर बहाए, सपनों में तुझको न पाए। यही सोचकर घबराए, कि तू उससे कहीं दूर न जाए। हृदय ये भाव जगाती है, जब तेर
आज बोलता है - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
हे युग-पुरुष! ओ प्रेमचंद तेरी लेखनी के नींव पर है टीका हुआ हिन्दी साहित्य का मानसरोवर, जिसकी लहर से उठती उफान नव-ह
जोकर - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 19 नवम्बर, 2019
ठोकरें खाते गए और मुस्कुराते रहे, हम अपनी हिम्मत को आज़माते रहे! आदत ही ऐसी है हमारी तो साहब, हम दुश्मनों को भी गले लग
वो बुढ़िया - सलिल सरोज
  सृजन तिथि : 2020
वो बुढ़िया कल भी अकेली थी, वो बुढ़िया अब भी अकेली है। चेहरे की झुर्रियाँ पढ़ कर पता चलता है, उसने कितने सदियों की पीड़ा
चाहे जितने भी हों ग़म हम हँस लेते हैं - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 13 जून, 2021
चाहे जितने भी हों ग़म हम हँस लेते हैं, पलक भले रहती हों नम हम हँस लेते हैं। दूरी में भी नज़दीकी के ख़्वाब देखकर, ख़ुशी-ख़ु
आया शहर कमाने था बरकत के वास्ते - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 19 जून, 2021
आया शहर कमाने था बरकत के वास्ते, लेकिन भटक रहे बद-क़िस्मत के वास्ते। कह के बुरा भला हमे बद-नाम कर दिया, ख़ामोश हम रहे थ
कर्मवीर मास्टर - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 15 जनवरी, 2020
मिरी मसर्रतों से गुफ़्तगू कर ज़ीस्त ने कुछ यूँ फ़रमाया हैं, ज्ञानमन्दिर में आकर हयात ने हयात को गले लगाया हैं। सोहबत
तेरा शैदा हैं कवि - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 2 मार्च, 2020
मेरा आशियाना ढूँढती हैं तेरी आँखों का जलना, आओ, देखना शब कहेगी इस घर में चाँद रहता हैं। निगाहों को जब से तेरा दीद
सावन पर भी यौवन - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 5 अगस्त, 2021
छमछम छमछम नाची है बरखा, झम झम बरसे रे पानी। देखो मिलन की रुत आई है, लिखने को प्रेम कहानी। मधुबन भी है मदहोशी में डूब
मौत का तांडव - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 1 अप्रैल, 2020
दिख रहा मौत का कैसा तांडव, हाय ये किसने क़यामत ढाया। बेबसी क्यूँ कर दी कुदरत तूने, हाय कैसा ये कैसा क़हर छाया। मौत क
प्रेम के रंग - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 12 मार्च, 2021
होली खेलें श्याम यमुना जी के तीर, सखी चल ना सही यमुना जी के तीर। राधा रानी संग रास रचावें, गोरे बदन मा रंग लगावें। स
अनुशासन से हो सोना कुंदन - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 25 मार्च, 2020
अपने आपको मना कर पाने की सामर्थ्य के साथ ही गरिमा की समझ पैदा होती है यही अनुशासन की सीढ़ी है, यही सीढ़ी बनाती है सोने क
याचना - प्रवल राणा 'प्रवल'
  सृजन तिथि : अगस्त, 2021
वेदना के इन स्वरों को एक अपना गान दे दो, भटके हुए जो राहों से उनको भी ज्ञान दे दो। हम चले हैं राह पर यूँ लड़खड़ाते हुए
सफलता का रहस्य - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
दूसरों की ख़ूब सुनिए, उस पर मनन भी कीजिए ख़ूब। बात जो हो अपने काम की, उसे याद भी रखिए ख़ूब।। जीवन की जंग में, इसका कीजिए
कोरोना - विजय कृष्ण
  सृजन तिथि : 2021
जगत विनाश करने को, मानव के प्राण हरने को, एक वायरस कही से आन पड़ा, कोरोना इसका नाम पड़ा। इसका स्वरूप विस्तार देख, उल
अनाथ बच्ची - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 18 जुलाई, 2019
मैं मासूम थी, नादान थी, हर बात से अंजान थी, मेरा क़ुसूर क्या था? जो तूने मुझे छोड़ दिया, मैं तो नन्ही सी जान थी। बोझ सम
बेटियों से जहान है - हरदीप बौद्ध
  सृजन तिथि : 2020
हम सबकी ऊँची शान हैं बेटी, दुनिया में सबसे महान हैं बेटी। बेटी ही मन का मीत है, जीवन का सुंदर गीत है। प्रेम करो सब ब
वही तो भारत मेरा है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 12 अगस्त, 2021
जहाँ आता बसंत-बयार, कोयल भी करती गुंजार। पपीहा की है पीन-पुकार, आल्हा की गूँजती झंकार। वही तो भारत मेरा है।। आदर्
बात तो कर लिया करो - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 26 जून, 2020
दूर ही सही प्रिये तुम कभी हमसे बात तो कर लिया करो। झूठा ही सही, मन रखने को, प्रेम से प्रेम का हिसाब कर लिया करो।। व्
चलो साथियो संग संग चलो - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 15 जून, 2020
चलो साथियो संग संग चलो, दीन दुखियों की गूँज बनते चलो। चलो साथियो... पहुँच गए हम चाँद सितारों तक, जो दब कर रह गए, उन्हे
सावन की घटाओं - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 21 जुलाई, 2021
सावन की घटाओं, धीरे धीरे बरसो। मंद मंद पवन संग, प्रीत का राग गाओ।। सजने लगी सुहागनें, हाथों में हरी हरी चूडियाँ, मे
गाऊँ कैसे प्रेम तराने - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 11 अगस्त, 2021
टूट गया जब दिल का दर्पण, दर्द भरा गुज़रा है हर क्षण, याद कभी उसकी आती तो, पड़ते अश्रु बहाने। गाऊँ कैसे प्रेम तराने! पी
हम ज़माना भूल बैठे दिल लगाने के लिए - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 15 अगस्त, 2021
हम ज़माना भूल बैठे दिल लगाने के लिए, माँग हम सिंदूर से उसकी सजाने के लिए। रूठना नखरे दिखाना ये तभी अच्छा लगे, पास जब
पंद्रह अगस्त - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : अगस्त, 2020
पंद्रह अगस्त सैंतालीस को, कैलेंडर दिवस था शुक्रवार। मिली इस दिन हमें आज़ादी, खुला अपने सपनों का द्वार।। आज़ादी के
इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 4 जून, 2021
इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी, आज जा के देखा मुहब्बत कितनी बची हुई थी। आपसे जहाँ बात फिर मिलने की कभी हुई थी,
उनकी अदाएँ उनके मोहल्ले में चलते तो देखते - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 8 जून, 2021
उनकी अदाएँ उनके मोहल्ले में चलते तो देखते, वो भी कभी यूँ मेरे क़स्बे से गुज़रते तो देखते। बस दीद की उनकी ख़ाहिश लेकर भ
तूफ़ानों से लड़ना सीखा है - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 11 अगस्त, 2021
अंदाज़ हमारा तीखा है, तूफ़ानों से लड़ना सीखा है। मेरा देश ज्वलंत रंग है, इसके आगे हर रंग फीका है। घर बैठा दुश्मन भी मे
वीर सपूत - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 17 जुलाई, 2021
वीर सपूतों का जज़्बा था वह, जो लड़ गए सीमा पर शत्रु से। अपने प्राणों की परवाह न कर, टूट पड़े सरहद पर शत्रु पे। हथेली
बचपन की यादें - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 10 अगस्त, 2021
यादें बचपन बड़ी सुहानी, जैसे बहता पानी धार। उछल कूद कर मौज मनाएँ, बच्चों का है ये संसार। बिचरण करते पंछी जैसे, बचप
संस्कार - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 17 जुलाई, 2021
आँखों में भर आए आँसू, मान सम्मान कहाँ से पाएँ। आजीवन संस्कार सिखाए, अंत समय पर काम न आए। तेरे मेरे ख़्वाब वही हैं, ज
शिक्षक - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 5 सितम्बर, 2020
प्रणाम उस मानुष तन को, शिक्षा जिससे हमने पाया। माता पिता के बाद हमपर, उनकी है प्रेम मधुर छाया।। नमन करता उन गुरुव
तिरंगे की आवाज़ - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 12 अगस्त, 2021
हमारा तिरंगा कह रहा, मैं भारत की शान हूँ, देश के वीर सपूतों का, मैं एक अनूठा आन हूँ। देश के शहीदों का, मैं एक ज़िन्दा म
अकेला आदमी - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 2012
एक बंजारा रहे अकेला, न थी उसको कोई फ़िकर। बस करता था अपना काम, न जाने उसको कोई इंसान। कभी-कभी जब सोचे वो, क्यों होता ह
ऐसा बन्धन रक्षा बन्धन - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 14 अगस्त, 2021
यह धागों का है एक ऐसा बन्धन, कहते है सब इसको रक्षा-बन्धन। अटूट प्रेम बहन-भाई का उत्सव, बहनें लगाती भाई तिलक-चंदन।।
माँ तुम कभी थकती नहीं हो - विजय कृष्ण
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2018
माँ तुम कभी थकती नहीं हो। सुबह से लेकर शाम तक, घर हो या दफ़्तर, सबके आराम तक, बैठती नहीं हो, माँ तुम कभी थकती नहीं हो।
संकट जगाता मानवता - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 11 मई, 2021
मानव पर जब संकट आता है, मानवता जाग जाता है। गली-गली या मुहल्ले हो बुरा वक़्त जब आता है। आँखों में खटकने वाला भी, आँखो
शान्ति की तलाश - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 27 जुलाई, 2021
ढूँढता रहा इधर से उधर, पनाह शान्ति का। ढूँढते-ढूँढते तन्हा रह गया, पर पता नहीं कहीं शान्ति का।। किसी ने कहा वन में
उपहार - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : अगस्त, 2020
आज रक्षाबंधन का त्योहार था। मेरी कोई बहन तो थी नहीं जो मुझे (श्रीश) कुछ भी उत्साह होता। न ही मुझे किसी की प्रतीक्षा म
जीवन की भूल - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 10 अगस्त, 2021
माना कि भूल होना मानवीय प्रवृत्ति है जो हम भी स्वीकारते हैं। मगर अफ़सोस होता है जब माँ बाप की उपेक्षाओं उनकी बेक़द्
कोयल करे मुनादी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 30 अक्तूबर, 2019
अमराई में कोयल करे मुनादी। महुआ, टेसू, सेमल डरे डरे। झरबेरी के कोई कान भरे। मानो पीपल बना हुआ है खादी। ख़ुशियो
वक़्त बहुत ही शर्मिंदा है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2 जनवरी, 2020
वक़्त बहुत ही शर्मिंदा है, आतंक अभी भी ज़िंदा है। फूल बहुत कोमल होता है, जैसे अब खार दरिंदा है। मैने जन गण मन से पूँछ
मुक्त आकाश - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 17 अगस्त, 2020
घनघोर वारिश के बीच कच्चे जंगली रास्ते पर भीगता काँपता हुआ सचिन घर की ओर बढ़ रहा था। उसे माँ की चिंता हो रही थी, जो इस व
रक्षा बंधन - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 22 अगस्त, 2021
कहने को तो रक्षा बंधन भाई बहन के स्नेह का त्यौहार है पर अध्यात्म रूप से देखें तो इस त्यौहार के दिन हम परमात्मा से उम
नारी - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 14 अगस्त, 2019
नारी सदैव देश, धर्म औ' आन परिचायिका। ममता, स्नेह वात्सल्य, दया, क्षमा साक्षात रूप। नारी नदी सी जीवनदायिनी है गति
भोला आदमी - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 2013
आदमी तू बड़ा भोला है, बात बोले बड़बोला है। अच्छाई-बुड़ाई में भेद न जाने, आदमी तू बड़ा भोला है। न जाने तू सच्चाई, बस कहे
शाम को छः बजे - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 23 अगस्त, 2021
अंततः अब मिलना है उनसे मुझे, आज तक़रीबन शाम को छः बजे, सोच मन विचलित दिल ये कैसे सहे, तीव्र गति धड़कन शाम को छः बजे। दृग
चिराग़ों तले ही अँधेरा मिला है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 20 मई, 2021
चिराग़ों तले ही अँधेरा मिला है, मिला जो भी भूका कमेरा मिला है। इमारत सदा ही बनाई हैं जिसने, उसे पुल के नीचे बसेरा मि
न शिकवा ना शिकायत लाज़मी है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 13 मई, 2021
न शिकवा ना शिकायत लाज़मी है, मुहोब्बत बस मुहोब्बत लाज़मी है। दरख़्तों को मुनासिब सख़्तियाँ भी, गुलों को तो नज़ाकत लाज़म
वर्षों बीत गए - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 2016
वर्षों बीत गए तुम्हारी याद में, डूबती नैना उमरता हृदय भावुक मन लिए। कहाँ जाऊँ? किसको सुनाऊँ? मन का विरहा मन को सु
हैवान - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 2016
इन भोली सूरत के पिछे, है हैवान बसा क्या है? तुझको पता। भोली सूरत काले नैना, है चाल मस्त मौला, दिन को है बेवाक वो घूमे
लड़कियाँ कहाँ गई - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 20 अगस्त, 2020
लड़कों के झुण्ड में एक बच्ची खेलती थी लड़के लड़की को हराने के लिए हथकंडे अपनाते थे, लड़की होने का ताना देते थे लड
बहुत प्यारी होती हैं बेटियाँ - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 12 जून, 2021
प्यार का पुष्पहार होती हैं बेटियाँ, बाप की दुलारी होती हैं बेटियाँ। घर का चिराग़ होती हैं बेटियाँ, फूल की ख़ुशबू होत
माँ फिर से वापस आ जाओ - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 8 अगस्त, 2019
हे! माँ फिर से वापस आ जाओ। लोरी मधुरिम कंठ सुना जाओ।। मात! दंतहीन, बलहीन हूँ मैं, अब अस्सी बरस का दीन हूँ मैं। बाँहे
नाज़-ए-हुस्न से जो पहल हो गई - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 24 अगस्त, 2019
नाज़-ए-हुस्न से जो पहल हो गई, मौत भी आज से तो सरल हो गई। मोहिनी कमल नयनी बँधी डोर सी, सर्पिणी सी लिपट मय गरल हो गई। इश
तुझसे इश्क़ इज़हार करेंगे - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 24 अगस्त, 2021
मिलन प्रिये जब तुमसे होगा, दिल की हम तुम बात करेंगे। नयनों से हम नयन मिलाकर, तुझसे इश्क़ इज़हार करेंगे।। इक दूजे का
राम पद वन्दन - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 17 जून, 2021
राम नाम बचा कलयुग में, जीने का एक सहारा। इसके बिन व्यर्थ है जीवन, चाहे वैभव हो सारा। पौरुष, बाहुबल या साहस पर, होता ल
नाव घाट लगी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 18 मार्च, 2021
नैतिकता की बात करें क्या मन में गाँठ लगी। कालोनी में मन-मुटाव का जंगल ऊगा है। मन में पश्चाताप लिए फिर सूरज डूबा ह
बुझा दिए जाते हैं वो दिये - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 15 अगस्त, 2021
घने तिमिर में अकेले ही जलकर, जो चहुँ-दिशि रोशनी अपनी बिखेरते हैं, बुझा दिये जाते हैं अक्सर वो दिये, जो तूफ़ानों में ज
ग़रीबी - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 7 दिसम्बर, 2020
ग़रीबी में पैदा हुए, क्या ग़रीबी में ही मर मिटेंगे। कितने ख़्वाब लेकर आए थे हम इस जहान में, क्या इस अधूरेपन में ही दम
आओ मनाए ख़ुशियों का पर्व - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 2018
आओ मनाए ख़ुशियों का पर्व, झूमें गाएँ इसमें सब। आओ जलाएँ उन दियों को, जो वर्षो पहले बूझ चूके थे। वजह क्या था, ग़लती किस
ज़िम्मेदारी - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 25 अगस्त, 2021
फ़ैशन करना वो क्या जानें, जिनपर घर की ज़िम्मेदारी। क्या जाने हम नेक अनाड़ी, महँगा फोन अपाचे गाड़ी। नही गया होटल में खा
रक्षा बंधन - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 22 अगस्त, 2021
पावन जग में पर्व ये, मिले भगिनी दुलार। रक्षाबंधन प्यार का, सच्चा है त्योहार।। बड़े किए जिसनें करम, बड़ा मिले उपहार।
कृष्ण जन्माष्टमी - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 28 अगस्त, 2021
विष्णु के दशावतार कृष्ण हैं, भाद्रपद अष्टमी जन्म लिया। निशा स्याह रात बारह बजे, कारागार में अवतरण लिया। प्रहरी स
तुम बिन कौन उबारे - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 7 अगस्त, 2020
गोवर्धन धारी हे! कान्हा, बन जाओ रखवारे, हे! कृष्णा हे! मोहन मेरे तुम बिन कौन उबारे। हर कोई है व्यथित यहाँ तो अपने दुः
कान्हा - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 5 अगस्त, 2020
कान्हा कोई नाम नहीं, कोई व्यक्ति नहीं, कान्हा तो साक्षात परबृह्म हैं अजन्मा हैं अमर हैं अजर हैं। परन्तु वह जसुदा मइ
कृष्ण जन्माष्टमी - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 30 अगस्त, 2021
राधा गुनगुना रही मन में गान, सुना दो कान्हा मुरली की तान। जन्माष्टमी का दिन है आज, बज रहें मुरली, मृदंग और साज। हँ
न ग़ुरूर बड़ा न शोहरत और धन - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 2019
न ग़ुरूर बड़ा न शोहरत और धन, है सबसे बड़ा रिश्ता और अपनापन।
पूनम की रैन - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 30 अगस्त, 2021
बांडी की तरह लगते ज़हरीले गोल गोल मटमैले सुनहरे श्याम कैश, आँखें ठहर जाएँ, खुली की खुली रह जाए, ऐसे दिल पर आघात करत
मुकम्मल जहान हैं - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 27 फ़रवरी, 2019
मेहमाँ तिरे आने से जीवन में आया मिठास हैं, ये शादी का लड्डू जीवन में लाया उल्लास हैं। कहते हैं ये लड्डू जो खाए वो पछ
बदलता दौर - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 18 अप्रैल, 2020
सो गया हूँ मोबाईल में वेब सीरीज देखकर, जगा दे सुब्ह, वो मंज़िल की पुकार कहाँ है। वर्तमान तो पढ़ रहा हैं स्माईल-ओ-यूट्य
कविता की सच्चाई - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 18 अगस्त, 2021
कविता मन से रची नहीं जाती, कविता कभी सीखी नहीं जाती। ह्रदय से उत्पन्न हुए भावों‌ को, सिर्फ़ कलमबद्ध की जाती है। सुर
ख़ामोशी एक सदा - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 7 नवम्बर, 2019
ख़ुशियाँ मोबाईल हो चली, पीपल तले ख़ामोशियाँ मिली। बेमतलब की बातें इतनी हुई, नफ़रतों को इससे हवा मिली। राजनीति ने अब
कौन कहता है तुझे तू दीपकों के गीत गा - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : मई, 2021
कौन कहता है तुझे तू दीपकों के गीत गा, ज़ुल्मतों का दौर है तो ज़ुल्मतों के गीत गा। क्या ख़बर है फूल कोई खिल उठे इंसाफ़ का,
चराग़ों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : सितम्बर, 2019
चराग़ों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है, अँधेरा मिट नहीं पाया उजालों की सियासत है। जहाँ तू सर पटकता है वहाँ बस एक पत्
ऐसा मेरा संविधान है - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 1 अगस्त, 2019
हर रंग ख़ुद में समेटे यह एकता की शान है। भारतीयों का मान है ऐसा मेरा संविधान है।। 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का उपहार सुजान है।
कू-ए-बुताँ तक फिरूँ आराम-ए-जाँ की ख़्वाहिश लिए - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 20 अगस्त, 2021
कू-ए-बुताँ तक फिरूँ आराम-ए-जाँ की ख़्वाहिश लिए, वर्ना मैं निकलूँ भी तो घर से कहाँ की ख़्वाहिश लिए।
स्वीकार करें मेरा प्रणाम - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 14 फ़रवरी, 2021
हे! दिव्य शक्ति माँ सरस्वती स्वीकार करें मेरा प्रणाम, दिव्य गुणों को धारण कर बन जाऊँ मैं देव समान। हे! ज्ञानदायन
गंगा - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 14 जुलाई, 2021
भगीरथ की तपस्या का फल, शिव जटाओं के खुल गए बल। गंगा अवतरण हुआ धरती पर, प्रवाहित मोक्षदायी अमृत जल।। गंगोत्री हिमन
मेघा ऐसे बरसो रे - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
तन मन भीग जाए, मेघा ऐसे बरसो रे। सुध बुध भूल बैठूँ, मेघा ऐसे बरसो रे। घनश्याम श्वेत किसी भी रंग में आओ, मैं रंग जाऊँ उ
चिरैया का आशा संदेश - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : मई, 2021
ओ चिरैया, क्या संदेश है तेरा चीं-चीं से, क्यों जी रहा मानव होठ सीं-सीं के। मैं तो बेज़ुबान हूँ, फिर भी देखो, संदेश है मे
हुआ शंखनाद - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 13 अगस्त, 2021
देश पर आई विपदा गहरी, हुआ शंखनाद जागो प्रहरी। शत्रु बैठे निगाहें टिकाए, नित नए आतंक फैलाए, चुनौतियाँ बढ़ती ही जाए,
सावन - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 27 जुलाई, 2021
नीलाम्बर में श्यामल घटा छाई, सावन की पहली बौछार आई। जून की गर्मी से तपी धरती ने, शुष्क उष्ण उर में शीतलता पाई। इंद
विद्यालय जाना है - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 1 सितम्बर, 2021
एक प्यारा सा गाँव था। उस गाँव मे प्यारा सा विद्यालय था। उस विद्यालय मे सोनू नाम का एक बालक पढ़ता था। वह प्रतिदिन वि
शिक्षक दिवस - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 3 सितम्बर, 2021
ज़िंदगी में सर्वप्रथम गुरु, हमारे माता पिता को नमन। उनके बाद आते शिक्षक, जिनका करूँ मैं अभिनंदन। "अ" से लेकर "अ:" तक, "
रोटी की तलाश - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 21 अगस्त, 2021
संसद अँधेरी गुफा बन गई है जहाँ से रोटी के लिए लगने वाली आवाज़, उसकी दीवार से टकरा कर वापस लौट आती है। सोचता हूँ वो
गोकुल की पहचान - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 30 अगस्त, 2021
गूँजे गोकुल की गली, बंसी तेरी शान। गिरधर केशव नाम से, गोकुल की पहचान।। मोर पंख सिर पर सजे, मुरलीधर है नाम। घूमें गो
मुश्किलों में मुस्कुराना सीख ले - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 17 अगस्त, 2021
मुश्किलों में मुस्कुराना सीख ले, और ख्वाबों को सजाना सीख ले। बेशरम है यदि यहाँ पर आदमी, इसलिए तूँ भी लजाना सीख ले।
गुरु महिमा - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 4 सितम्बर, 2021
गुरु ज्ञान की ज्योति अनोखी, अंतस फैला तिमिर मिटाए। अनगढ़ मूढ़ शून्य शिष्य को, सघन शून्य महत्व सिखाए।। दीपक जैसा ज
गुरु - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : 4 सितम्बर, 2021
शिक्षक वह जो करें मार्ग प्रशस्त, जिसके सीख से अज्ञान हो अस्त। जीवन को मिलता नव संगीत, वही सद्चरित और उन्नति का मीत।
गुरु की महिमा है बड़ी - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 5 सितम्बर, 2021
गुरु की महिमा है बड़ी, दूर करे अज्ञान। गुरु की वाणी है अमृत, मृत में फूँके जान।।
शिक्षक का सच्चा स्वरूप - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 3 सितम्बर, 2019
चरित्रवान शिक्षक बनने के लिए शिक्षक को अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान होना चाहिए। शिक्षक को चाहिए कि वह स्वयं के स्वर
गुरु - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 2 सितम्बर, 2021
धरती पर प्राणी का अवतरण, प्रथम गुरु मात पिता का वरण। अक्षर ज्ञान विज्ञान का प्रदाता, द्वितीय गुरु शिक्षक तेजवरण।
शिक्षक ही पंख लगाते हैं - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 5 जून, 2020
तम-तोम मिटाते हैं जग का, शिक्षक धरती के दिनकर हैं। हैं अंक सजे निर्माण प्रलय, शिष्यों हित प्रभु सम हितकर हैं। शुच
ग़मों में ज़िंदगी का क्या करेंगे - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 4 जनवरी, 2020
ग़मों में ज़िंदगी का क्या करेंगे, लबों की ख़ामुशी का क्या करेंगे। मुहब्बत डायरी में लिख चुके हैं, अमाँ अब शाइरी का क्
पिता और उनका अक्स - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : मई, 2021
कहता नज़र आता है जब हर एक शख़्स, पिता से ही मिलते हैं तुम्हारे नैन और नक़्श। बार-बार नज़र आता है मुझमें, मुझे पिता का ही
श्याम बिन राधा अधूरी - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 25 अगस्त, 2021
न जाओ छोड़कर मोहन, ये राधा रह न पाएगी। बहेंगे अश्रु आँखों से, अधर मुस्कान जाएगी। हुई क्या भूल मुझसे जो, दिया है ग़म हम
उड़े हौसले की उड़ान - आशाराम मीणा
  सृजन तिथि : 1 सितम्बर, 2021
हर क़दम मंज़िल खड़ी है, तुम चलो दो क़दम। जो ठहरा नहीं चलता गया, मिल गया उसे हमदम। रुकना नहीं झुकना नहीं, आगे रखो हर क़दम
मन में खटके बात - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 24 अगस्त, 2021
रीत यहाँ की देख के, मन में खटके बात। मनुज विवेकी कौन थे, जिसने बाँटी जात।। पीड़ा जग की देख के, मन में खटके बात। कौन कर
देशभक्ति - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 12 जुलाई, 2021
तीन रंग का झंडा अपना, भारत माँ की शान है। कण-कण में ख़ुशहाली महके, भारत देश महान है। मर मिटने का जज़्बा सबमें, बलिदान
अमर जवान - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 12 जुलाई, 2021
सरहद पर हैं मुस्तैद फ़ौजी, सोए जनता चैन। आधा सोए आधा जागे, हैं सीमा पर नैन।। कभी नहीं धीरज खोता है, गर्मी ठंड बरसात। क
कड़वी बात न बोलिए - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
कड़वी बात न बोलिए, हो जाते हैं घाव। मधुर वचन बोलें सदा, पार लगेगी नाव।।
दंभ न कर तू जाति का - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
दंभ न कर तू जाति का, लाल सभी का रक्त। मेल-जोल सबसे करें, क्षण भर का है वक़्त।।
अपना-अपना राग है - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
अपना-अपना राग है, अपनी-अपनी पीर। समाजसेवी जो करे, वो ही सच्चा वीर।।
ढाँढस देना सीख है - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
ढाँढस देना सीख है, सुने किसी के आह। चल पड़ती है ज़िंदगी, भरता है उत्साह।।
दीन अबलों की सुनिए - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
दीन अबलों की सुनिए, करूणामय विलाप। अंतः में सुकून मिले, और कटे संताप।।
द्रोपदी का चीर हरण - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 6 सितम्बर, 2021
द्युतक्रीड़ा में हार गए युधिष्ठिर, राज्य धन वैभव भाई बंधुवर। अंत में पंचाली दाँव लगाई, शकुनि चाल से मात खाए कुँवर
ख़्वाहिशें - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 7 सितम्बर, 2021
अंतहीन होती ख़्वाहिशें, अनकही दबी फ़रमाइशें। काश समझता दर्द कोई, झूठी हँसी की नुमाइशें। कलेजे में धँसा तीर सा, आँख
हसीन सपना - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 1984
तन्हा-तन्हा पेड़ों के साए तले, यादें तुम्हारी लेकर सपने हम बीने।। रुक-रुक के चलना चल-चल के रुकना मुड़ना कभी-कभी, सा
बहन-बेटियाँ - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 13 मार्च, 2021
बेटियाँ हँसती हैं तो घर की दीवारें करती हैं बात, बेटियाँ दो दो घर सँवारें, चलती हैं बात। बहन बेटियों के लिए हर सीने
चाँद मिरा हैं - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 21 फ़रवरी, 2021
मुबारक़ हो आसमाँ, तिरे हिस्से में हो हुजूम-ए-अंजूम-ओ-चराग़, तिरे सीने में रहे आफ़ताब पर चाँद मिरा हैं हो गया आग़ाज़। उन
आज भी इंतज़ार है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 3 मई, 2013
आज सुबह-सुबह अचानक; उनकी याद मस्तिष्क में, मेघों सा छा गई। वो लम्हें, मुझे विस्मृत करना चाहती थी। जिन्हें, मैंने स
अकेले में - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 18 अप्रैल, 2020
अकेलेपन की गहन निशा में, अनिमेष देखता हूँ एक सपना कि, डूब रहा हूँ गहरी खोह में; पाताल की गहराइयों में, धँसता, निष्प्
फिर से तुमको माँगूँगी - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 6 सितम्बर, 2019
आज कठिन व्रत धारण करके, फिर से तुमको माँगूँगी। नए जन्म के इंतज़ार में, जीवनपथ पर भागूँगी। जनम-जनम के तुम हो साथी, न
श्री गणेश चतुर्थी - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 9 सितम्बर, 2021
हाथ जोड़ वंदन करूँ, गौरी नन्दन गणेश। दुनिया भव बाधा हरो, हर लो‌ सकल क्लेश।। वक्र तुण्ड महाकाय प्रभू, सर्व देव आदि द
हिन्दी! तू भारत की गंगा है - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 1970
माँ गंगे की कोख से जन्म लिया मैंने भारत के धर्म, कर्म, ज्ञान और त्याग के उस चौराहे पर जहाँ हमने सीखा आगे बढ़ना मात
सन्नाटे का शोर - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 10 जुलाई, 2021
मध्यम हो रहा शाम को सूरज, पसर रहा अंधियारा शनैः शनैः, हो रही एक अजीब सी शांति, जंगल चारो ओर घने-घने। पेड़ करे गूँज स
कोकिला - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 17 अगस्त, 2021
बदली-बदली सी है आज, जाने क्यूँ कोकिला की आवाज़? प्रकृति की जर्जर होती हालत, ख़त्म हो रही हरी भरी वादियाँ, नदियों का दू
मानवता केवल मानवता - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : जून, 2021
जाति धर्म के क्यों पीछे है पड़ता, इसमे केवल नेता ही जमता, उसी को शोभित है दानवता। मेरे लिए तो एक ही धर्म है... मानवता...
सरस्वती वंदना - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 10 अगस्त, 2021
माँ तेरे पैरों पर, शब्दों का फूल चढ़ाता हूँ। तेरे सम्मुख,‌ अपनी लेखनी अर्पित करता हूँ। ह्रदय से मैं तुझे, नमन बार-बा
नव यौवन - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 20 मई, 2019
नव यौवन की नवल राह पर, नवल स्वप्न की कलिका। नव्य नवेली नयन नशीली, नीरज मुख की मलिका। गज गामिनि वह दर्प दामिनी, कल-क
समदर्शी - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 23 जुलाई, 2013
सुख दुःख क्या? मन के विकल्प! इसी विचार से, कायाकल्प। समभाव रहे, जिसका मन। पाते रहे सुख, निज जीवन। रहे सदा खुश, अपना
सिर्फ़! मैं ही कहूँगा? - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 2 दिसम्बर, 2017
जब भी तुम्हें देखता हूँ; तेरी छवि पहले से मोहक लगती है। संशय होता है तुमसे बात करने में; भय लगता है, अपने प्यार का इज
दुःख और सुख - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 22 अगस्त, 2020
दुःख में ही तो सुख का महत्व ज्ञात होता है, दुःख में ही तो शत्रु, मित्र का पहचान होता है। दुःख में ही तो सुख का महत्व
दो पल की ज़िंदगी - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 17 अगस्त, 2020
एक ख़्वाब है जो अक्सर अधूरा होता है, नई चाहत जग जाती है जब पिछला ख़्वाब पूरा होता है। आज जो नया हैं कल वह हो जाती है पु
बेबस ज़िन्दगी - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 17 सितम्बर, 2016
मूक हो के ज़िन्दगी, बहुत कुछ कह जाती है, कभी देती ग़म तो, कभी ख़ुशी दे जाती है। नहीं है पता इसका, कहाँ है ठिकाना, कहाँ इ
हिन्दी भाषा: दशा और दिशा - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 13 सितम्बर, 2021
हिंदी भाषा की आज दशा और दिशा, ज्यों दिवस संग मिश्रित हो जाए निशा। विविध देशज विदेशज भाषा का मेल, भाषा की ऐसी विकृति
हिंदी - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 21 अगस्त, 2021
हिंदी है हिंद की पहचान, है यह हिंद का गौरव। हिंदी हिंद की राष्ट्रभाषा, भाषा यह बड़ी ही सौरभ। हिंदी से मिलता अपनापन
हिन्दी से प्यार करो - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 12 सितम्बर, 2020
हिंदुस्तान के रहने वालों, हिंदी से तुम प्यार करो। ये पहचान है माँ भारत की, हिंदी का सत्कार करो। हिंदी के विद्वानो
हिंदी हमारे हिन्द की शान है - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : 13 सितम्बर, 2021
हिंदी ही हमारी मातृभाषा, हिंदी ही हमारी राष्ट्रभाषा, जननी संस्कृत से लेकर निकली, अपनी नई पहचान है। हिंदी हमारे हिन
हिंदी भाषा - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2021
भारत मेरा देश है, मिट्टी मेरी शान। कहो गर्व से देश की, हिन्दी है पहचान।। एक देश है विश्व में, भारत जिसका नाम। बसते ध
हिन्दी हमारी भाषा - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2021
हिन्दी से सरल, सरस नहिं, है कोई अन्य भाषा। पढने, पढा़ने इसको, हर राष्ट्र लगता प्यासा।। इसमें बसी हमारी मानव संस्क
हिन्दी भाषा - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2021
हिंदी की बिंदी ने कह दी, अक्षर अक्षर महत्व कहानी। हिंदी सुशोभित राजभाषा, स्वाधीन भारत की निशानी। हिंदी का सर्वोच
हिन्दी भारतीयों की चेतना है - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 13 सितम्बर, 2019
हिन्दी भारत की आत्मा है, हमारी पहचान है, हिन्दी को उपेक्षित कर शिक्षा का सर्वांगीण विकास अधूरा है। हिन्दी को मातृ भ
तू बन - संतोष ताकर 'खाखी'
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2020
तू किसी के ख़्वाबों की तावीज़ बन, शायरी बन, उसका मीर बन, उसका ख़ून भी लगे तेरे बिन बेरंग, दिल के हर ज़ख़्म को दे इक रंग, तू उ
विश्वकर्मा - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 16 सितम्बर, 2021
जग का किया निर्माण जिन्होंने, करता हूँ मैं आज उन्हे प्रणाम। दुःख संसार के हर लिए जिन्होंने, सुखी वसुंधरा का किया न
मजबूरी - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2021
अपने हाथ में डंडी लिए चुंबक उसमें बाँध लिए ढूँढ़ रहा कूड़े में टुकड़े लोहे के जैसे मछुआरा जाल बिछाकर पानी में छो
उड़ाने सभी आसमानो में है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 1 जनवरी, 2020
उड़ाने सभी आसमानो में है, आज पंछी सभी ठिकानो में है। आँगन में चुगते रहे सारा दिन, उनकी ज़िंदगी उन दानो में है। चुनाँ
काँधे पर चढ़ी धूप - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
पशु-पक्षी और पेड़ों ने जीवन में कितने रंग भरे। है दिवस के काँधे पर चढ़ी धूप। होगा सागर सरिताओं का भूप।। चलते हु
पर्दे के पीछे - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 17 सितम्बर, 2021
शास्त्री मैदान खचाखच भरा था हिंदी पर परिचर्चा चल रही थी। "हिंदी हमारी मातृभाषा है। इसका भाव सौंदर्य अप्रतिम है," वि
काश! ऐसा कोई जतन हो जाए - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 13 नवम्बर, 2020
काश! ऐसा कोई जतन हो जाए, जाति-धर्म का पतन हो जाए। फिर ना रहे आपस में भेदभाव, सारे जहाँ का एक वतन हो जाए। सभी में हो अपन
सीखें सिखाएँ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 25 अगस्त, 2021
ये हमारा सौभाग्य और ईश्वर की अनुकंपा ही है कि हमें मानव जीवन मिला, तो ऐसे में हम सभी की ये ज़िम्मेदारी है कि हम इस चार
श्राद्ध का भोजन - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 20 सितम्बर, 2021
कौआ बनकर मैं तुम्हारे घर की मुँडेर पर नहीं आऊँगा, अपने और पुरखों का सिर मैं झुकाने अब नहीं आऊँगा। मेरी ही कमाई से त
भटक रहे पाँव - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
सतरंगी इन्द्रधनुष बुन रहा आकाश। है मन ऐसे खिला-खिला जैसे पलाश।। बल्लियों सा उछलता है ये दिल। तय करना दूरी होता
हाँ मैं मज़दूर हूँ - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 21 मई, 2021
रहता अधिकतर अपने परिवार से दूर हूँ, चिंता रहती घर के ख़र्चे की हाँ मैं मज़दूर हूँ। करता जी-हुज़ूरी मालिक की मेरा काम च
धन के सँग सम्मान बँटेगा - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 19 सितम्बर, 2021
धन दौलत के लालच में, भाई भाई से युद्ध छिड़ा है। भूल के सगे रिश्ते नातों को, भाई-भाई से स्वतः भिडा़ है।। एक ही माँ की
दिल उनका भी अब इख़्तियार में नहीं है - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 22 सितम्बर, 2021
दिल उनका भी अब इख़्तियार में नहीं है, क्यूँ रंगत अब उस रंग-बार में नहीं है। उनके दिल में तो इश्तियाक़ प्यार की है, पर
प्राण-प्रिय - सलिल सरोज
  सृजन तिथि : 21 सितम्बर, 2021
अधरों पर कुसुमित प्रीत-परिणय, केशों में आलोकित सांध्य मधुमय। चिर-प्रफुल्लित कोमल किसलय, दिव्य-ज्योति जैसी मेरी प
आया जन्मदिन बाबा भीम का - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 14 अप्रैल, 2021
आया जन्मदिन बाबा भीम का, विश्व समूचा झूम रहा। बाबा भीम के त्याग, समर्पण, बहुजन अम्बर चूम रहा। बाबा भीम के जन्मदिवस
काश - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 15 अगस्त, 2021
काश ऐसा होता, काश वैसा होता, काश ये न होता, काश वो न होता। काश, "काश" से पूरी होती आस, बन गया "काश" सिर्फ़ सपनो का आकाश। का
कुछ पुरानी यादें - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 24 मई, 2013
तेरी आँखो में चाहत के, चिन्ह वो अपने देखें हैं। अपनी हर ख़ुशी में, मुस्कान तुम्हारी पाई है। ग़मों की परछाई में, प्यार
लोग - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 23 सितम्बर, 2021
दुनिया की ख़ुदग़र्ज़ी देखी, हर बातों पर मर्ज़ी देखी। तोहमत जड़ते दूसरों पर, देते दलील फ़र्ज़ी देखी। जो लोग बहुत क़ाबिल ह
ग़रीब की बेटी - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 12 सितम्बर, 2021
उलझे हुए बाल, रूखे ख़ुश्क गाल। सूनी सी आँखें, रोटी का सवाल। विद्यालय से दूर, श्रम को मजबूर। बासी दाल-भात, ताड़ना भ
माँ - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 2020
माँ सब कुछ है। एक स्वर्णिम स्वर्ग है माँ जन्म से मृत्यु तक के सफ़र का। साथ रहते हुए पग-पग पर डगमगाती कदमों को संभाल
सौदागर - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 6 मई, 2021
चारों तरफ़ है ठगों का डेरा, अरे! सौदागर कहाँ का फेरा। मृगनयनी कंचन काया, सौंदर्य की अद्भुत माया, सम्मोहन बिखरा पाया
देशगीत - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 1985
देश के पुजारियों, मिल के करो आरती दे कर संदेश यह, वसुंधरा पुकारती। भिन्न भिन्न धर्म है प्रदेश भी अनेक हैं, भिन्न रं
दामाद - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 16 सितम्बर, 2021
बिटिया का पति दामाद होता है, समय की बात है कि दामाद कभी रसगुल्ला तो कभी दोधारी तलवार होता है। गिरगिट की तरह रंग बदल
श्राद्ध दिवस - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 22 सितम्बर, 2021
आइए! फिर इस बार भी श्राद्ध दिवस की दिखावटी ही सही औपचारिकता निभाते हैं, सामाजिक प्राणी होने का कर्तव्य निभाते हैं
ये कैसा श्रद्धा भाव - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 11 सितम्बर, 2020
इस समय पितृ पक्ष चल रहा है। हर ओर तर्पण श्राद्ध की गूँज है। अचानक मेरे मन में एक सत्य घटना घूम गई। रमन (काल्पनिक नाम)
दान - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 20 सितम्बर, 2021
युगों युगों से चली आ रही दान की परंम्पराओं का समय के साथ बदलाव भी दिखा। देने से अधिक दिखाने का प्रचलन बढ़ा। थोड़ा दे
शिक्षा - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 5 सितम्बर, 2021
ज्ञान का भंडार है शिक्षा, ज़िंदगी का सम्मान है शिक्षा। देश का उत्थान है शिक्षा, हर व्यक्ति का अरमान है शिक्षा। शिक
चाय की चुस्की - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 29 जुलाई, 2021
चाय की चुस्कियाँ काली ज़रूर होती है, पर बात काले और सफ़ेद के फ़र्क़ की नही जनाब, चाय की चुस्कियाँ होती बड़ी ही मस्त अलमस
तुम्हे उर्मिला बनकर - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 19 सितम्बर, 2021
हमे लखन सा वनवासी बन, घर से दूर बहुत जाना है, तुम्हे उर्मिला बनकर मेरी अवधपुरी में रहना होगा। मेरे जाने का वह पल भी
क्या साथ मेरा दे सकोगी? - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 7 जुलाई, 2021
मुश्किलों से जो कभी मन हार थककर बैठ जाए, तब कहो सहगामिनी क्या साथ मेरा दे सकोगी? हाँ मुझे स्वीकार निर्मल, नेह का बं
पिता - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 14 मई, 2021
है पिता ही, जो कभी सपनों को मरने नहीं देता। हालात कितने भी हों विपरीत, मगर डरने नहीं देता।। लाख मुसीबतों में भी, मैं
आत्मविस्मृति - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 29 जनवरी, 2019
हम उस राह के हैं पथिक! जाते जिस पथ से, वहाँ तेरे पाँवों की आहट सुनाई देती! तेरी छनकती पायल; खनकती चूड़ियाँ; कानों की झ
पर! कोई बात नहीं - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 17 जून, 2012
वेदना जगी! हृदय में वेदना जगी। मार पड़ी! ग़मों की मार पड़ी। विरान हो गया; सारा संसार। फिर एक बार, बारिश के थपेड़ों
सुहाना है सफ़र अब तो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 15 दिसम्बर, 2019
सुहाना है सफ़र अब तो, नहीं होगी ख़बर अब तो। जिसे नादान समझे थे, वही लगता जबर अब तो। ज़माना इस तरह बदला, डराता हर बशर अब
प्यासी है प्यास - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 16 नवम्बर, 2019
है अथाह जलराशि प्यासी है प्यास। ज्वार भाटा सौंदर्य है सागर का। दुःख सुनता कौन छूछी गागर का।। नखत हैं फिर भी स
पतझर - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 5 अप्रैल, 2019
झरते पत्ते कर रहे, हम सबको आगाह। दुख पीता है नीर को, दुर्गम सुख की राह।। पतझर का मौसम हुआ, उजड़ा उजड़ा गाँव। मानो धर
रेत का बिछौना - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 15 नवम्बर, 2019
लगता है मरुथल- रेत का बिछौना। दूर-दूर तक नहीं दिखता है जल। नज़र नहीं आ रहे पंछी के दल। व्यर्थ है यहाँ- हरियाली का
पिया परदेश - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 28 सितम्बर, 2021
पिया क्यों गए विदेश। भेजा ना कोई संदेश।। पिया प्रियतम परदेश से पधारें। प्रेम पूजारिन पूछे प्यारे।। पल-पल न कटत
मिलने तुम आ जाना - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 27 सितम्बर, 2021
नित्य नए षड्यंत्र देख, कब तक ख़ामोश रहूँ मैं? देख ज़ुल्म अन्याय को, कब तक इन्हें सहूँ मैं? अपने अनकहे दर्द को मैंने, ब
नशा करे चेतना शून्य - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 21 सितम्बर, 2021
क्षण भर के आनंद के लिए अपना ही नहीं अपने परिवार का भी जीवन तो मत बिगाड़िए, तन का नाश, मन का विनाश चेतना को शून्य की ओर
एक अधूरी दास्ताँ - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 7 जुलाई, 2021
कितनी बातों की ख़ामोशी, उन्हें बतानी थी, हर एक अक्स की कहानी उन्हें बतानी थी। सुबह की इबादत और, शाम की अज़ान भी उन्हे
जिस घर जन्मी बेटी - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 28 सितम्बर, 2021
जिस घर जन्मी बेटी, उस घर ख़ुशियों की बौछार है। बेटी सम्मुख हर धन-दौलत, फीकी इस संसार है।। जिस घर जन्मी बेटी, उस घर रि
इश्क़ तो इश्क़ है सब को इश्क़ हुआ है - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 23 सितम्बर, 2021
इश्क़ तो इश्क़ है सब को इश्क़ हुआ है, इस क़दर कुछ न हुआ जो इश्क़ हुआ है।
पाँच अँगुलियाँ - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : मार्च, 2021
कहावत है पाँचो अँगुलियाँ बराबर नहीं होती। इसी बात पर सभी अँगुलियों में विवाद हो गया। हर एक अँगुली अपनी उपयोगिता गि
मेरे पिता - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 29 सितम्बर, 2021
मेरा अभिमान मेरा स्वाभिमान मेरा अनुशासन मेरा भाषण मेरे पिता। मेरा मान मेरा सम्मान मेरा प्यारा मेरा सहारा म
वृद्ध जनों की करो हिफ़ाज़त - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 30 सितम्बर, 2021
धरती और गगन के जैसे, वृद्ध जनों के साए हैं। इन बूढ़े वृक्षों की हम सब, पल्लव नवल लताएँ हैं। इनके दिल से सदा निकलती,
श्राद्ध व तर्पण - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 28 सितम्बर, 2021
माह भादप्रद पितृपक्ष काल, श्राद्ध तर्पण करते हर साल। स्वपूर्वजों का ऋण चुकाते, सद्कर्मों से काटे पाप जाल। श्रद्
महात्मा गांधी - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 1 अक्टूबर, 2021
भारत में जन्मे हैं ऐसे रत्न अनमोल, परिवर्तित कर दिया जिन्होंने भूगोल। अगणित अनुयायी बने थे जिनके, संतवाणी मानते थ
अहिंसा के पुजारी - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 1 अक्टूबर, 2021
भूल गए सब पाठ अहिंसा, पल पल हिंसक हो जाते हैं। आगे निकलने की जल्दी है, ग़लत राह पर बढ़ जाते हैं। भूल गए बापू गांधी को,
उड़ान - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 19 जुलाई, 2021
काश मैं भी एक पंछी होता, घोंसले से ही भर लेता उड़ान। सारी ऊँचाइयों को लेता नाप, भरता मैं हौसलों की उड़ान। हौसले तो
पिता ही करता ऐसा काम - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 10 सितम्बर, 2021
चुप रह कर जो हर पल सोचे, मौन रहकर करे सब काम। सामने वाला जान भी न पाए, करे उसके हर ज़रूरतों का इंतज़ाम। ऐसा करने वाला को
लाल बहादुर शास्त्री - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 2 अक्टूबर, 2021
सीधा सच्चा जिनका था जीवन, कष्ट भरा जीवन था आजीवन। बाधाओं से था भरा उनका जीवन, कर्तव्य पथ पर टिके थे आजीवन। तपस्विय
वृक्ष लगाओ, पुण्य कमाओ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 23 सितम्बर, 2021
पुण्य कमाओ या न कमाओ पहले अपना जीवन बचाओ, धरा की हरियाली न मिटाओ, अपने हाथों ही जीवन न गँवाओ। धरती को न वीरान करो, सड़
गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 25 सितम्बर, 2021
गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं, चाय की सोहबत में दिल को शाद करते हैं। इस शब-ए-ग़म में क्या हम शब-ज़ाद करते हैं, ब
गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 25 सितम्बर, 2021
गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं, चाय की सोहबत में दिल को शाद करते हैं।
ख़ुदकुशी क्यूँ की? - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 5 जून, 2021
27 वर्षीय रोहित सरकारी बैंक में मैनेजर के पद पर तैनात था, जिसका विवाह 2 वर्ष पूर्व ख़ूबसूरत दीपिका से हुआ था। दोनों का
महालया - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 3 अक्टूबर, 2021
पितृ पक्ष को कहते विदा, देवी पक्ष का करते अभिनंदन। श्रीराम लंका युद्ध में जाने को तैयार, कर रहे देवताओं के संग माँ
पितृपक्ष - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 3 अक्टूबर, 2021
हमारे पूर्वज हमें जब भी कभी याद आते, पावन पितृपक्ष हम तब तब हैं मनाते। अपनी जड़ों से हम करते यूँ मुलाक़ातें, संस्कार
कौन सुनेगा मेरी बात - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 15 जुलाई, 2015
असत्य, हिंसा और भ्रष्टों की टोली में, कौन सुनेगा मेरी बात। चेहरे-चेहरे से फ़रेबी कर रहा है, हर रिश्ते में छलावा हो र
नवरात्रि - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 7 अक्टूबर, 2021
हर घर हुई आज घट की स्थापना, करेंगे माँ दुर्गा को विराजमान। नवरात्रि के होते पूरे नौ दिन, अलग अलग रूपों में माँ होगी
लिखता हूँ - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 3 अक्टूबर, 2021
समाज में हो ऐसा बदलाव लिखता हूँ, मोहब्बत आए मुल्क में वो सैलाब लिखता हूँ। टूटती चुप्पियों की बन आवाज़ लिखता हूँ, वं
अन्नदाता - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 29 सितम्बर, 2021
चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर भोर हुए जग जाता है, लिए कुदाली कंधे पर अपने खेत पहुँच जब जाता है। धरा का चीर कर सीना नए अं
तुम्हारा जो सन्देश आया - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 2 जुलाई, 2020
प्रिय! तुम्हारा जो सन्देश आया, जैसे बहारों का मौसम छाया। भीनी सी गंध श्वासों को भिगा गई, अनकहे सवालों ने हृदय में
तू अविरल चलता जा - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 14 अगस्त, 2021
रे मानव! तू अविरल चलता जा, रे मानव! तू दीप सा जलता जा। पैरों के छालों से घबराना ना तुम कभी, तूफ़ाँ आएँगे राहों में डर
चमचमाती कारों से - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 28 अक्टूबर, 2019
काली अमावस में दीप जलते हैं तारों से। पर्व है दीवाली का। रश्मियों के माली का।। बाज आ गए अब हम हैं उनके उपकारों
है मर गया आँख का पानी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 21 अक्टूबर, 2019
है मर गया आँख का पानी, बाग सरीखी नष्ट जवानी। ख़ुशी मिली रस्ते में मुझको, दिखती थी वो कुबड़ी कानी। झुग्गी के ख़्वाबों
हाल है ये अब बुरा अब बुरी हर शय लगे - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 9 अक्टूबर, 2021
हाल है ये अब बुरा अब बुरी हर शय लगे, बिन तिरे महफ़िल बुरी ठीक पर ये मय लगे।
नफ़रत - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 30 सितम्बर, 2021
नफ़रतों का फैला सैलाब, घनघोर है षड्यंत्र, हो रही ओछी राजनीति, ख़तरे में है गणतंत्र। स्वतंत्र राष्ट्र के हम, हैं नागरि
उपहास - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 26 सितम्बर, 2021
उठ जाग रे ए मानव, मत कर यूँ उपहास, युगों युगों से करता आया, कैसा यह विनाश? प्रकृति खो रही स्वरूप, मचाया तूने विध्वं
नारी का नार्यत्व - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : 8 मार्च 2021
स्त्री का स्त्रीत्व, नारी का नार्यत्व, ममता का ममत्व, बहिन का अपनत्व, जो इन सबका जानते महत्त्व, हृदय में उनके बसता
बाग में चँदोवा - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 24 अक्टूबर, 2019
फूलों का खिंचा हुआ बाग में चँदोवा। पंखों पर तितली के गंध की सवारी। है शेफाली के फूलों की छवि न्यारी।। गुलाबों
बहुत रास आया - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 22 अक्टूबर, 2019
महानगर में हमनें घरौंदा बनाया। पर हमें गाँव खेड़ा बहुत रास आया।। ताल, अमराई, मेड़ रही है। पुरवा निगोड़ी छेड़ रही है।
यम कुबेर की पूजा - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 18 अक्टूबर, 2019
धनतेरस में होगी यम कुबेर की पूजा। खरींदें वाहन चाँदी, सोना। महल का जगमग कोना-कोना।। नक्षत्रों में हुआ है पुष्
होम करते हाँथ जलते - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 8 अक्टूबर, 2019
होम करते हाँथ जलते, चाँद उगता सूर्य ढलते। वे अदब से बोलते हैं, पर हमें शादाब खलते। ठूँठ सा इक वृक्ष है पर, फल वहाँ
चावल उबला पीच रहा है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 6 अक्टूबर, 2019
चावल उबला पीच रहा है, माली पौधे सींच रहा है। क़ातिल सा अंधेरा देखा, एक किरण को भींच रहा है। सूरज ने बादल जब देखा, अप
बरसात के रूप - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : 23 जुलाई, 2021
लो आ गई पुरवाई लेकर फिर एक नई शुरुआत, वो भीगा-भीगा सा मौसम और मदमाती बरसात। लुकाछिपी करने लगी निष्ठुर धूप, जो लगाए ब
झण्डा - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 14 जुलाई, 2021
भारत प्यारा देश हमारा, रखता जग में शान। तीन रंग झंडा लहराए, करता महत्व बखान।। प्रधानमन्त्री झण्डा फहराए, लाल किले
नारी शक्ति - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 23 नवम्बर, 2020
उठो शेरनी संगठित होकर, फूलन को अब याद करो, अस्मत लूट रहे जो शातिर, उनको अब बर्बाद करो। करो सामना गद्दारों का, तुम व
उपवास - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 8 अक्टूबर, 2021
नवरात्रि में उपवास का अनुष्ठान, माँ दुर्गा से शक्ति का मिले वरदान। शारीरिक मानसिक बल मिलता, नवरात्रि में व्रत का
समंदर - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 21 अगस्त, 2021
बड़ा हुआ मैं खेलते खेलते, गाँव की उन पगडंडियों में। रस्सी कूदा करता था मैं, घूम घूम कर सारी गलियों में। कूद जाता थ
नवरात्र का त्यौहार - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 9 अक्टूबर, 2021
आया नवरात्र का त्यौहार, बज रहे ढ़ोल नगाड़े, लूँ माँ का आशीष, माँ आयी है मेरे द्वारे। झूम रही सारी धरती, हर्षित हुआ यह चम
काम आई बहुत आज ये मय-कशी - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 10 अक्टूबर, 2021
काम आई बहुत आज ये मय-कशी, बे-असर है दवा, ये ज़हर है सही।
अद्वितीय भारतीय सेना - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 9 सितम्बर, 2021
जिस देश की सेना का देख ‌अद्भुत साहस, बडे़ से बडे़ दुश्मनों के हौसले पस्त हो जाते हैं। बात हो जब देश के फौजों की जाँब
नवरात्रि का संदेश - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 12 अक्टूबर, 2021
माँ दुर्गा हर वर्ष इस पावन भुमि पर‌ आती है, आते ही अपनी सवारी से कुछ संकेत ‌दे जाती है। नवरात्रि के हर्षोल्लास में अ
आपके लिए - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2020
रीमा ससुराल से विदा होकर पहली बार मायके आई। मांँ बाप भाई बहन सब बहुत ख़ुश थे। हों भी क्यों न? अपनी सामर्थ्य से ऊपर जाक
प्रकृति का आँचल - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 12 अगस्त, 2018
चहुँ दिशि किरनें बिखर गई हैं, निशाभर सोई लताएँ उठकर अब निखर गई है। शबनमी बूँदों ने निशाभर स्नान कराया, पवन ने प्
दशहरा - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 15 अक्टूबर, 2021
सच्चाई की होती जीत सदा, झूठ की होती हार, राम-रावण युद्ध का, अंत है दशहरे का त्यौहार। सत्य की हुई जीत, झूठ का हुआ मुँह क
विजयादशमी - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : 5 अक्टूबर, 2021
विजय रावण पर श्रीराम की। विजय दुष्ट पर कृपानिधान की। विजय दानवता पर मानवता की। विजय अपावन पर पावनता की। विजय दुष
नवरात्रि पर्व - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : अक्टूबर, 2021
नवरात्रि हिंदूओं का प्रमुख त्यौहार, उमंग व उत्साह से मनाता संसार। शक्तिदात्री माँ दुर्गा की करते पूजा, घर-घर सजता
विजयदशमी और नीलकंठ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 15 अक्टूबर, 2021
हमारे बाबा महाबीर प्रसाद हमें अपने साथ ले जाकर विजयादशमी पर हमें बताया करते थे नीलकंठ पक्षी के दर्शन भी कराते थे,
बेटी है तब - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 15 अक्टूबर, 2021
बेटी है, तब माता है, बेटी है, तब बाप। बेटी है, तब पत्नी है, बेटी है, तब हम, आप।। बेटी है, तब रिश्ते हैं, बेटी है, तब परिव
नया सवेरा फिर आया है - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 20 अगस्त, 2021
उठो साथियों! निंद्रा त्यागो, नया सवेरा फिर आया है। नव उमंग, तरंग, रंग नव, मग नव, नव चेतन लाया है।। मुर्गे कुकडू़ कु
मिसाइल मैन कलाम - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 15 अक्टूबर, 2020
मिसाइल निर्माण भारत में कलाम कर रहे, सारे देश विश्व के सलाम कर रहे। चीन, रूस, अमेरिका, लंका हिला दिया, कलाम जी ने वि
धरोहर - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
हम सबके लिए हमारे बुज़ुर्ग धरोहर की तरह हैं, जिस तरह हम सब रीति रिवाजों, त्योहारों, परम्पराओं को सम्मान देते आ रहे ह
विजयपथ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 10 अक्टूबर, 2021
सच कड़ुआ होता है फिर भी अच्छा है, बुराई लाख गुणवान हो जाए सच्चाई से दूर रहता है। विजयपर्व का ढोंग करना क्यों अच्छा ल
हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 17 अक्टूबर, 2021
हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू, हर गीत मेरी हर ग़ज़ल में शामिल है तू। है ख़ुश-नुमा ये ज़िंदगी मेरी आजकल, ये हे कि मेरे
हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 17 अक्टूबर, 2021
हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू, हर गीत मेरी हर ग़ज़ल में शामिल है तू।
गलने वाले दीप - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 26 अक्टूबर, 2019
देखे पल पल भेष बदलने वाले दीप। चहल पहल सरगर्मी तो कूचे में है। सन्नाटा बजता मानो छूछे में है।। खड़े हुए पातों म
वंशी के स्वर - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 16 अक्टूबर, 2019
कानों में गूँज रहे वंशी के स्वर। पंछी का दल उड़ चला आकाश में। गाछ को लता बाँधे हुए पाश में।। छाया सा सिमट गया अन
घोड़े हवाओं के - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 16 अक्टूबर, 2019
कतर दिए हैं पर वादे वफ़ाओं के। तन पर पड़ते जाड़े के कोड़े। हैं गद-गद अलाव थोड़े-थोड़े।। दौड़ रहे सरपट घोड़े हवाओं के। मं
बे-नियाज़ अब नहीं मिलेंगे - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 25 सितम्बर, 2019
बे-नियाज़ अब नहीं मिलेंगे, पतझर में गुल कहाँ खिलेंगे। नैतिकता का क़त्ल हुआ है, धरती, अंबर, शिखर हिलेंगे। नर्म-नर्म द
समय की किसी से सगाई नहीं है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 26 सितम्बर, 2019
समय की किसी से सगाई नहीं है, निद्रा में निशा जो जगाई नहीं है। रहे झाँकते हैं गगन से सितारे, धरा पे न जाने भलाई नहीं ह
ख़ुशी तो हमेशा पलों के लिए है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 27 सितम्बर, 2019
ख़ुशी तो हमेशा पलों के लिए है, ग़ज़ल शायरी दिलजलों के लिए है। जहाँ रोज़ रिश्ते पराए हुए हैं, सुभीता रही तो खलों के लिए ह
तेरे बिना - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : मार्च, 2021
तेरे बिना रो पड़ता हूँ तुझे राज़ी करने के लिए, तेरे बिना जीवन मानिंद जहन्नुम हैं। तू नहीं तो जीवन का हर सुख दुःख हैं।
भोर भी होगी - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 13 अगस्त, 2021
भोर भी होगी सूरज भी निकलेगा, चाँदनी सँग-सँग चाँद भी बहकेगा। पर ना खिलेंगे मिट गए जो फूल, मिट गए माटी में बन गए जो धूल
पगली - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 6 अक्टूबर, 2021
प्रेम रंग में रंगी एक शहज़ादी, मुहब्बत के हंसी रंग बुनती है। पुष्प बिछाती राह में उसके, काँटे ख़ुद के लिए चुनती है।
ये कैसा अपनापन है - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : नवम्बर, 2020
कौन कहता है कि, बेटी तो पराया धन है? पूछो उससे कि तेरा, ये कैसा अपनापन है।। पूछो उससे कि.... अपनी जनी को ही तू पराया कैस
इश्क़ तो इश्क़ है सब को इश्क़ हुआ है - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 23 सितम्बर, 2021 - 20 अक्टूबर, 2021
इश्क़ तो इश्क़ है सब को इश्क़ हुआ है, इस क़दर कुछ न हुआ जो इश्क़ हुआ है। चेहरा एक निगाहों से न हटे जब, वास्ता आप भी समझो इश्
दोस्ती - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 5 मार्च, 2021
है दोस्ती ही जो सिखाती है, मुसीबत में साथ देना, दौड़कर गिरते हुए साथी के, हाथ में हाथ देना। जब कभी मुसीबत में, मैं उद
माँ - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 26 फ़रवरी, 2021
माँ नहीं होती, तो मैं कहाँ होता, न तुम होते, न ये जहाँ होता। मुझे याद हैं वो रातें, माँ की लोरियाँ और बातें। रात में न
करवा चौथ - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 23 अक्टूबर, 2021
करवा चौथ पर सभी औरतें, कर रही अद्भुत शृंगार, कर रही माता करवा की अर्चना, मिलेगी माँ की कृपा अपरंपार। लड़कियाँ कर रही
ख़ूबसूरती निहारती आईने - विपिन दिलवरिया
  सृजन तिथि : 7 अक्टूबर, 2021
ख़ुशहाल थी मेरी ज़िन्दगी, कुछ भी ग़म नहीं था जीने में। हँसती इठलाती फिरती थी, कोई ख़ौफ़ नहीं था सीने में। पिता की लाडल
उपहार - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 22 सितम्बर, 2021
रोज़ आता यह भक्त, प्रभु तोरे दरबार, नहीं माँगा मैने आजतक, तुमसे कोई उपहार। सोचता हूँ, नहीं है मुझे, कोई भी अधिकार, कैस
संसार की रीत निराली - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 23 नवम्बर, 2010
संसार की रीत निराली कहीं क्रन्दन कहीं दीवाली। संसार की... कहीं रंगे मन रंगों में कहीं भटके मन होके वैरागी। संसार
सिमटता गाँव - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 15 अक्टूबर, 2021
जीवन के तीस बसंतों को पार कर चुका हूँ, जब कभी एकांत में बैठ कर बीते हुए वर्षों का अवलोकन करता हूँ तो लगता हैं कि समय न
देवी मइया - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : अक्टूबर, 2021
मइया ऊँची है तोहरी अटरिया। कइसे आवउँ मै तोहरी नगरिया। 2 लहँगा मइ लाई चुनरिया हूँ लाई, बेलवा चमेलिया की माला बनाई,
माई के मन्दिरवा भीतर - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : अक्टूबर, 2021
मगिहौं वरदान माई के मन्दिरवा भीतर। 2 गइहौं गुनगान देवी के मन्दिरवा भीतर। 2 सोना न मगिहौं चाँदी न मगिहौं, घोड़ा न मगि
प्यारी मइया - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : अक्टूबर, 2021
मइया री मइया ओ मोरी मइया। हम तोहरे बालक हैं तू प्यारी मइया। मइया री... 2 चन्दा के जैसो मुखड़ो है तेरो, नयनन मा ममता है
सिंहनी - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 1 जनवरी, 2018
स्वर्ण की ज़ंजीर बाँधे, स्वान फिर भी स्वान है। धूल धूषित सिंहनी, पाती सदा सम्मान है। आत्मनिर्भर स्वाभिमानी, शौर
वृक्ष संरक्षण - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
वृक्ष से मिलती हवा है साँस लेने के लिए हमको सदा। मधुर रसमय फल व शीतल छाँव, थक जाएँ यदा।। वृक्ष देते जल हमें, ईंधन जल
कवि भाव - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
कवि भाव कविता में, नित भावुक कर देता है। हर अभाव-भाव उर नित, प्रभाव-भाव भर देता है।। कवि क़लम-सरासन, शब्द-बान, जब, तर
जितनी बार पढ़ा है तुमको - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 23 अक्टूबर, 2021
एक प्रणय के संबोधन में हमने कितने नाम दिए। जितनी बार पढ़ा है तुमको उतने ही अनुवाद किए। डूबा रहता हूँ यादों में दृग
दिनमान - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 16 अक्टूबर, 2021
प्राची से रवि का हो रहा आगमन, ला रहा वह संग भोर भरा दामन। शीतल सुवासित बयार बहने लगी, मनमोहक पुष्पों से निखरा चमन।
नवरात्रि: वैज्ञानिक महत्व - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 9 अक्टूबर, 2021
भारत धार्मिक त्यौहारों का देश, सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश। गूढ़ रहस्य तथा ज्ञान से परिपूर्ण, वेद, पुराण ग्रंथ में
श्री लाल बहादुर शास्त्री - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 2 अक्टूबर, 2021
भारतीय संस्कृति के वह परिचायक, नैतिक मूल्यों के सदैव रहे उन्नायक। भारत सुत श्री लाल बहादुर शास्त्री, जटिल समस्या
मधुशाला - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 29 सितम्बर, 2021
मेरे अंदर भी है एक मधुशाला, ख़्याल मेरे बने हैं साक़ीबाला। जज़्बात समंदर लेता हिलोरे, कलम परोसे काग़ज़ पर हाला। लम्हे
नीर चक्र - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 20 जुलाई, 2021
वसुधा के अंकपाश में खेले नीर, सृजित जल तत्व से मानव शरीर। धरा गगन पर अठखेलियाँ करता, निराकार बहता फिरता पय अधीर। द
देश हमारा - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 24 जून, 2021
विश्व बंधुत्व का राग छिड़ेगा, राष्ट्र प्रगति के सोपान चढ़ेगा। विश्वविजेता हो देश हमारा, सुंदर स्वच्छ यह परिवेश
नारी - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 4 फ़रवरी, 2021
ईश्वर की अनुपम अद्भुत कृति, विनम्र सहनशील गुण प्रभृति। अपार अथाह प्रेम धारणी, पद गृहस्वामिनी नियति निर्भृति। न
आज टूटी सी भुजा है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 13 अक्टूबर, 2019
आज टूटी सी भुजा है, यानि घायल अब शुजा है। एक दूजे के लिए हैं, राम हैं मानो कुजा है। ये बहारें हैं बलाएँ, गर बवंडर ही
नदी की कहानी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 6 अक्टूबर, 2019
कौतुकी हुई है नदी की कहानी। उद्गम से शुरू फिर चौड़ा है पाट। मिलते हैं रस्ते में नदिया औ घाट।। चूमें है चश्म मौजो
काँटों को ताज - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 21 सितम्बर, 2021
फूलों को घाव मिले काँटों को ताज। पुष्पित पल्लवित हो गया फ़रेब। अब विशेष गुण हो गया है ऐब।। पंछी भी भूल गए भरना पर
बजतीं हैं फल्लियाँ - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 20 सितम्बर, 2021
जागे हैं खेतिहर अगहन में। जोतेंगे खेत बैल नहे हल। है साँझ लौटे चिड़ियों के दल।। पोई की पत्तियाँ अरहन में बजतीं
उपदा केवल खाम ख़याली है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 15 अगस्त, 2019
उपदा केवल खाम ख़याली है, सियासत में मंत्री मवाली है। अभिनन्दन जहाँ होना चाहिए, माहौल ने ताना दुनाली है। अटैची नोट
ख़्वाहिश का उठे जनाज़ा है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 8 सितम्बर, 2021
ख़्वाहिश का उठे जनाज़ा है, ख़बर अख़बार की ताज़ा है। मूल सूद चुकता है फिर भी, बेजा है चूँकि तक़ाज़ा है। हम समझे उन्हे बे-अद
आँसू की नदिया बही - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 26 मई, 2021
आँसू की नदिया बही, कोरोना की मार। मौत यहाँ तांडव करे, जीना है दुश्वार।।
अंतर्द्वंद - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 23 अगस्त, 2021
लंबी प्रतीक्षा के बाद आख़िर वो दिन आ ही गया और उसने सुंदर सी गोल मटोल बेटी को जन्मदिन दिया। सब बहुत ख़ुश थे। यहाँ तक की
दोष किसका? - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 13 अप्रैल, 2020
आज रमा को अपनी भूल का बहुत पछतावा हो रहा था।आज रह रह कर कर उसे वह दिन याद आ रहा था, जब उसने माँ-बाप की चिंता में और पति क
सबक़ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 12 अक्टूबर, 2021
समय तेज़ी से निकल रहा है सबक़ सीखने की सीख दे रहा है, मगर हम मुग़ालते में जीते हैं, समय का उपहास उड़ाते रहते हैं। अब भी सम
राम फिर आ जाओ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 17 अक्टूबर, 2021
हे राम! एक बार फिर आ जाओ, अब और न इंतज़ार करवाओ। धरा पर पापियों का आतंक बढ़ रहा है, हर ओर काला नाग फन फैलाए खड़ा है। बहन ब
जीव और प्राणी - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 19 अक्टूबर, 2021
हर जीव, हर प्राणी का जीवन आधार है जल, जंगल, ज़मीन, मानव ही प्राणी कहलाते बाक़ी सब हैं जीव। कहते हैं चौरासी लाख योनियों
मातु-पिता यदि साथ हों - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 3 अगस्त, 2020
मातु-पिता यदि साथ हों, तम में दिखे उजास। ईश्वर तो हैं बाद में, ये हैं दिल के पास।।
रूह की ताक़त - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 10 जुलाई, 2020
तुम्हारे इश्क़ को ही पूजती हूँ, मगर तक़दीर से मैं जूझती हूँ। सजाया था कभी जो फूल लब पे, महक तेरी उसी में सूँघती हूँ।
जीवन-धारा - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 10 जनवरी, 2019
तू बिखर गई जीवन-धारा हम फिर से तुझे समेट चले। हम फिर से... 2 मैं रोई थी घबड़ाई थी, उठ-उठ कर फिर गिर जाती थी। तू नागिन जैस
संसार ने दिया क्या? - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 28 अक्टूबर, 2021
ये सौभाग्य हमारा है कि हम इस संसार में आए, ख़ुशियों के सूत्रधार बने रिश्तों के आयाम बुने। पर हमनें संसार को क्या दि
वक़्त चला जाएगा - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 1 जून, 2021
वक़्त कैसा भी हो भला कब ठहरा है? अच्छे दिन, सुनहरे पल भी आख़िर खिसक ही जाते हैं, कठिन से कठिन समय भी एक दिन चले ही जाते ह
जीवन संगिनी - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 20 नवम्बर, 2020
बात तो तब हुई, जब वो मुस्कुराई। उससे पहले तो मैं, डरा हुआ था। बातों में अजीब सी, मधुरता थी उसके। ऐसा मीठा संवाद, पहले
बोलीयों का प्रभाव - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 16 अक्टूबर, 2021
अपनी तरह की बोली बोलने का, है सबको आज़ादी। पर जो बोलता प्रभावी, वो दुनिया पर पड़ता भारी।। प्यार की बोली बोल कर, किजिए
शनासाई - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 5 मई, 2019
ऐनाकोंडा रातें होंगे दिन कसाई! उमंगें मन की बासन धोतीं! है शादमानी अखियाँ रोतीं! अभिनंदन के बदले में है जग हँसा
गुलमोहर - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 28 अप्रैल, 2019
गुलमोहर मानो स्वर्ग का फूल! लबालब भरा है पराग! खुले मधुमक्खी के भाग! मधुका का छत्ता रहा है झूल! धधके अंगार सा रं
धनतेरस - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 1 नवम्बर, 2021
अप्रतिम क्षण वह समुद्र मंथन का, भगवान धनवंतरि के आगमन का। कार्तिक मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, अमृत कलश के दिव्य दर्श
दीपावली - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 28 अक्टूबर, 2021
जगमगा रही अमावस की रात, धरती पर आई तारों की बारात। दीपावली का पर्व सुहाना, मस्ती में झूमते गाते गाना। त्यौहार का म
दीया और दीपावली - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 17 अक्टूबर, 2021
आओ मिलकर दिवाली मनाएँ, हर कोने में दिए जलाएँ, धरती का अंधकार मिटाएँ, दीया जलाएँ, क़ंदील जलाएँ। आशाओं के दीप जलाएँ, नि
धनतेरस के रंग - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 27 अक्टूबर, 2021
साँझ होंगी, आसमाँ में चमकेंगे, चाँद और हज़ारों सितारे, कार्तिक महीने के तेरहवें दिन, धन तेरस के बजेंगे नगाड़े। धन तेर
त्यौहारों का मौसम - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 7 नवम्बर, 2020
त्यौहारों का मौसम आया सबकी व्यस्तता बढ़ाया, अभी करवा चौथ बीता है, अब धनतेरस, जमघंट के बाद दीवाली की तैयारी है, भैय्य
दीपावली का जश्न - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 15 अक्टूबर, 2021
दीपावली का जश्न मनाने का दिन है आज, अम्न-ओ-वफ़ा का दीप जलाने का दिन है आज। हरगिज़ न हो सके अब अँधेरा किसी के घर, ऐसी शम
संभलना सीखिए - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 13 अक्टूबर, 2021
लड़खड़ाते हैं क़दम तो फिर संभलना सीखिए, वक़्त के मानिंद अब ख़ुद को बदलना सीखिए। तुम सहारे ग़ैर के कब तक चलोगे इस तरह, च
दादी माँ - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 17 अक्टूबर, 2021
रोज़ सवेरे स्कूल जाने हमें जगाती दादी माँ। अपने जीवन के अनुभव हमें बताती है दादी माँ।। रोज शाम को अच्छी सी कहानी
दीप पर्व का सम्मान - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 4 नवम्बर, 2021
दीपों की लड़ियाँ सजाएँ आइए दीवाली मनाएँ, उल्लास भरा त्यौहार मनाएँ। एक दीप राष्ट्र के नाम भी जलाएँ भारतीयता के नाम
करते टीका - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 19 सितम्बर, 2019
उनको बिल्कुल आता नहीं सलीक़ा। घुटन भरे जीवन में खुला झरोखा। चारों खाने चित्त हुआ है धोखा।। घर से ज्यों ही निकल
चौमासे की देह - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 19 सितम्बर, 2019
वसुधा के पाप यहाँ धोता है मेह। सड़कें गलियाँ और शिलाएँ हैं। लू से झुलसी हुईं फ़िज़ाएँ हैं।। लगा भिगोने सबको पावस
अलोनी है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 7 सितम्बर, 2019
हिंदी सुघड़ सलोनी है! इसमें लालित्य भरा! मीठा साहित्य भरा!! हिंदी हुई मघोनी है! है संस्कृति का गहना! निर्झरिणी
है दुनिया पर नहीं भरोसा - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2 अगस्त, 2019
है दुनिया पर नहीं भरोसा, पानी पी पी कर है कोसा। घर में इतनी चहल पहल है, औ कुढ़ कर बैठा है गोशा। ऑफ़िस की मीटिंग में म
गोवर्धन पूजा - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 5 नवम्बर, 2021
इंद्र को जब भ्रम हुआ अपने पर बड़ा अभिमान हुआ, गोवर्धन पर्वत की पूजा उन्हें तनिक न रास आई, भावावेश में मूसलाधार बारि
अपनी भी दीवाली होती - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 4 नवम्बर, 2021
होता तेरे चेहरे का नूर, रात न फिर ये काली होती। जश्न मनाते साथ तुम्हारे, अपनी भी दीवाली होती। बैठे हैं हम मन को मार
भाई दूज - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 5 नवम्बर, 2021
भगवान सूर्यनारायण की पत्नी थी छाया, जन्मे यमराज और यमुना, यमुना भाई से करती थी अपार स्नेह, भोजन कराने की करती थी काम
फ़ासले - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 8 अक्टूबर, 2021
उम्र ढलती गई, अंदाज़ बदलते गए, दिल से दिल के फ़ासले बढ़ते गए। जीना चाहते हैं सभी सुकून से, सुकून की ज़िंदगी के मायने बदल
वो फूल हैं हम - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 12 अक्टूबर, 2021
अब ये मत पूछना, ऐ काँटों! कि कौन हैं हम। मामूली मत समझना हमें, गर मौन हैं हम।। मोहब्बत के मकरन्द में सने हैं, वो फूल
भैया दूज - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 6 नवम्बर, 2021
कार्तिक मास शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि को भैया दूज होता है, इसी दिन चित्रगुप्त जी का पूजन भी होता है, भाई यम और बहन यम
आईना - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 8 अक्टूबर, 2021
"बेटा सुनील, मैंने पूरे जीवन की कमाई नेहा की पढ़ाई में लगा दी, मेरे पास दहेज में देने के लिए कुछ भी नहीं है।" शिवनाराय
हृदय परिवर्तन - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 26 अक्टूबर, 2021
"अच्छा माँ, मैं चलता हूँ ऑफ़िस आफिस को लेट हो रहा है। शाम को थोड़ा लेट आऊँगा आप और पापा टाइम से डिनर कर लेना।" अंकित ने
मुझको हक़ दें दो - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 30 अक्टूबर, 2021
अपने दिल का हाल सुनाऊँ, मुझे अपना ऐसा पल दे दो। बिन हिचक कहें अपनी बातें। ऐसा तुम मुझको हक़ दें दो।। रहें संग जब हम द
छठ पूजा - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 10 नवम्बर, 2021
आया छठ पूजा का महापर्व, सूर्यदेव की करें उपासना, सुबह और शाम, सूर्य देव की, करें अर्घ्य देकर अर्चना। सूर्य देव की बह
दीया और बाती - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 7 नवम्बर, 2021
मिट्टी का दीया, और रुई की बाती, युगों-युगों से दोनों, एक दूसरे के साथी। कहते हैं जलता दीया, पर जलती है बाती, दीया बनता
सुई-धागा - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 14 अक्टूबर, 2021
सुई तो होती छैल-छबीली, धागा सीधा-साधा, सुई करती रहती छेद, धागा सिलता जाता। सुई-धागे की प्रेम कहानी, बहुतों ने न जानी,
गुनगुनी धूप - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 1 नवम्बर, 2020
गुनगुनी धूप अब मन को भाने लगी, फिर से पीहर में गोरी लजाने लगी। 2 अब सुहानी लगे सर्द की दुपहरी, मौसमी मयकशी है ये जादू
आशादीप - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 10 जनवरी, 2020
आओ आशा दीप जलाएँ अंधकार का नाम मिटाएँ। 2 रूह जलाकर ज़िंदा रहना, जीवन की तो रीत नहीं। अंतिम हद तक आस न खोना, मानव मन की
परी लगे भैया को बहना - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 3 जुलाई, 2021
इस दुनिया में है सबसे प्यारा, भाई बहन का रिश्ता। परी लगे भैया को बहना, भैया लगे फ़रिश्ता। 2 इसमें न कोई ख़ुदग़र्ज़ी है,
छठ पूजा - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 10 नवम्बर, 2021
सूर्योपासना का अत्यानुपम त्योहार, वैदिक आर्य संस्कृति का है उपहार। मनाते पर्व धूमधाम से नर और नारी, राज्य उत्तर प
खोया बचपन - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 11 नवम्बर, 2021
आ लौट चलें बचपन की ओर, जहाँ नहीं था ख़ुशियों का छोर। दिन-रात खेलकूद की ख़ुमारी, पढ़ाई कम और मस्ती पर जोर। वह ग्रीष्मा
चाँद दूधिया - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 31 मार्च, 2019
बेचैन है चाँद दूधिया! निशानी दिया रूमाल की! यादें अधरों की गाल की! देहरी पर ख़्वाब मूंगिया! छूट गयी ऊँटी की शाम!
मैं पिता जो ठहरा - विजय कृष्ण
  सृजन तिथि : 11 जुलाई, 2018
मैं पिता जो ठहरा- प्यार जता नहीं पाया। बच्चे माँ से फ़रियाद किया करते थे, पापा को घूमने के लिए मना लो, ये मनुहार किया
ख़ाकी - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 10 नवम्बर, 2021
हमें सुलाते जाग-जाग कर, जिनसे है आबाद वतन। जिनका धर्म त्याग सेवा है, उस ख़ाकी को कोटि नमन। शूरवीर ये सच्चे योद्धा,
बाल दिवस - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 13 नवम्बर, 2021
बाल दिवस मनाते हैं इस दिन, 14 नवंबर का दिन है आज, आज के दिन बच्चों में होता, एक अलग ही अंदाज़। स्कूलों में होते खेल-कूद, ब
मासूमों की मुस्कान - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 2 जनवरी, 2019
कितनी निर्मल कितनी मोहक, है इन मासूमों की मुस्कान। गंगा की निर्मल धारा सी, है इन नादानों की पहचान। इनके बीच पहुँ
लाल दुलारे - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 5 जुलाई, 2020
वो मेरे नयनों के तारे, जो मेरे दो लाल दुलारे। वो ग़ुरूर हैं अपनी माँ के, पापा के वो राज दुलारे। एक अगर है सूरज जैसा, द
खेले दिनमान - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 28 मार्च, 2019
भोर हुई प्राची की गोद में खेले दिनमान! दिन उदय होते ही अँधेरा दूर हुआ! रात में नीड़ों में आराम भरपूर हुआ! दिन चढ
आग हुआ मौसम - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 3 मई, 2019
भट्टी की धधक रही आग हुआ मौसम! हवाएँ हैं, लपट है, लू है! गर्म तवे सी तपती भू है! ॠतुओं के दामन पे दाग हुआ मौसम! प्या
पोखर ठोंके दावा - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 25 अप्रैल, 2019
पड़ता है अब लू लपटों का जमकर चाँटा! सूरज ज्वालामुखी है किरने लावा! पोखर ठोंके कोर्ट में जल का दावा! ताल हुए डबरे
दुःखों का क़ाफ़िला - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 27 अप्रैल, 2019
चल रहा है दुःखों का क़ाफ़िला! ख़ुशियाँ हैं पानी का बताशा! अपिरिचित शहर में क्या शनासा! राजधानी खोने लगी जिला! चा
तुलसी विवाह - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 15 नवम्बर, 2021
एक रूप लिया वृंदा का, दूसरे रूप में बनी नदी पदमा, वृंदा ने सहे कष्ट अतिरेक, संसार का उद्धार करने उतरी पदमा। पाकर श्र
अपराधी है तो थाना है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 23 जुलाई, 2020
अपराधी है तो थाना है, कैसा खूँखार ज़माना है। हमको अनजाना शहर मिला, औ सारी रात बिताना है। हासिल करने की ख़्वाहिश में,
समय का सच - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 4 अक्टूबर, 2021
समय तो समय है, समय को कहाँ कोई रोक पाता है। समय, देखते ही देखते, समय पर आगे बढ़ जाता है।। दुनिया का हो कोई राजा या रंक,
गौमाता - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 11 नवम्बर, 2021
आज गोपाष्टमी है, आज हम गौमाता की पूजा, सेवा करते हैं, शायद औपचारिकता निभाते हैं। क्योंकि हम गायों को माँ मानते हैं
लक्ष्मीबाई - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 11 नवम्बर, 2021
मणिकर्णिका बन लक्ष्मिबाई, पग धरणि पर धर दिया। मानो स्वयं ही दुर्गमा ने, जन्म धरती पर लिया। सुघड़ता में लक्ष्मि जै
गुरु नानक जी - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 19 नवम्बर, 2021
कार्तिक मास में संवत पन्द्रह सौ छब्बीस को माँ तृप्ता के गर्भ से कालू मेहता के आँगन तलवंडी, पंजाब (पाकिस्तान) में
बेटी - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 13 नवम्बर, 2020
बेटी है जगसार सुनो, बेटी से संसार सुनो, बेटी ना हो जिस घर में, वो सूना है घर द्वार सुनो। अफ़सोस मुझे क्यों बेटी को, बेट
डेंगू और मैं - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 31 अक्टूबर, 2021
डॉक्टर साहब ने बताया कि हमें हो गया डेंगू, हमने हँसते हुए डेंगू को दिखा दिया ठेंगू। डेंगू बोला कि मुझे हराएगा, बंदर
गंगा मइया - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 10 नवम्बर, 2020
अमृत है तेरा निर्मल जल हे! पावन गंगा मइया। हम सब तेरे बालक हैं तुम हमरी गंगा मइया। माँ सब के पाप मिटा दो हे! पापनाशि
राधे बिन गोविन्द कहँ - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 4 मई, 2021
यदुनंदन ऋषिकेश प्रभु, बसे यमुन के तीर। राधा दौड़़ी गल मिली, भरी आँख में नीर।। भव्य मनोहर रूपसी, नीर भरी लखि नैन। कम
भज रे मन बस प्रभु चरण - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 4 मई, 2020
भजो रे मन बस प्रभु चरण, तज तन धन संसार को। पलभर का जीवन दुर्लभ यह, जग अर्पण कर परमार्थ को। भजो रे मन श्रीराम शरण नित,
चूड़ियाँ - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 6 मई, 2020
माँ बहनें वधू तनया, खनकती हाथ चूड़ी से, प्रिया हँसती लजाती सी सजन मनहार चूड़ी से। लगा बिंदी सजी मेंहदी पहन चूड़ी चहकती
मेरे हमराज़ हो तुम - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 12 नवम्बर, 2021
हमसफ़र हमनसीं हमदम मेरे हमराज़ हो तुम मेरी साँसों में बसी मेरी ही आवाज़ हो तुम। तेरे ही दम से है बहार मेरी ज़िंदगी म
फ़ोटो - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 8 सितम्बर, 2021
हाथ लग गई बचपन की फ़ोटो, मिले कई लम्हें हँसते हुए। याद आ गए पुराने दोस्त, एक दूजे से गले मिलते हुए। याद आया गुज़रा वह
लॉक लगा के रखना - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 18 नवम्बर, 2021
चलो अब हम चलते है, ख़्याल अपना रख लेना। किए मुझसे वादे पूरे कर, मेरे यादों को बिसरा देना।। मेरे दिल के प्रेम उमंग तु
आहत - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 20 नवम्बर, 2021
कितना आसान है किसी को आहत करना, जले पर नमक छिड़कना। पर ज़रा सोचिए कोई आपको यूँ आहत करेगा तब कैसा लगेगा? मगर हम सब आदत
कौमी एकता - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 18 नवम्बर, 2021
आपस मे अब युद्ध न करना, ऐ! भारत माता के लालों। बैरी देश हँसेंगे तुम पर, वो सोचेंगे लाभ उठा लो। आपस के मतभेद मिटा दो, म
संत कबीर - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 24 जून, 2021
संत कबीर के समाजवाद में ऊँचा ना कोई नीचा था, संत कबीर ने आजीवन वृक्ष समानता का सींचा था। ढोंग-पाखंड को कबीर ने आजीव
संविधान - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 14 अगस्त, 2021
भीमराव आम्बेडकर की रचना हूँ मैं, कहने को राष्ट्र का सम्मान हूँ मैं। कहने को समानता का पोषक हूँ मैं, कहने को आवाज़ की
मंगलमय सब काम - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 5 मई, 2020
रोम-रोम तनु राममय, भक्त राम हनुमान। भोर भयो सुमिरन करूँ, मंगलमय सब काम।। रोग शोक परिताप सब, मिटे सकल संसार। आंजनेय
आओ जोड़ें दिल तार सखी - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 6 मई, 2020
दुर्गम दुखदाई राह बहुत, अतिजोरों से है हवा चली, घनघोर घटा छाई अम्बर, विकराल जलद सौन्दर्य घड़ी। है कठिन मार्ग विस्
फागुन - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 28 मार्च, 2019
फूल, पत्तियाँ, फुनगियाँ, मधुॠतु में मदहोश। पवन झकोरे सुरभि को, लेते हैं आगोश।। फागुन होली से मिले, दे मीठा अहसास। स
असंतोष पैदा हुआ - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 10 मार्च, 2021
असंतोष पैदा हुआ, अस्थिर होगा देश। राजनीति के नाम से, आता है आवेश।।
चरखा अब चलता नहीं - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 26 जनवरी, 2021
चरखा अब चलता नहीं, खादी होती लुप्त। फ़ैशन ऐसा चल रहा, अंग दिख रहे गुप्त।।
ठंडी का फैलाव - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 18 जनवरी, 2021
मैंने देखा हर जगह, ठंडी का फैलाव। ठिठुर रही इस देह का, साथी बना अलाव।।
बात सुलह की क्या करें - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 14 जनवरी, 2020
बात सुलह की क्या करें, खाए बैठे खार। दंदी-फंदी तत्व से, होता बंटाधार।।
नारी वेदना संवेदना - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 28 फ़रवरी, 2018
माँ का दूध नौ माह, मनुआ तुझ पर उधार, एक दिवस में क्यूँ बंधे नारी जीवन उपकार। बड़ा सुंदर बड़ा अनूठा, भारत नारी आधार, सब
ख़ामोशी - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 27 मई, 2021
आज आप सुबह से बहुत चुपचाप हैं। क्या बात है? तबियत तो ठीक है न? रमा ने अपने पति राज से पूछा। राज बोले- नहीं लखन की माँ। ब
ख़ुद को ही सर्वश्रेष्ठ न समझें - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 13 अक्टूबर, 2021
श्रेष्ठ या सर्वश्रेष्ठ होना हमारे आपके जबरन ख़ुद को घोषित करने की ज़िद कर लेने भर से नहीं हो जाता। परंतु ख़ुद को श्रेष
पर्वों का संदेश - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 12 नवम्बर, 2021
छठ पर्व के साथ ही त्योहारों की शृंखला करवा चौथ, धनतेरस, दीवाली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, चित्रगुप्त पूजन, लक्ष्मी पूज
संविधान दिवस - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 26 नवम्बर, 2021
आइए! मौका भी है दस्तूर भी है हमारे मन भरा फ़ितूर जो है, आज भी हम संविधान संविधान खेलते हैं, जब रोज़ ही हम पूरी ईमानदार
शब्दों का खेल - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 18 नवम्बर, 2021
शब्दों के खेल बड़े अद्भुत, इनके जज़्बे बड़े निराले, कभी बहाते दुःख के सैलाब, कभी छलकाते सुख के प्याले। कभी मन कड़वे हो ज
वापस आ जाना - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 22 अक्टूबर, 2021
मेरे बिन जब रहा न जाएँ, जुदाई मुझसे सहा न जाएँ। भूल हमारी तू-तू, मैं-मैं, एक आवाज़ लगाके जाना।। दिल में लिए मिलन की चा
डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 3 दिसम्बर, 2021
जीरादेई सीवान बिहार में तीन दिसंबर अठारह सौ चौरासी में जन्मा था एक लाल, दुनिया में चमका नाम उसका, थे वो बाबू राजें
झंडा दिवस - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 7 दिसम्बर, 2021
आज सशस्त्र सेना झंडा दिवस है सात दिसंबर उन्नीस सौ उनचास को ये मनाया गया था पहली बार तब से सशस्त्र सेना झंडा दिवस द
रघुवीर सहाय - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 9 दिसम्बर, 2021
नौ दिसंबर उन्नीस सौ उनतीस लखनऊ में जन्में थे रघुवीर सहाय, उन्नीस सौ इक्यावन में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी
जनरल बिपिन रावत को श्रद्धांजलि - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 8 दिसम्बर, 2021
तीनों सेनाओं की संभाली थी कमान, नाम था उनका विपिन रावत, खो दिया राष्ट्र ने एक महान सपूत, एक युग का मानों हो गया अंत। द
व्यथा - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 12 नवम्बर, 2015
रसोई घर मे चल रहा, दाल-प्याज संवाद, प्याज ने पूछा कहो दाल बहन! क्या हाल? सुना है कि तुम वी॰वी॰आई॰ई॰ हो गई हो, आम आदमी क
अग्निपथ - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 3 दिसम्बर, 2021
ज़िंदगी एक अग्निपथ है, मन की स्वयं से शपथ है। उस पार हिमगिरि शृंखला, बीच अनल जीवन रथ है। तरकश में अकाट्य तीर हों, रक
मैं धरा हूँ - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 30 नवम्बर, 2021
बाहों में सृष्टि घिरी सरित सिंधु व गिरि शेषनाग शीर्ष धरी मैं धरा हूँ। सौरमंडल का ग्रह वारि भू मय विग्रह द्वय ध्
जनरल बिपिन रावत को श्रद्धांजलि - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 9 दिसम्बर, 2021
नमन करता देश तुमको गर्व तुम पर देश को है, नम हैं आँखें भले हमारी विश्वास है कि तुम ज़िंदा हो। देश का कण-कण याद कर रहा
हरिवंश राय बच्चन जी - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 27 नवम्बर, 2021
सत्ताइस नवंबर उन्नीस सौ सात को कायस्थ कुल में पैदा पिता प्रताप नारायण के घर मां सरस्वती देवी की कोख से प्रतापगढ़, उ
भारतीय संविधान - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 5 अक्टूबर, 2015
संघात्मक संविधान हमारा एकात्मक से मेल, संघ, राज्य और समवर्ती सूची में क़ानूनी खेल। भारतीय संविधान सर्वोच्च क़ानून
घुटन हो रही देश को - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 13 जनवरी, 2021
घुटन हो रही देश को, दाम बनाए काम। दाँतों में उँगली दबा, बैठा हुआ अवाम।।
कालेधन की बात - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 20 अगस्त, 2020
वर्तमान है कर रहा, कालेधन की बात। ऐसे धन ने बेच दी, दुल्हन जैसी प्रात।।
मानवता के बीज - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 20 अगस्त, 2020
साहचर्य की भावना, आज हुई नाचीज़। बंजर धरती पर पड़े, मानवता के बीज।।
पानी जैसा रक्त - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 19 अगस्त, 2020
अब हमको चुभने लगा, नागफनी सा वक्त। लगे बहाने लोग हैं, पानी जैसा रक्त।।
रिश्ते अब लगने लगे, कड़वी-कड़वी नीम - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 18 अगस्त, 2020
रिश्ते अब लगने लगे, कड़वी-कड़वी नीम। एक समय में भरा था, इनमें प्यार असीम।।
दफ़्तर में होने लगे, बस तिकड़म के खेल - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 14 अगस्त, 2020
दफ़्तर में होने लगे, बस तिकड़म के खेल। अफ़सर ऐसा लग रहा, हो जैसे राफेल।।
बुद्ध पूर्णिमा - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 7 मई, 2020
था मन अशान्ति तज गेह को, निकल पड़ा सिद्धार्थ। बोधवृक्ष नीचे मिला, सत्य शान्ति परमार्थ।। दया धर्म करुणा हृदय, सदाचा
अनाघ्रात मधु यामिनी - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 8 मई, 2020
मुस्काती सुन्दर अधर, शर्मीली सी नैन। दंत पंक्ति तारक समा, मुग्धा हरती चैन।। मादकता हर भाव में, कर्णफूल अभिराम। सज
पंचतत्व - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 6 दिसम्बर, 2021
पंच तत्वों से निर्मित मानव शरीर, नभ, वायु, अग्नि, धरा तथा नीर। आत्मा ने जब तन में किया प्रवेश, जड़ चेतन हुआ मिला प्रा
ग़म उसका नहीं था - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : मार्च, 2020
सुबह नींद देर से खुली ग़म उसका नहीं था रात को देर से सोया ग़म उसका भी नहीं था। वह कल मिला था अपने बरामदे मे चारपाई पे ब
न जाने क्यूँ - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 5 दिसम्बर, 2021
न जाने क्यूँ लोग मुझे नहीं समझते, मेरे अल्फ़ाज़ों को नहीं पढ़ते। मेरे तजुर्बे को उँगली दिखाते उम्र का बहाना करके,
शीशम-सागौन - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 24 अप्रैल, 2019
घर-घर पहचाने है शीशम-सागौन! महिमा है इनकी भी कुछ कम नही! इमारती लकड़ी है बेदम नही! भोर उठी कर रही नीम का दातौन! हो
आपदाओं का नाग - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 21 अप्रैल, 2019
जन-जीवन को लील गया आपदाओं का नाग! अतिवृष्टि, बाढ़ चक्रवात! पिघल रही मोमी रात! क्लेश के साबुन से निकला संतापों का
पाप पुण्य में हाथापाई - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 15 अप्रैल, 2019
पाप पुण्य में हाथापाई गुत्थम-गुत्था! खयानत औ गिरहकटी थाने की थाती! सोहबत में फ़रेब के नेकी फँस जाती! कोर्ट-कचहरी
महँगा न्याय - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 14 अप्रैल, 2019
बर्तन, भाड़े, घर गिरवी, कोर्ट खींचता खाल! मिलें प्रकरण पर तारीख़ें! घनचक्कर यहीं से सीखें! मुक़दमेबाजी हुई है अब ज
लू लपट की शर शैया - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 12 अप्रैल, 2019
हम अँगूठा छाप हैं वे हैं बिल्कुल ठेठ! देशी भाषा में सम्मोहन! होता है इसका ही दोहन! पानी फिरा उम्मीद पर करे मटिय
मातृभाषा हिन्दी - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 23 नवम्बर, 2021
आओ संकल्प करें! मन से, हिन्दी का उत्थान करेंगे। पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण, हिन्दी के रंग में रंग देगें।। सकल विश्व
तुम करो राम से प्यार - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 5 अगस्त, 2020
तुम करो राम से प्यार अमरत बरसेगा। तेरा हो जाए कल्यान अमरत बरसेगा। सूर्यकुल दशरथ के नंदन, माता कौशल्या अभिनंद
समानता का अधिकार - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 29 नवम्बर, 2021
सुनने कहने में कितना मीठा, प्यारा लगता है "समानता का अधिकार"। पर जरा धरातल पर आकर देखिए। हर क्षेत्र में सिर्फ़ विडंब
लम्हे बुलाते हैं - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 3 दिसम्बर, 2021
बीते हुए लम्हे आख़िर याद आ ही जाते हैं, सिर्फ़ याद ही नहीं आते ख़ूब गुदगुदाते भी हैं, कभी ख़ुशी से तो कभी ग़म से आँखें नम
वो दरख़्त - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 5 अक्टूबर, 2021
कोई नहीं पूछता उसे क्योंकि वो आज ठूँठ हो गया सदाबहार मौसम के समक्ष वो लाचार बेचारा हो गया भूल गए लोग, कभी वो भी पत्
प्रलोभन - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 12 अक्टूबर, 2021
बाहरी आकर्षण जिसे हिला नहीं सकते, बाहरी आडम्बर जिसे डिगा नहीं सकते, कर्त्तव्य पथ पर चलते सदा, बाहरी दबाव जिसे झुका
मानसिकता - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 4 दिसम्बर, 2021
पद्मा इन दिनों बहुत परेशान थी। पढ़ाई के साथ साथ साहित्य में अपना अलग मुक़ाम बनाने का सपना रंग ला रहा था। स्थानीय से ले
सहनशीलता - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2 दिसम्बर, 2021
कैसा जमाना आ गया है ज्यों ज्यों शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं, हमारी सहनशीलता दम तोड़ रही है हमा
विजय दिवस - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 15 दिसम्बर, 2021
शुरू हुआ जो युद्ध तीन दिसंबर उन्नीस सौ इकहत्तर को भारत पाकिस्तान के बीच में छुडा़ रहे थे सैनिक भारत के छक्के पाकि
विजय दिवस - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 16 दिसम्बर, 2021
पढ़ता हूँ सन 1971 के वीरों की गाथा, गर्व से सीना फूल सा जाता है, रहने वाला हूँ इस वीर भूमि का, इस बात पर गर्व से मस्तक उठता
पेश-ए-नज़र मेरे था दीशब एक वो रू-ए-रौशन - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 4 नवम्बर, 2021
पेश-ए-नज़र मेरे था दीशब एक वो रू-ए-रौशन, गोया मह-ओ-अंजुम था उनके रू-सफ़ेदी से रौशन।
विजय दिवस - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 16 दिसम्बर, 2021
अरुणाभ शौर्य बलिदान वीर, वतन विजय गीत मैं गाता हूँ। जो भारत सीमा निशिवासर, कर नमन हृदय मददाता हूँ। कोख भारती पुल
आख़िर हम कब सुधरेंगे? - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 19 जनवरी, 2018
आख़िर हम कब सुधरेंगे? सच्चाई को कब समझेंगे? दूर-दूर तक नही है राहें, कब हम दो से एक बनेंगे? आख़िर हम कब सुधरेंगे? दर्पण
नव वर्ष - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 15 दिसम्बर, 2021
अभ्युदित हो रहा प्राची से, अंशुमाली लेकर नूतन विहान। नव वर्ष की पुनीत बेला में, अदृश्य शत्रुओं से हो परित्राण। व
उलझी ज़िन्दगी - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 20 जून, 2021
ज़माने से चाहा था मैं ख़ूब आराम करूँ, बेफ़िक्र हो जैसे चाहूँ समय बर्बाद करूँ। पर हुआ कि होश सम्भालते स्कूल पहूँचा, ह
श्रद्धांजलि: बिपिन रावत - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 9 दिसम्बर, 2021
सिसक रही माँ भारती, साश्रु वतन संतान। खोकर विपिन सपूत को, अमर शौर्य बलिदान।। आज पार्थ अवसान सुन, शोकाकुल जन देश। श
उसकी हो सरकार - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 19 नवम्बर, 2021
गाँव इकाई देश की, इकाई गाँंव की घर-परिवार। हर घर-परिवार का ख़्याल रखे जो, बस उसकी हो सरकार।। हमें न प्यार न द्वेष किस
आर्यावर्त और हिंदी - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 18 सितम्बर, 2020
बहुभाषी है आर्यावर्त, हिन्दी भाषा सिरमौर। देवनागरी लिपिबद्ध, संस्कृत व्याकरण ठौर। उन्नत व्यापक सम्पूर्ण है, मात
एहसास - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 11 दिसम्बर, 2021
मन की बंजर भूमि में दफ़न, मेरे एहसासों का चमन। अश्कों की बारिश बेअसर, शब भर भीगता रहा दामन। ख़ामोशी ने चादर तानी, क
याद करें हम बहादुरों की क़ुर्बानियाँ - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 17 दिसम्बर, 2021
इतना तो करना देश के सेनानियों पर अहसान, उनसे ही आन बान शान जो छोड़ गए पहचान। एक दीपक जला देना सभी क़ुर्बानियों के नाम
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 21 दिसम्बर, 2021
हे! हिंदी के युग निर्माता, बारम्बार प्रणाम तुम्हें। हम सबको है गर्व आप पर, बारम्बार प्रणाम तुम्हें। हिंदी भाषा क
तिरंगा - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
तिरंगा है हमारी जान, कहलाता देश की शान। तीन रंगों से बना तिरंगा, बढ़ता हम सब की मान।। केसरिया रंग साहस देता, श्वेत
ख़ुद से ना दूर करो - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 23 नवम्बर, 2021
रूठना हक़ तुम्हारा, मानना फ़र्ज़ हमारा। माफ़ कर दो अबकी, बिन तुम्हारे मैं हारा।। तुम जितनी रुठोगी, हम उतना मनाएँगे।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 21 दिसम्बर, 2021
दौलतपुर ग्राम रायबरेली जनपद मे पाँच मई अठारह सौ चौसठ में पंडित रामसहाय द्विवेदी के पुत्र रुप में महाबीर प्रसाद द
जीवन भी गणित - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 22 दिसम्बर, 2021
हम और हमारे जीवन का हर पल किसी गणित से कम नहीं है, जीवन में जोड़ घटाव भी यहाँ कम कहाँ है, गुणा भाग का खेल तो चलता ही रह
श्री राम नाम में बहुत जान - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : जून, 2020
श्री राम के नाम में बहुत जान, कोई लेता सुबह तो कोई शाम। नही था इनको कोई अभिमान, मर्यादा पुरुषोत्तम यह श्री राम।। ठ
जनरल बिपिन रावत: इतिहास याद रखेगा - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 10 दिसम्बर, 2021
इतिहास याद रखेगा आज, हुआ हेलिकॉप्टर क्रेश, कीर्ति पताका लहराता रहेगा, आपका देश-विदेश। यह कर्तव्यों की वेदी पहनकर,
वैदिक शास्त्रों का सार - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 14 अगस्त, 2021
वैदिक शास्त्रों में सार समाहित पढ़ता देश सारा, १८ अध्याय एवं ७०० श्लोक से ग्रन्थ बना प्यारा। हर समस्याओं का उत्तर
किताबें - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 5 अप्रैल, 2019
इन किताबों की शख़्सियत, तो देख लो जनाब। बस ख़ामोशियाँ वजूद में, पर ज़ेहन में है इंक़लाब। ना बोलकर भी बोल देतीं, हर सवा
शिकायत और रिश्ते - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 16 नवम्बर, 2021
रिश्तों की गाँठे बंद पड़ी थी, यादों के संन्दुक में, खोला तो शिकायतों का पुलिंदा, आ गया हाथ में? कौन-कौन सी गाँठ खोलूँ,
मेहंदी सात वचनों की - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 21 नवम्बर, 2021
लाल-लाल मेहंदी से रच गई प्रियतमा की हथेलियाँ, लगाई जब पिया के नाम की मेहंदी, क़िस्मत ने ली अठखेलियाँ, रंग गयी पिया के
ऑमिक्रोन वैरिएंट से रखना दूरी - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 22 दिसम्बर, 2021
भैया मास्क बहुत ज़रूरी ऑमिक्रोन से रखना दूरी, वैक्सीनेशन करवाएँ अपना ये सबके लिए ज़रूरी। घर-परिवार और मित्रों को इस
पिटीशन लगती है पिशाचिका - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 11 अप्रैल, 2019
निराधार तथ्यों से लबरेज याचिका! मढ़ते आरोप होती संघाते हैं! मिर्च मसाला सी भरी हुई बातें हैं! वकील हुए ऐसे जैसे
बाज़ार मदारी है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 11 अप्रैल, 2019
ग्राहक बना जमूरा है बाज़ार मदारी है! इच्छाएँ टँगी हुईं शो केस मे! अब रावण फिरें साधू के भेष मे! हर महीने सिर पर चढ़
सांता क्लॉज़ आया गिफ़्ट लेकर - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 21 दिसम्बर, 2021
सर्दी की ऐसी इन ठंडी-ठंडी रातों में, गुनगुनाता और गीत गाता ही आता। हैप्पी मेरी क्रिसमस, हैप्पी क्रिसमस, कहता हुआ ढे
अटल - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 25 दिसम्बर, 2021
अटल थे तुम, अटल हो तुम, अटल ही तुम नित रहोगे। यह सरल, वो राह मुश्किल, कविता तहत हमसे कहोगे।। ज़िंदा नहीं जग में भले त
हे नारी! तू कितनी महान - अनिल भूषण मिश्र
  सृजन तिथि : 2018
हे नारी! तू कितनी महान, नहीं जग में कोई तेरे समान। धर्म, दया, लज्जा का पालन करती, सबके तन-मन का दुःख हरती, सदा प्रेम का
दीवाली आई - अनिल भूषण मिश्र
  सृजन तिथि : 2020
दीवाली आई दीवाली आई, ख़ुशियों की सौग़ात है आई। घर बाहर हुई ख़ूब सफ़ाई, दीवारों पर फिर से रंगत आई। दीवाली आई दीवाली आई।।
दो बूँद आँसुओं के - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 9 मई, 2020
न दो बूँद आँसुओं के निकले, हैं कवलित हम अवसादन के, हैं मज़दूर बने मजबूरी बस, जल कटे मरे हो जाएँ चिथड़े। है दिशा दशा अव
नारी का सम्मान - मोनी रानी
  सृजन तिथि : 2021
सौंदर्य से मत आँकिए, आँकिए उन्हें ज्ञान से। वह दान की कोई वस्तु नहीं। बेटी है, वो आपकी कहिए सबसे शान से। मौका उन्ह
जगत जननी अम्बे माँ - मोनी रानी
  सृजन तिथि : 14 जनवरी, 2021
ऐ माँ सुन ले आज मेरी गाथा तू। इतना भी बुरा दिन ना दिखाना, जिसे मैं सह ना सकूँ। इतनी बुद्धि दे हमें, जो अपने सारे ग़मों
बेपरवाह शराबी - रंजीता क्षत्री
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2021
शराबी का क्या काम? गाली-गलौज और अपनों का जीना करे हराम। शराबी की हालत कैसी? बिल्कुल नासमझ... पागल जैसी। शराबी के पीठ
मंथरा - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 4 दिसम्बर, 2021
आज ही नहीं आदि से हम भले ही मंथरा को दोषी ठहराते, पापी मानते हैं पर जरा सोचिए कि यदि मंथरा ने ये पाप न किया होता तो क
विजयादशमी और दशानन - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 8 अक्टूबर, 2019
जल गया रावण भूतल पर, जीवंत रहा ह्रदय के भीतर। झाडू-बुखारी हर घर-आँगन, कूड़ा-करकट हर सड़क पर।। जल रहा दशानन गाँव-शहर, ज
जीवनदायिनी - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 16 दिसम्बर, 2021 (रात्रि 10:30 से 11:30 तक)
सबसे सुंदर सबसे प्यारा, प्रीत मीत संसार। घर-घर में होती है नारी, निश्छल पालनहार।। सुबह सबेरे नित्य जागकर, करती झा
अरुणिम उषा है खिली-खिली - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 28 नवम्बर, 2021
पंखुड़ियों में सिमटी कलियाँ, अरुणिमा उषा है खिली-खिली। मुस्कान सुरभि यौवनागमन, मधुपर्क मधुर नव प्रीति मिली। श्
माँ - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 10 मई, 2020
जन्मा जिसने कोख से, करा पयोधर पान। ममताँचल में पालकर, साश्रु नैन मुस्कान।। चारु चन्द्रिका शीतला, करुणा पारावार।
कुशल राजनीतिज्ञ थे वाजपेयी - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 23 दिसम्बर, 2021
अपनें आदर्शों से बनाई जिन्होंने ख़ास पहचान, ऐसे कुशल राजनीतिज्ञ‌ थे वे प्रधानमंत्री महान। अटल जिनके इरादें एवं अ
तुम बिन कौन उबारे - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 5 अगस्त, 2019
हे कान्हा हे मोहन मेरे, तुम बिन कौन उबारे। मेरे मोहन मेरे कृष्णा तुम ही एक सहारे। 2 इस धरती पर आकर कान्हा तुम भी तो र
इंसान नहीं हम पंछी हैं - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 2 जनवरी, 2020
इंसान नहीं हम पंछी हैं, हम ताल-मेल कर लेते हैं। 2 है कौन सिखाता ज्ञान हमें, पर मेल-जोल कर लेते हैं। 2 मिलजुल कर हम सब र
मेरी हृदय कामना - अनिल भूषण मिश्र
  सृजन तिथि : 19 अक्टूबर, 2019
हे विशाल उदार हृदय महामना, हो चहुँमुखी विकास आपका। ये है मेरी हृदय कामना। ये है मेरी हृदय भावना। थे मेरे कर्म कही
ओ सनम - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 11 जुलाई, 2021
ओ सनम ओ सनम ओ सनम ओ सनम, तू ही दिल मे समाया सनम ओ सनम। तुझमे पाया ख़ुदाया सनम ओ सनम, आज जी भर जिया हूँ मैं सौ-सौ जनम। ओ सन
इनका अस्तित्व कहाँ से आया - अनिल भूषण मिश्र
  सृजन तिथि : 7 अप्रैल, 2020
ये हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाया, इनका अस्तित्व कहाँ से आया, सोचो इन सबको कौन बनाया, किसने तुमको इन सब में भरमाया। उस
पत्ते भारी लग रहे - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 3 अप्रैल, 2019
आड़ा है वक्त वृक्ष को पत्ते भारी लग रहे! पंछी का कलरव दहशत ने लील लिया! ॠतुओं का चक्र हुआ प्रदूषण ने कील लिया! भा
चाँद-तारे दे रहे बधाईयाँ - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2020
नव वर्ष में चाँद-तारे दे रहे बधाईयाँ। प्रात कपासी हुई तो दिन सुनहरे हों। घर-आँगन में ख़ुशी के ही ककहरे हों।। बात
मानवता का पतन - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 18 सितम्बर, 2021
शर्मसार हुई माँ वसुंधरा पाप पुण्य से आगे बढ़ा, क्षत-विक्षत हुआ कलेजा आँचल होने लगा मैला। कामी लोभी क्रोधी घमंडी
हे स्त्री! तुम शक्ति की प्रतिमूर्ति - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 2 अक्टूबर, 2021
तुम अष्टभुजा तुम सरस्वती, तुम कालरात्रि तुम भगवती, हे स्त्री! तुम शक्ति की प्रतिमूर्ति। ज्ञान का भंडार खोलती, शं
मंज़िल पुकार रही है - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 5 अक्टूबर, 2021
बना दो क़दम के निशान, कि मंज़िल पुकार रही है। थाम लो हाथों में हाथ, कि वक़्त की पुकार यही है। बनकर मुसाफ़िर चलते जाना, म
मुक्ति संघर्ष - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 20 अक्टूबर, 2021
पिंजड़े में क़ैद पंछी, करुण चीत्कार कर रहा। ऊपर गगन विशाल है, वह बंद पिंजड़े में रह रहा। टीस है उसके दिल में, तिल-ति
अयोध्या की दीवाली - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 28 अक्टूबर, 2021
चौदह वर्षों बाद हो रहा आगमन, राम लक्ष्मण संग जानकी का होगा अभिनंदन। सज रही अनुपम अयोध्या नगरी, जैसे सजती कोई अप्
कवन सुगवा मार देलस ठोरवा - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : नवम्बर, 2021
कवन सुगवा मार देलस ठोरवा, ए रामा गजब भइले ना। कि आहो रामा सुगवा जुठार देलस केरवा, ए रामा गजब भइले ना। कतना जतनवा से
मेरे पापा मेरे सांता क्लॉज़ - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 22 दिसम्बर, 2021
क्रिसमस ईव है फिर से आई, ख़ुशियों की सौगात है लाई। नन्हे बच्चे चहक रहे हैं, सबके दिलों में है ख़ुमारी छाई। कोई चाहे प
नव वर्ष का अभिनंदन - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 24 दिसम्बर, 2021
हर्षोल्लास से सराबोर हुआ भारतवर्ष का कण-कण, शुभ मंगलमय नव वर्ष का अभिनंदन! अभिनंदन! गीत-संगीत से गूँजे उठा सुरम्य
नव वर्ष - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 29 दिसम्बर, 2021
तुम कहते हो! नया साल? पर नए साल सी बात नहीं है। प्राकृति सौन्दर्य सुवासित से, ये धरा सुसज्जित नही हुई। न कुसुम कहीं
सन् 2022 - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 30 दिसम्बर, 2021
सन् 2022 का होगा आग़ाज़, होगा शुरू एक नया सफ़र, नई उड़ान का होगा अंदाज़, होगा नई आशाओं का मंज़र। बढ़ेंगे क़दम फिर मंज़िल की ओर, नवच
नव वर्ष अभिनंदन - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 19 दिसम्बर, 2021
ख़ुशियाँ लेकर आया अब प्यारा नूतन वर्ष, झूमो-नाचो, गाओ सभी मनाओ यारों हर्ष। अब बीत गया वह वर्ष बनाया जिसने नर्क, सुख क
अभिनंदन नव वर्ष तुम्हारा - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 6 नवम्बर, 2020
आओ नए वर्ष में यह संकल्प करे, बीती बातों को नज़रअंदाज़ करे। दिए जो ज़ख़्म हमें पुराने साल ने, मिलकर ख़ुशियों से उन्हें न
आग़ाज़-ए-नववर्ष - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 25 दिसम्बर, 2021
आओं मिलकर विदा करें यह कोरोना एवं साल, जिसने सबको बहुत रूलाया भूलेंगे ना हर हाल। निकल गया‌ ऐसा साल जो कोरोना से था भ
नव वर्ष दो हज़ार बाइस - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 31 दिसम्बर, 2021
दो हज़ार बाइस तुम आओ, जग में नूतन ख़ुशियाँ लाकर। परम पिता की सदा दुआ हो, जग की सुंदर बगिया पर। दो ख़ुशियों की शुभ सौग़ा
नया साल दे रहा अनुभूतियाँ नई-नई - अभिषेक अजनबी
  सृजन तिथि : 26 दिसम्बर, 2021
नया साल दे रहा अनुभूतियाँ नई-नई। आओ गढे़ं जग जीतने की नीतियाँ नई-नई। जो दबाए ख़्वाब उसे सरेआम कीजिए, मौन पड़े प्रेम
हैप्पी न्यू ईयर टू थाउजन ट्वेंटी - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 25 दिसम्बर, 2021
टू थाउजन ट्वेंटी टू, टू थाउजन ट्वेंटी टू। हैप्पी हैप्पी ईयर न्यू हैप्पी हैप्पी ईयर न्यू 2 बस ख़ुशबू ही ख़ुशबू बिखर
नव वर्ष: स्वागत और विदाई - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 25 दिसम्बर, 2021
आइए हँसी ख़ुशी विदा करें दो हज़ार इक्कीस, न ईर्ष्या द्वेष नफ़रत करें, न कोई शिकवा शिकायत करें, जो बीत गया उसे लौटा नहीं
नव वर्ष का स्वागत - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 31 दिसम्बर, 2021
आइए! नववर्ष के स्वागत की तनिक औपचारिकता निभाते हैं, बड़ी बेशर्मी से अंग्रेज़ी नव वर्ष बड़े उत्साह से मनाते हैं, भारती
अतीत की विदाई और स्वागत नव वर्ष - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 1 जनवरी, 2022
करें विदाई इक्कीस अतीत, जो कोरोना काल बना हो। स्वागत आगत नववर्ष लसित, सुखद प्रगति उल्लास नया हो। आओ नया साल मनाए
न जाने क्यों - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
न जाने क्या बात है सबको रवि रश्मियाँ भाती हैं प्रातः बेला की, न जाने मुझे क्यों भाती हैं चन्द्रमा की श्वेत किरणें,
क्यों लोग प्रेम के ही गीत लिखने लगे हैं - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 27 अक्टूबर, 2021
क्यों लोग प्रेम के ही गीत लिखने लगे हैं, आइने के सामने सजने सँवरने लगे हैं। क्यों नहीं दिखती उन्हें किसी की पीड़ा,
अकेला का बल - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 30 दिसम्बर, 2021
अकेला तू आया है अकेला ही तू जाएगा, ये कटुसत्य वचन न जाने कितनी बार। महापुरुषों ने अवतरित हो, हमें बार-बार समझाया है
सारे रास्ते सुनसान है - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 27 अप्रैल, 2020
सारे रास्ते सुनसान है, मंदिर भी वीरान है। क़ैद हो गई ज़िंदगी, हर इंसान परेशान है। ये कैसी बीमारी आई, ख़तरे मे सब की जान
जीवन एक व्यापार है - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 27 अप्रैल, 2020
जीवन एक व्यापार है, धैर्य इसका आधार है। लाभ-हानि होती रहती है, धैर्य ना खोए वो ही समझदार है। जीवन एक व्यापार है। सु
सावित्रीबाई फुले: पहली महिला शिक्षिका - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 3 जनवरी, 2022
भारत-भूमि पर किया जिसने ऐसा काम, माता सावित्री बाई फुले आपको प्रणाम। नारी सशक्तिकरण की तुम बनी मिशाल, गुरूओं में प
निशिभर नींद नहीं आई - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2 जनवरी, 2022
पूर्वी बयार था मतवाला, छाई तन में अँगड़ाई। याद सताती रही तुम्हारी, निशिभर नींद नहीं आई। देख मुझको आधी रात में, ना
अलविदा 2021 - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 31 दिसम्बर, 2021
अब तुम जा रहे हो न तनिक सकुचा रहे हो, लगता है बड़े बेशर्म हो गए हो। जाओ न हम भी कहाँ कम हैं तुम्हारे जाने से कुछ फ़र्क़ न
आँखों का तारा - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 21 दिसम्बर, 2021
पूस की कड़कड़ाती ठंडी काली स्याह रात में दूर एक बिंदु टिमटिमा रहा था। कुछ सूझ न रहा था। मैं अंदाज़े से रोशनी की ओर बढ
रचना विधना - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 24 नवम्बर, 2021
देख तिहारी प्यारी दुनियाँ, मन ही मन हर्षाऊँ मैं। मन बगिया की कली बनूँ, लहर-लहर लहराऊँ मैं। सौंधी माटी महक रही है, क
ऊँचाई - अटल बिहारी वाजपेयी
  सृजन तिथि :
ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ़ बर्फ़, जो कफ़न की तरह सफ़ेद और मौत क
महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 19 दिसम्बर, 2021
ये भी उन्नीसवीं शताब्दी के समाजिक सुधारक, महान देश-भक्त व आर्य समाज के संस्थापक। बचपन का नाम माता-पिता ने रखा मूलश
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो, ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो। राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं है
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो, ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।
भारत की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 3 जनवरी, 2021
नारी शिक्षा की बन नव अरुणिमा, सामाजिक अवसीदना बहुत सही। अवरोध राह विविध संघर्ष अडिग, महिला नेतृत्व प्रखरा शिखर
गुब्बारे - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 29 नवम्बर, 2021
हवा जब भर जाती गुब्बारे के अंदर, उड़ जाता वह झट से ऊपर, कहता गुब्बारा हम से यही, झाँक लें ज़रा हम ख़ुद के अंदर। बाहर की नह
रूठे यार को मनाऊँ कैसे? - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 21 दिसम्बर, 2021
रूठे को मैं कैसे मनाऊँ? होती जिनसे बात नहीं, यादों में मैं उनके तड़पू, उनको मेरा ख़्याल नहीं। कोई जाकर उन्हें बता द
जन्म सफल हो जाएगा - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 5 जनवरी, 2022
मिला मानव जीवन सबको, नेक कर्म में सभी लगाएँ। त्याग मोह माया, द्वेष भाव, प्रभु भक्ति में रम जाएँ।। मंदिर मस्जिद या
भारत ज़मीन का टुकड़ा नहीं - अटल बिहारी वाजपेयी
  सृजन तिथि :
भारत ज़मीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है। हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कं
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते - अटल बिहारी वाजपेयी
  सृजन तिथि : 1975
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते सत्य का संघर्ष सत्ता से, न्याय लड़ता निरंकुशता से। अंधेरे ने दी चुनौती है, किरण
पंद्रह अगस्त की पुकार - अटल बिहारी वाजपेयी
  सृजन तिथि :
पंद्रह अगस्त का दिन कहता: आज़ादी अभी अधूरी है, सपने सच होने बाकी है रावी की शपथ न पूरी है। जिनकी लाशों पर पग धर कर आ
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए, मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए। अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में, है जितन
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए, मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए।
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ, ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ। फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ, ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ।
मन मथुरा दिल द्वारिका - कबीर
  सृजन तिथि :
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाणि। दसवाँ द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछांणि।।
इक तरफ़ है भूक बैरन इक तरफ़ पकवान हैं - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 6 दिसम्बर, 2021
इक तरफ़ है भूक बैरन इक तरफ़ पकवान हैं, फ़ासले ना मिट सकेंगे दरमियाँ भगवान हैं। आज के रघुवंश की तकलीफ़ यारो है जुदा, साथ
ठंड में आई याद स्वेटर की - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 4 नवम्बर, 2021
ठंड में आई है मुझको याद स्वेटर की, जिसके बिना हमारी ठंड नही रुकती। इसमें हमारी माँ का प्यार, आशीर्वाद, जिसके बिन हम
अजेय योद्धा: महाराजा सूरजमल - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : जनवरी, 2015
अजेय योद्धा कहती दुनिया सूरजमल महाराज तनै, जाट सुरमा युगों-युगों तक पूजै जाट समाज तनै। 13 फरवरी, 1707 का बड़ा पवित्र दि
हम हिन्द के वीर जवान - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : जून, 2021
हम हिन्द के वीर जवान, हमारा क्या कहना। नहीं कोई हमारे समान, हमारा क्या कहना।। नहीं किसी से डरते हैं हम, सदा आगे को ब
गुरु जी - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : 2 जनवरी, 2022
तुझको शीश झुकाता गुरु जी, तुम हो ज्ञान के दाता गुरु जी। तुम ही ब्रम्हा और विष्णु, महेश, तुम ही भाग्य विधाता गुरु जी
मित्र - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 15 अप्रैल, 2002
"अरे तुम यहाँ बैठे हो मित्र! मैं तुम से मिलने तुम्हारे घर गया था।" "पढ़ाई करने के लिए यही जगह अच्छी लगती है। यहाँ मैं
कोहिनूर है आचरण - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 11 अगस्त, 2020
कोहिनूर है आचरण, सोना हुआ स्वभाव। संयम से जीवन चले, सिमट गया बिखराव।।
सौ-सौ उठे बवाल - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 8 अगस्त, 2020
भावों की संकीर्णता, पैदा करे मलाल। इक छोटी सी बात पर, सौ-सौ उठे बवाल।।
माँ - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 26 मई, 2020
ईश्वर की सबसे सुन्दर रचना माँ, धरती पर ईश्वर का रूप है माँ, अम्मा, जननी, माता, महतारी माँ, भिन्न-भिन्न नामों से जानी ज
ऐ मौत तेरा डर नहीं - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2020
ऐ मौत तेरा डर नहीं, यहाँ कोई अमर नहीं। मौत ही अटल सत्य है, बाक़ी दुनियाँ मिथ्या है। ऐ मौत तेरा डर नहीं। मुझे डर तो ज़ि
स्वामी विवेकानन्द - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 13 अक्टूबर, 2021
स्वामी विवेकानंद ऐसे गुरुवर के शिष्य, पढ़ लेते चेहरा देखकर ही जो भविष्य। भुवनेश्वरी देवी माता विश्वनाथ थे पिता, १
इस दुनियाँ में झूठ - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 4 अगस्त, 2020
मकड़जाल सा है बुना, इस दुनियाँ में झूठ। मौसम का आघात है, गईं बहारें रूठ।।
बारिश है दुल्हन बनी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 29 जुलाई, 2020
बारिश है दुल्हन बनी, मेघ रचाते ब्याह। पावस में मिटने लगी, जेठ मास की दाह।।
धूल, धुआँ, आँधी चले - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 24 जुलाई, 2020
धूल, धुआँ, आँधी चले, नदी छोड़ती कूल। पावस रही सुधारती, गर्मी की यह भूल।।
चिड़ियों को डर लगे - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 29 मार्च, 2019
आज अपना घर भी पराया सा घर लगे! उनकी तो बात क्या सुर्खाब के पर लगे! अँधेरों के बाहुपाश रातों को जकड़े! जाल फ़रेबों का
शीत ऋतु का आगमन - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 4 जनवरी, 2022
घिरा कोहरा घनघोर गिरी शबनमी ओस की बुँदे, बदन में होने लगी अविरत ठिठुरन। ओझल हुई आँखों से लालिमा सूर्य की, दुपहरी
पूस की ठंड - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 8 जनवरी, 2022
जब भी आती है पूस की ठंड सब कुछ अस्त व्यस्त कर जाती जीवन उलझा जाती। इंसान हो या पशु पक्षी सब बेहाल हो जाते, ठंड से बचन
आने वाला पल - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 7 जनवरी, 2022
आने वाला पल तो आकर ही रहेगा, जैसे जाने वाला पल भी भला कब ठहरा है? क्योंकि आने वाला पल अगले पल के साथ ही बीता हुआ हो ज
पश्चाताप की अग्नि - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 10 दिसम्बर, 2021
स्तब्ध रह गया धरा गगन मौन हो गए जन के बोल, निष्ठुर ईश्वर तूने खेला क्यों ऐसा अनचाहा खेल। माना तू करता रहता है ऐसे न
ज़िंदगी - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2021
कभी प्यार, कभी जंग है ज़िंदगी, कभी हसीन कभी बेरंग है ज़िंदगी। बड़ी मुश्किल से मिलती है ये तो, पल-पल रंग बदलती है ये तो।
करियो नारी का सत्कार - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2021
करियो नारी का सत्कार, है ये नारी सृजन हार। है ये नारी जग की जननी, इस बिन सृष्टि नहीं चलनी। इस बिन सूना है संसार, करि
पश्चाताप - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 11 सितम्बर, 2016
हार गया मैं! सोचता था; ख़ुश रखूँगा, अपनों को, संगी-साथियों को, अपरिचितों को। सपना था पूरा किया भी सपनों को, पर! न कर पा
विश्व हिंदी दिवस - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 10 जनवरी, 2022
हिंदी की लोकप्रियता को लेकर समूचे विश्व में 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। हिंदी प्रेमियों के लिए इस दि
स्वामी विवेकानंद जी - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 5 जनवरी, 2022
महावीर पुरुषार्थ सबल पथ, मति विवेक रथ यायावर था। चिन्तक ज्ञानी वेदान्तक सच, शक्ति उपासक महा प्रखर था। नवतरंग न
स्वामी विवेकानन्द - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 10 जनवरी, 2022
स्वामी विवेकानन्द जी थे, युग पुरुष मानव महान। अल्पायु में ही पा लिया था, अनुपम अलौकिक दिव्य ज्ञान। राष्ट्र का जग
स्वामी विवेकानंद - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 10 जनवरी, 2022
धार्मिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का हुआ था ह्वास, चारित्रिक व नैतिक सिद्धांतों का बना था परिहास। सनातन धर्म-मूल्यो
स्वामी विवेकानंद - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 6 जनवरी - 7 जनवरी, 2022
हमारा देश अनेक महान विभूतियों से सदियों से भरा पड़ा है, जिनसे हम अनवरत प्रेरणा पाते आ रहे हैं। सीखते आ रहे हैं। यही न
स्वामी विवेकानंद के विचार - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 11 जनवरी, 2022
युवा सन्यासी तत्वदर्शी स्वामी विवेकानंद के विचारों का आप भी अनुसरण तो कीजिए, स्वामी जी के विचारों पर चिंतन मनन क
स्वामी विवेकानंद जयंती - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 12 जनवरी, 2022
सो रहा था संसार सम्पूर्ण, हो कर मूढ़ मति अज्ञान, अवतरित हुए भारत की धरा पर, हमारे विवेकानंद महान। दिग्भ्रमित विश्व व
स्वामी विवेकानंद - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 11 जनवरी, 2022
भारतीय अध्यात्म का परचम जिसनें दुनिया में फहराया, बारह जनवरी अठारह सौ तिरसठ कोलकाता बंगाल भूमि पर कायस्थ कुल मे
कर्तव्य पथ - विजय कृष्ण
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
जब मैं अपने काम से घर लौटा, सूरज भी मेरे साथ थक कर चल पड़ा। बच्चे जैसे इंतज़ार करते हैं, छुट्टी की घंटी बजने का, प्रकृ
बचपन और गाँव - विजय कृष्ण
  सृजन तिथि : अक्टूबर, 2021
बचपन में गाँव हमेशा दस किलोमीटर दूर लगता था, न कम न ज़्यादा। एक तो बुद्धि दस वर्ष से ज़्यादा न थी और दूसरे दस का नोट बहु
युवा दिवस और स्वामी विवेकानंद जी का संदेश - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 12 जनवरी, 2022
महज़ 39 साल की जीवन यात्रा में ही स्वामी विवेकानंद जी न केवल भारत के आध्यात्मिक गुरू बने, बल्कि दुनिया भर को अध्यात्म
हवलदार है हम - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 20 जनवरी, 2020
कई कहानियों का किरदार है हम, और पेशे से एक हवलदार है हम। भारतीय सेना की पतवार है हम, चार्ज होल्डर व चौकीदार है हम।।
जय जवान, जय किसान - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
भारत माँ के पूत महान, जय हो जवान और किसान। एक देश की रक्षा करता, एक पेट देश का भरता। इनसे ज़िंदा है हिंदुस्तान, जय हो
मन को युवा कीजिए - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 12 जनवरी, 2022
जिंदगी भर रब से बस यही दुआ कीजिए, ढलते यौवन की फ़िक्र छोड़िए अपने मन को युवा कीजिए। कर्तव्य पथ पर चलकर ही मुक्ति मि
अन्तर्द्वन्द - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 17 नवम्बर, 2020
कभी कभी, एक अजीब अन्तर्द्वंद! झकझोर देता मन औ मस्तिष्क को। घोर अवसाद मेघ बन, अच्छादित होता जीवन में, कर देता गत
प्याज और लहसुन - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 15 अक्टूबर, 2019
सरकार नें खींचा अर्थव्यवस्था का कैसा ख़ाका। प्याज और लहसुन ने डाला जनता की जेब में डाका।।
मकर संक्रांति - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 13 जनवरी, 2022
आया मकर संक्रांति का पावन उत्सव, सूर्यदेव हुए उत्तरायन, करते सूर्य की अर्चना इस दिन, और माँ गंगा में करते स्नान। कर
मकर संक्रांति है सुख व समृद्धि पर्व - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 10 जनवरी, 2021
लो आया नव-वर्ष का पहला त्योहार, संक्रांति पर्व लाया है ख़ुशियाँ अपार। हल्की-हल्की चल रही ये ठंडी हवाएँ, हमारी तरफ़ स
मेरा मुझ में कुछ नहीं - कबीर
  सृजन तिथि :
मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा। तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मेरा।।
मकर संक्रांति शुभदा जग हो - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 14 जनवरी, 2022
उत्तरायण की अरुणिमा भोर, मकर संक्रांति शुभदा जग हो। उद्यम जीवन साफल्य सुपथ, चहुँ कीर्ति प्रभा जग सुखदा हो।। नव श
मकर संक्रान्ति - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 13 जनवरी, 2021
मकर संक्रान्ति आज फिर से है आई, लोहड़ी व पोंगल की लख-लख बधाई। एकता का मधुर ये है संदेश लाई, जो रसोई घरों में है खिचड़ी
नारी का शृंगार - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 5 जनवरी, 2022
नारी का शृंगार है पति और उसकी संतति जिनसे उसके जीवन में रूप है, रस है, गंध है पग-पग पर पुष्प और पल-पल इन्द्रधनुषी रं
मकर संक्रान्ति का महत्व - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 14 जनवरी, 2022
हिंदू धर्म ने माह को दो पक्षों में बाँटा गया है कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष, वर्ष को भी दो भागों में बाँट रखा है पहला उ
इस बार नहीं चूकूँगा - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 4 जनवरी, 2022
ठान लिया अब मैंने मन में, बिगुल नया फूकूँगा, चूक रहा था मैं अब तक, इस बार नहीं चूकूँगा। कहाँ-कहाँ ग़लती की, समझ गया हूँ
विरान ज़िन्दगी - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 18 सितम्बर, 2017
अब तक तो दुनिया हसीन थी, पल भर में क्या हो गया। जिसको चाहा था वर्षो से, दो पल में मुझसे खो गया। जिसको कितना प्यार दिय
गीत नहीं गाता हूँ - अटल बिहारी वाजपेयी
  सृजन तिथि :
बेनक़ाब चेहरे हैं दाग़ बड़े गहरे हैं टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ गीत नहीं गाता हूँ। लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शी
गीत नया गाता हूँ - अटल बिहारी वाजपेयी
  सृजन तिथि :
टूटे हुए तारों से फूटे वासंती स्वर पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर झरे सब पीले पात, कोयल की कुहुक रात प्राची में अ
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ - अटल बिहारी वाजपेयी
  सृजन तिथि :
सवेरा है मगर पूरब दिशा में घिर रहे बादल रूई से धुँधलके में मील के पत्थर पड़े घायल ठिठके पाँव ओझल गाँव जड़ता है न ग
मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा, ये पुल-सिरात अगर है तो चल के देखूँगा। सवाल ये है कि रफ़्तार किस की कितनी है, म
काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं, और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं। आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़
कवि हृदय - विनय विश्वा
  सृजन तिथि : 10 जून, 2020
कवि 'मन' को है संवेदनाएँ बेधती शर, शूल घाव बन कर है चुभती। रो पड़ी है कलम उनकी धार में कवि मन बोझिल हुई भावनाओं के भा
चक्कर में - विनय विश्वा
  सृजन तिथि :
क्यों पड़े हो चक्कर में सब अपने है चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में सब बदते है खद्दर में। कोई कहता इसको डालो कोई कह
श्रम प्रेम - विनय विश्वा
  सृजन तिथि : 20 जून, 2020
ज्येष्ठ की तपती भरी दोपहरी श्याम सलोनी रुप सुनहरी माथे पे है पगड़ी धारी गुरु हथौड़ा हाथ है भारी। मुख मंडल की छटा
मानव परिकल्पना - विनय विश्वा
  सृजन तिथि :
ये दुनिया सूरज, चाँद, तारे है अनंत ब्रह्माण्ड न्यारे। मानव की है परिकल्पना अधूरी बार-बार करते वो सिद्धि पूरी। कभ
मातु यश गाऊँ मैं - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 10 मई, 2020
माँ हो तुम ममता का आँचल, माँ बैठ सदा सुख पाऊँ मैं। अश्रुपूरित भींगे नयनों से, तुझे नमन पुष्प चढ़ाऊँ मैं। तू जननी अन
छँटे रात्रि फिर सबेरा - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 11 मई, 2020
चहल पहल फिर से शुरू, जीवन नया प्रभात। सजी रेल से पटरियाँ, गमनागम सौगात।। फँस जनता जज़्बात में, नतमस्तक सरकार। कोरो
निराला का पत्र जानकीवल्लभ शास्त्री के नाम - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
  सृजन तिथि :
भूसामंडी, हाथीखाना, लखनऊ 5-09-68 प्रिय जानकीवल्लभ जी, अभी-अभी आपका पत्र मिला। हिंदी से आपको प्रेम होगा–कोई फ़र्ज़-अदा
दीन - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
  सृजन तिथि :
सह जाते हो उत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न, हृदय तुम्हारा दुर्बल होता भग्न, अंतिम आशा के कानों में स्पंदित
महगू महगा रहा - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
  सृजन तिथि :
आजकल पंडितजी देश में बिराजते हैं। माताजी को स्वीजरलैंड के अस्पताल, तपेदिक के इलाज के लिए छोड़ा है। बड़े भारी नेत
अधूरा ख़्वाब - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 4 जनवरी, 2022
मेरी तन्हाई में ख़्वाब तेरे, गर रोज़-रोज़ दस्तक देते। चाहत के झरोखे से बाहर, दो बिंदु ताँक-झाँक में रहते।। मेरे कंपित
दिल की पतंग - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 14 जनवरी, 2022
ना जाने किससे डोर मेरी जुड़ी जा रही है, मेरे दिल की पतंग देखो उड़ी जा रही है। लहजा तो ऐसा है कि सड़क पर मचलती कोई कुड
प्रेम - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 10 दिसम्बर, 2010
सरिता से पूछा सागर ने तुम मुझ में क्यों मिल जाती हो, मंद-मंद मुस्काते हुए अपना अस्तित्व खो जाती हो। प्रेमी ने पूछ
मातृभूमि के प्राण प्रणेता - रंजीता क्षत्री
  सृजन तिथि : 2021
कह रहा इतिहास– अंग्रेज आए थे भारत में, ना डरी झाँसी की रानी, अंग्रेजों को रण में धूल चटा दिए। भाग जाओ ओ गोरे लोगों, म
हो जीवन उजियार - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 12 मई, 2020
मार्ग सुलभ है पाप का, बड़ा भयावह अन्त। दुर्गम राहें धर्म का, सत्य विजय भगवन्त।। कठिन परीक्षा सत्य की, बलि लेती अविर
नवनीत माला - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 15 मई, 2020
चले गेह नित मातु से, पिता चले परिवार। गुरु गौरव समाज का, चले देश सरकार।। कारण सब हैं नव सृजन, चाहे देश समाज। निर्मा
सुबह-सवेरे - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 28 दिसम्बर, 2016
सुबह-सवेरे आँगन को मेरे चिड़िया, चूँ-चूँ कर चहकाती है। भोर हुआ उठ जाग मुसाफ़िर, क्यूँ निदिया तुझे सताती है।। बीती र
अकेलेपन से एकांत की ओर - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 20 अप्रैल, 2017
'अकेलापन' कठोर सज़ा, 'एकांत' एक है बरदान। एक जैसे दिखने वाले, अंतर ज़मीन आसमान। एकल छटपटाहट घबराहट, एकांत लाभ शांति आ
कहाँ गए भरत समान भाई - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 3 सितम्बर, 2021
आज कहाँ गऐ ऐसे भरत समान भाई, यह भाई की भाई जो होते थे परछाईं। आदर्शों की‌ मिशाल थे ऐसे वो रघुराई, महिमा जिनकी तुलसी द
श्रीलंका की एक लड़की - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 17 सितम्बर, 2020
तेरी हस्त लेखनी से खुदे, तमिल भाषा में मेरा नाम; मेरी पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर; आज भी सजीव है। जब भी देखता हूँ, उन स्वर
प्यार वो फूल है - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 2020
प्यार वो फूल हैं– जो एक बार खिल जाए तो, उम्र भर महकता रहता हैं। ये कभी मुरझाता नही, सदाबहार हैं, हर मौसम मे खिला रहता
क्या कभी ऐसा होगा? - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2020
क्या कभी ऐसा होगा? मैं तुम्हें सोचू और तुम आ जाओ! क्या कभी ऐसा होगा? मैं तुम्हें सोचू और तुम्हें ख़बर हो जाएँ। क्या
सपने - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 14 दिसम्बर, 2021
सपने देखिए सपने देखना अच्छी बात है, पर सपनों को पंख भी दीजिए, उड़ने के लिए खुला आकाश दीजिए। सपनों को दायरे में न बाँध
असमय विदाई - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 15 दिसम्बर, 2021
प्रकृति की व्यवस्था में भी बहुतेरी विडंबनाएँ हैं, यह विडंबनाएं भी कभी-कभी होती बहुत दुखदाई होती हैं। माना कि आना-
हे पार्थ! सदा आगे बढ़ो तुम - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 17 जनवरी, 2022
हे पार्थ! सदा आगे बढ़ो तुम, कर्तव्य पथ पर डटो तुम। मुश्किलों का सामना करो, तूफ़ान के आगे भी अड़ो तुम। हे पार्थ! सदा आग
पंडित बिरजू महाराज - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 17 जनवरी, 2022
घुँघरूओं की झनकार एवं मीठी आवाज़, काशी की शान और कथक की पहचान। नर्तक शास्त्रीय गायक पंडित बिरजू महाराज, 7 वर्ष में
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल - अमीर ख़ुसरो
  सृजन तिथि :
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ, कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ। शबा
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल - अमीर ख़ुसरो
  सृजन तिथि :
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ, कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ।
ख़ुसरो रैन सुहाग की - अमीर ख़ुसरो
  सृजन तिथि :
ख़ुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग। तन मेरो मन पीउ को, दोउ भए एक रंग।।
सावन आया - अमीर ख़ुसरो
  सृजन तिथि :
बेटी तेरा बावा बुट्टा री—के सावन आया। अम्मा मेरे भाई को भेजो जी—के सावन आया। बेटी तेरा भाई तो बालारी—के सावन आया
माँ की ममता - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 9 मई, 2021
नज़र खुली तो तुझको देखा, तुझ में मैंने जग को देखा। ईश्वर अल्लाह तू ही है माँ, तुझ में मैंने रब को देखा। तेरा रात भर ज
जनता का तंत्र गणतंत्र - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 26 जनवरी, 2021
जनता का जो तंत्र है, वही गणतंत्र है। भेदभाव की जगह नहीं अब, वंशवाद की लहर नहीं अब, जनता ही अब मालिक है, जनता ही सरकार
जन्मदिन और केक - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 9 मार्च, 2017
जन्मदिन शुभकामना का मर्म समझ नहीं आया। शुभचिंतको, परिचितो का संदेश समझ न आया। घट रही है ज़िंदगी, ख़ुशी का अतिरेक क्य
परिणय सूत्र - विनय विश्वा
  सृजन तिथि : 2020
देखा-देखी प्रथम चरण हौ दूजा है बरियाती तिजा में दुलहिन घरे आई निज संसार छोड़ी आई। एक भरोसा तुझसे है प्रिये तू संस
खिलौना - विनय विश्वा
  सृजन तिथि : 2020
सूखी रोटी ओढ़ना बिछौना सर्दी गर्मी साथ है रहना प्राणी जन के उदर भरते सत्ता के गलियारों में हम कठपुतली बन ग‌ए खिलौ
पगड़ी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
उपदा रसवंत नार सी तगड़ी है! दयानत फ़ज़ीलत की पगड़ी है!!
छुरी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
नेता जी सफ़ेदपोश हैं! कालेधन के कोश हैं!! उनकी नियत बुरी है! देश के लिए मीठी छुरी है!!
गृहस्थी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
एक महिला अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी पर अकड़ी! तो उसने सीधा सा उत्तर दिया- मैडम! मुझे तो याद है केवल नून-तेल-लकड
जमादार भाया - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
वे उलटे छुरे से मूंड़ते हैं क्योंकि उनके रोम-रोम में भ्रष्टाचार है समाया! इसीलिए ऐसे व्यक्ति को कहेंगे बेकारी
खेल - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
अलादीन भ्रष्टाचार को समझता रहा खेल! वह तब अवाक् रह गया जब रिश्वत के आगे उसका चिराग़ हो गया फ़ेल!!
आशा - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 10 अक्टूबर, 2000
क्यूँ निराश होकर बैठ गए, यह तो पल भर की बाधा है। आगे तो बढ़कर दिखलाओ साथी, पग-पग पर जिज्ञासा है। शोषक तो सुशोभित हैं,
कम्बल - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 18 जनवरी, 2022
सर्द के दरमियाँ ये जो कम्बल है, ये तो शीत इलाक़ों का सम्बल है। उफ़ ये ठिठुरती फ़िज़ाएँ! कंपकपाती सर्द घटाएँ! कहीं बारिश,
महाराणा प्रताप - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 16 मार्च, 2020
पिता जिनके राणाउदय सिंह, और दादो सा राणा सांगा थे। जयवन्ता बाई माता जिनकी, प्रताप महाराणा कहलाए थे।। शिष्टता, दृ
दीवाली का दीया - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 22 मार्च, 2018
देखो आई नई दीवाली, लेकर जीवन में ख़ुशहाली। न घर न आँगन है खाली, चारों ओर है दीपक-बाती। आओ अपने हाथ फैलाओ, दुश्मन को भ
कोरोना की कहानी - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 20 मार्च, 2020
चारो ओर मचा कोहराम है, ये कैसी बेचैनी है, ये कैसा तूफ़ान है। एक छोटा सा वायरस, खाँसी जिसकी पहचान है, कर देता साँस भी ज
प्रेम की परिभाषा - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 8 अगस्त, 1999
बुझा दीप हुआ अँधेरा, मेरे मन ने मुझसे पूछा क्या प्रेम है? क्यूँ हुआ अँधेरा? सागर से गहरा है जो, निल गगन तक फैला जो, व
नकेल - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
रोज़-ब-रोज़ हम बदअमली रहे हैं झेल! रफ़्ता-रफ़्ता कोई भ्रष्टाचार पर डाले नकेल!!
शासन व्यवस्था - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
कर्मचारी मंडल आचरण से कृष्ण नहीं कंस हो गया है! इसीलिए बदशऊर शासन व्यवस्था का भ्रंश हो गया है!!
सरकारी काम - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
देश में बदकारी देखकर उनकी आँख हो गई सजल! वे सरकारी काम सरकारी तौर पर कर देते हैं ये है उनका फ़ज़ल!!
खोज - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
हमारा देश समस्याओं का देश है और मैने नई समस्या खोजी है! यह हमारे लिए फ़ीरोज़ी है!!
गौं - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
हमनें सोचा था निकलेगा गौं! लेकिन बोया गेहूँ उपजा जौ!!
लॉकडाउन और मधुशाला - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 7 मई, 2020
नगर गाँव महानगर बंद, लटका जग भर में ताला। छाती पर मूँग को दलने, खुली फिर से मधुशाला।। लॉकडाउन की ऐसी तैसी, सोशल डि
बुज़ुर्ग कभी बोझ नहीं होते - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 3 मार्च, 2021
ये बुज़ुर्ग व्यक्ति कभी बोझ नहीं होते, ना समझ व्यक्ति इन्हें समझ न पाते। परिवार की ढाल बुज़ुर्ग बनकर रहते, सबको सही स
जीवन का पतझड़ - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : 19 जनवरी, 2022
जीवन कब रंग बदल ले कब ख़ुशियाँ ग़म में बदल दे समय का पहिया कब उल्टा घूम जाए जो न चाहो ऐसा कुछ हो जाए हँसती-खेलती ज़िंदग
ख़ामोशियाँ तन्हाइयाँ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 23 दिसम्बर, 2021
ख़ामोश है ख़ामोशियाँ तन्हा हैं तन्हाइयाँ। ये कैसी लाचारगी है कि ख़ामोश तन्हाइयों की ख़ामोशी नहीं टूटती, तन्हाइयों
पैसा बोलता है - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 29 दिसम्बर, 2021
समय का पहिया तेज़ी से घूम रहा आँखें फाड़कर देखिए पैसा भी अब चीख़-चीख़कर बोलता है, आजकल पैसा रिश्तों को बहुत ख़ूबसूरती स
परछाईं - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 8 जनवरी, 2022
वक्त कितना भी बदल जाए हम कितने भी आधुनिक हो जाएँ, कितने भी ग़रीब या अमीर हों राजा या रंक हों नर हो या नारी हों परछाईं
काश! ऐसा होता! - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
  सृजन तिथि : 2021
काश! ऐसा होता! चंद दिनों के लिए तुम हमारे... और हम तुम्हारे स्थान ले लेते... तुम हमारी तरह पशु और हम तुम्हारी तरह मानव
अग्निवृष्टि - मयंक द्विवेदी
  सृजन तिथि : 2021
रवि की प्रथम रश्मि, रश्मिकर, कर नव सृष्टि। उठा, जगा पुरुषत्व को, दुर्बलता पर कर, अग्निवृष्टि। सामने हो मृग मरीचिका,
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 14 जनवरी, 2022
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आप अग्रणी नेता, 1945 के बाद आप अचानक हो गए लापता। स्वतन्त्रता सेनानियों में सबसे मशहू
बेहोशी से उबरना - विनय विश्वा
  सृजन तिथि : 18 जनवरी, 2022
सच कभी नही मरता अब ये पुरानी बातें हो गई है कबीर ने उस ज़माने मे कितनी ही बातों को उधेड़ कर रख दिया है पर आज भी क्या आँख
भारत की बिन्दी - विनय विश्वा
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
मैं हिन्दी हूँ जननी जन्मभूमि मातृभाषा हूँ खड़ी बोली खड़ी होकर मर्यादित,अविचल‌ आधार हूँ मैं भारत का शृंगार हूँ।
मेरी प्रीत - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 15 फ़रवरी, 2017
पता नहीं! इस समय क्या हो रहा है मेरे साथ? हर क्षण तेरी ही याद आती है। चाहें घर रहूँ; काॅलेज़ हो या फिर खेतों पर, कहीं भी
ना माँ से बढ़के है जग में कोई - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : जुलाई, 2000
ना माँ से बढ़के है जग में कोई। सेवा कर दिल से जगे क़िस्मत सोई।। तेरे लिए कष्ट उठाती है माँ, तुझे दुनिया में लाती है मा
मेरा गाँव - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2019
मेरा गाँव है पावन धाम। बार-बार मैं करूँ प्रणाम।। पेड़-पौधों से घिरा हुआ है, धन-धान्य से भरा हुआ है, सुख-सुविधा यहाँ त
हे मात भारती! तुझे नमन है - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2020
हे मात भारती तुझे नमन है, तुझको फूल चढ़ाते हैं। मातृ भूमि की रक्षा में हम अपना शीश चढ़ाते हैं।। हे मात भारती! तुझे नमन
वरमाला - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
जयमाला पर जब तुम मिलोगी, तुम्हारे हाथों में वरमाला होगी। नज़र झुकाए प्रिय तुम होगी इशारों से हममें सिर्फ़ बातें हों
सुभाष चंद्र बोस - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 21 जनवरी, 2022
स्वतंत्रता संग्राम के सर्वोच्च नायक राष्ट्रवाद के बड़े उन्नायक बंगाली बाबू पिता जानकी नाथ बोस माँ प्रभावती दत्त
सुभाष चंद्र बोस - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2022
जानकीनाथ और प्रभावती के पुत्र, सुभाष चंद्र थे स्वाधीनता सेनानी, आओ आज सुनाऊँ सबको मैं, सुभाष बोस की कहानी। माता पि
सुभाष: भारत माँ का लाड़ला - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2022
सदा अथक संघर्ष ने, माँ भारत के त्राण। आत्मबल विश्वास दे, कर सुभाष निर्माण।। भारत माँ का लाडला, महावीर सम पार्थ। मे
सुभाष चन्द्र बोस - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2022
ऐ! स्वतंत्रता के मतवाले, तुमको मेरा शत् शत् प्रणाम। ऐ! भारत माँ के रखवाले, तुमको मेरा शत् शत् प्रणाम। आज़ाद हिंद से
इतिहास बदलना होगा - मयंक द्विवेदी
  सृजन तिथि : 31 दिसम्बर, 2021
कर्म रथ पर आरूढ़ हो, फिर नया सवेरा आएगा, जाग उठेगी क़िस्मत तेरी, सूर्य उदित हो जाएगा। दर्द सहे है तुमने कितने, कितनी र
टेसू के रुख़सार - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
आम हुए हैं मधुॠतु के मुख़्तार! दूर तक लहराती फ़सलें! दुख की दिखती नहीं नस्लें! लाल गुलाबी टेसू के रुख़सार! गंध को उ
घायल तटबंध हुए - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 25 मार्च, 2019
छूछी गागर से रीते संबंध हुए। रिश्ते सिक्कों से खनकते थे। बैठकर दिन टिकोरे चखते थे। उजड्ड लहरों से घायल तटबंध ह
कलमुँही रात है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 19 मार्च, 2019
हिरणों का झुंड है शेर की घात है! निरंकुशता से हो रही हत्याएँ! जीवन को क्यों डँसती हैं व्यथाएँ!! दिन हुए लिजलिजे क
फँस गया ज़िला - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 22 मार्च, 2019
अकाल के पंजे में फँस गया ज़िला। छाती पीट रोए खेत। बहती नदी होती रेत। बदले में फ़ज़ल के धोखे का सिला। चीखें, रुद
हिन्दी का महत्व - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 20 अक्टूबर, 2001
सागर संगम नदियों का, जो जीवन पथ दर्शाती है। भाषाओं का संगम है हिन्दी, जो राष्ट्रभाषा कहलाती है। देश विभिन्नता का
जन्मदिन का उपहार - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 12 दिसम्बर, 2000
मेरे पास न धन है, न देने को उपहार। पर दिल से मैं दे रहा, ढेर सारा प्यार। गगन तुम्हारे क़दम चूमे, ये मेरी है फ़रियाद। त
दूरियाँ - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 2 अक्टूबर, 2001
नयनों में है अश्रु जल, खिल रहा दिल में कमल। पर पूछ रहा ख़ुद से मैं प्रश्न, क्यूँ दूरियाँ भिगो देती नयन। जब वसंत ऋतु आ
नई प्रभात - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 10 फ़रवरी, 2000
निकला रवि हुआ प्रकाश, अँधकार का छुटा साथ। लिये नए अद्भुत विश्वास, आज चमकता दिनकर ख़ास। मंद गति में बहती सरिता, साथ
ऐसा हमारा संविधान - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 7 जनवरी, 2022
हिन्दुस्तान का ऐसा हमारा संविधान, जिसका करतें है यहाँ सभी सम्मान। इस पर सब भारतवासी को विश्वास, लिखें है जिसे यह आ
बेटियाँ - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 10 सितम्बर, 2019
बेटियाँ शब्द एक प्रतीक है, अहसास है मर्यादा का, गहन अपनत्व का, माता के ममत्व का, पिता के दायित्व का। ये बेटियाँ गंग
शजर-ए-ग़ज़ल से लाया हूँ एक शे'र फ़रियाद कर - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : अक्टूबर, 2021
शजर-ए-ग़ज़ल से लाया हूँ एक शे'र फ़रियाद कर, क़ीमत इश्क़ होगी मैं बेच दूँगा ख़ुद को बर्बाद कर। सारे जहाँ की तबस्सुम इक तिरे
ये वक़्त जो खिसक रहा हैं चाँद की उड़ान में - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : अक्टूबर, 2021
ये वक़्त जो खिसक रहा हैं चाँद की उड़ान में, उत्सुकता की चादर फैली हैं कवि के मकान में। दिख रही हैं बारिश की धारा बहते
सारी उम्र ज़ाया कर दी यूँ ही पढ़ने पढ़ाने में - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
सारी उम्र ज़ाया कर दी यूँ ही पढ़ने पढ़ाने में, मुठ्ठीभर लम्हात हसीं थे जो गुज़रें मुस्कराने में। खेल के मैदान में वो च
सुबह का मुख - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : जनवरी, 2022
जनवरी की ये भीगी-भीगी शबनमी सहर, ये कड़कड़ाता, ठिठुराता और लुभाता मौसम, ये बहती सर्द और पैनी हवाओं की चुभन, इस पर तिरा
गणतंत्र दिवस - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 25 जनवरी, 2022
गणतंत्र दिवस का पर्व आया, राष्ट्र ध्वज चारों ओर फहराया, "जन गण मन" गुनगुनाने का, देखो यह पावन दिन आया। 26 जनवरी 1950 का दि
26 जनवरी अमर रहे - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 24 जनवरी, 2022
युगों-युगों तक यह शुभ दिन हर भारतीय को स्मरण रहे, गूँजता रहे फ़िज़ा में नारा 26 जनवरी अमर रहे। गणतंत्र हुआ भारत इस दिन
हमको नशा है - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 25 जनवरी, 2022
हमको नशा है अपनें वतन के ध्वज का, भारत के प्यारे अपने इस संविधान का। राष्ट्रीय-गीत और हमारे राष्ट्रीय-गान का, हिन्
मतदान करें - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 24 जनवरी, 2022
अपने हक़ की ख़ातिर यारों, लोक तंत्र बलवान करें। जागरूक हो जाओ यारों, आओ हम मतदान करें। संविधान सर्वोपरि होता, आओ सब
छब्बीस जनवरी - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 25 जनवरी, 2021
आई है फिर से देश में छब्बीस जनवरी, लाई है नव संदेश ये छब्बीस जनवरी। इस ही पवित्र दिवस को था लोकतंत्र का मन्त्र सजा।
हवाई जहाज़ बनी साईकिल - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 16 जनवरी, 2022
ज़िंदगी कैसे-कैसे कहाँ से कहाँ ले जाती है, जुनूनी मेहनत भी कहाँ से कहाँ पहुँचाती है। ये उनसे पूछो जिससे किसी ने सोचा
गणतन्त्र दिवस - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 18 जनवरी, 2022
आया राष्ट्रीय दिवस ये गणतंत्र दिवस, संविधान दिवस शौर्य सम्मान दिवस। चारों और देखो सब की भीड़ लगी है, जनता सब और स्
जीवन का नाम है बेटियाँ - जयप्रकाश 'जय बाबू'
  सृजन तिथि : 12 जनवरी, 2022
घर की रौनक और परिवार की शान है बेटियाँ, माँ बाप की पहचान और अभिमान है बेटियाँ। बिना जिसके वीरान खंडहर सी है ये दुनिय
ज़िंदा हो तो नज़र आओ - जयप्रकाश 'जय बाबू'
  सृजन तिथि : 2021
ज़िंदा हो? ज़िंदा हो! तो नज़र आओ। आँखें चार करो नज़र मिलाओ, ज़िंदा हो? ज़िंदा हो! तो नज़र आओ। बचपन के संग खिलखिलाना, बूढ़
लोक आस्था का पर्व छठ - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
  सृजन तिथि : नवम्बर, 2020
"छठी मैया आइतन आज..." छठ पर्व के आगमन होते ही यह गीत भारतवर्ष के कई राज्यों में विशेष रूप से बिहार, उत्तरप्रदेश और झार
निराला संसार - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 12 अक्टूबर, 2001
संसार बडा निराला है, यह मात्र मधु का प्याला है। जो भौतिक सुख में डूब गया, वह इस सत्य को भूल गया। उसको आगे भी जाना है,
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 21 जनवरी, 2022
करी थी हमने भी कोशिश, ज़िंदगी को समझने की, पर असल बात तब जानी, जब अपने ही छोड़ जाने लगे, असल दुःख भी तभी हुआ, और असल सुख
अटल सत्य - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 12 दिसम्बर, 2002
चलो आज मैं तुम्हें, जीवन का सत्य सुनाता हूँ। जो अंधकार फैला है जग में, उसका रहस्य बताता हूँ। सागर में उठती हैं लहर
नवभोर - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 17 मई, 2020
सूर्यदेव अनुपम कृपा, मिले सकल संसार। रोगमुक्त सुन्दर धरा, सुखदा पारावार।। भव्या रम्या मनोहरा, श्वेताम्बर जगदम्
धूमिल छाया - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 28 अक्टूबर, 2017
धूमिल पड़ गई वो छाया! कभी ख़ुशियाँ थी फैलाती; फूलों-सा थी महकाती; नीरव करके जीवन को, मिट गई कभी थी साया। धूमिल पड़ गई
बेटियों को पढ़ने दो - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 17 नवम्बर, 2020
आज बेटियों को सब पढ़ने दो, और आगे इनको भी बढ़ने दो। खिलने दो और महकने भी दो, अब पढ़ाई से वंचित न होने दो।। इनको बनकर
बेशक नहीं पसंद वो नफ़रत न हम रखेंगे - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 7 सितम्बर, 2021
बेशक नहीं पसंद वो नफ़रत न हम रखेंगे, बस प्यार की वफ़ा की चाहत न हम रखेंगे। ग़मगीन हैं फ़ज़ाएँ दहशत है खलबली है, इस बेरहम ह
हिंदी बने राष्ट्र भाषा - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : सितम्बर, 2020
हमारा हो निज भाषा पर अधिकार, प्रयोग हिंदी का करें इसका विस्तार। निज भाषा है निज उन्नति का कारक, मिटे निज भाषा से हम
भविष्य की कल्पना - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 15 अप्रैल, 2000
क्यों खोये हो सपनो में, रात चाँदनी तकने में। वह तो मात्र भ्रम है भाई, जो न मिलेगा जीवन में। क्यों खोए हो सपनो में, रा
एहसास - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 19 अप्रैल, 2003
आज मुझे हुआ एहसास, मैंने किया नहीं प्रयास। कल तक मैं था बड़ा महान, आज बन गया हूँ अंजान। क़िस्मत ने भी छोड़ा हाथ, केवल अस
आभार अर्धांगिनी - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
हम बस प्रिय! प्रिय नहीं, हम क़दम-क़दम के साथी हैं। हम बस दो जिस्म नहीं, हम जन्मों-जन्म के साथी है।। तुम ही हो मेरी सब ख़ु
कामयाबी - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
ठाकुर वंशीलाल हीरापुर गाँव के बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, साथ में क्षेत्र के कई गावों में ठाकुर साहब की सामाजिक और
हमारा गणतंत्र हमारा संविधान - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 26 जनवरी, 2022
26 जनवरी का दिवस प्यारा है आज गणतंत्र दिवस हमारा, हमारा संविधान है सबसे प्यारा हमारा भारत सबसे प्यारा। 1947 तक हम आज ह
न समय कम न काम ज़्यादा - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 27 जनवरी, 2022
समय का रोना नहीं रो रहा हूँ, बस ईमानदारी से बयाँ करता हूँ, जीने की फ़िक्र नहीं है मुझे ज़िंदा रहने के रास्ते तलाशता हू
हमारा गणतंत्र - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2022
26 जनवरी, 1930 से 15 अगस्त, 1947 को आज़ादी प्राप्त होने तक 26 जनवरी को ही स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता था। चूंकि 26 जनवरी, 1930 को भारत
ग़म के साए - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
आँखों की बंजर ज़मीन पर आँसू ऊग गए। ग़म के साए भाग्य की डाली पर लटके। संगी-साथी दे रहे झटके पर झटके।। जो भी रवि की भा
कोरोना से बचना है तो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
कोरोना से बचना है तो मास्क लगाएँ! जीवन रक्षा की ख़ातिर दो गज की दूरी! साबुन-सेनेटाइजर होता है ज़रूरी!! है लाज़मी कुछ
बेटी नित रत्नाकर समझो - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 24 जनवरी, 2022
बोझ नहीं सम्मानित बेटी, स्नेहिल नित रत्नाकर समझो। सारे जग मुस्कान है बेटी, मृदुल छाँव ममतांचल समझो। जीवन की पह
पत्ता गोभी - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : अक्टूबर, 2020
मिरे दर पर हुजूम में, साथी कोई पुराना आया हैं। आज़ीज़ों की बज़्म में, क़त्ल का फ़रमान आया हैं। मोहब्बत के खेल में, जाम त
चुप्पी तोड़नी होगी - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 24 जनवरी, 2022
हाँक दिए जाते हो ढोर डंगरो की तरह एक ही लाठी से लाठी पर राजनीति का रंग लगा हमको बहलाकर कराते दंगा। धर्म और सांप्र
सैनिक - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : अगस्त, 2010
न हँसता है, न रोता है, वो रातों को न सोता है, जो जीता है अपने देश के लिए, ऐसा तो केवल सैनिक ही होता है। वो धीर है, गम्भी
धैर्य न खोना तुम - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : जुलाई, 1999
आँसू से मुँह न धोना तुम, जीवन में धैर्य न खोना तुम। हर दिन सपने उन्नति के, दिल की मिट्टी में बोना तुम। हर पल है अनमोल
जय जवान - अनिल भूषण मिश्र
  सृजन तिथि : 5 मई, 2020
हे अरिमार्ग के रोधक सतत सुरक्षा के बोधक। तुम धीर वीर निर्भीक कहलाते हो, मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राण लगाते हो
मज़दूरों का दुर्भाग्य - अनिल भूषण मिश्र
  सृजन तिथि : 9 मई, 2020
थे मजबूर परिवार पालने के वास्ते, तय किया हज़ारों मील के रास्ते। अजनबी शहर में थे अपरिचित अनजान, अपनी मेहनत के सिवा न
जैसे शेरों की माँद खलक - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
जैसे शेरों की माँद खलक, होता चंदा के पास फ़लक।। हैं हरि दर्शन के प्यासे हम, मिल जाए उनकी एक झलक। यदि झुग्गी से पूछे
जाड़े का मौसम - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
सबको बहुत लुभाता है जाड़े का मौसम। महल, झोपड़ी, गाँव शहर हो। या फिर दिन के आठ पहर हो।। कभी कभी तो लगता है भाड़े क
न्यायालय की नौकरी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
न्यायालय की नौकरी करके पड़ गए हम झूठे से! मानो बाँध दिया हो कसाई के खूँटे से!!
झाँसी की रानी - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 19 सितम्बर, 2020
पिता का नाम था मोरोपन्त तांबे, व माता थी इनकी भागीरथी बाई। पति नरेश गंगाधर राव नवलकर, मनु से हुई झाँसी रानी लक्ष्मी
अभिनन्दन माँ भारती - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 12 फ़रवरी, 2021
अभिनन्दन है माँ भारती तुम्हारा, जन्म हुआ जो भारत वर्ष हमारा। तुम ही सारे इस जगत की माता, अवतरित हुएँ यहाँ स्वयं विध
सांसारिक आकर्षण - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 26 दिसम्बर, 2015
ज़िन्दगी में, बहुत-सी चीज़ें मिलती हैं ऐसी जो अपने उन्मदित व्यवहार से आकर्षित कर निज-राहों से, सन्यासियों की भाँत
प्रेम की परिकल्पना - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 25 जनवरी, 2022
'प्रेम' शब्द जितना मोहक, अनुभूत व हृदयग्राह्य है उतना ही इसकी अभिव्यक्ति गूढ़, शब्द-सीमा से परे और अधूरी है। प्रेम क
दुनिया का इतिहास पूछता - अटल बिहारी वाजपेयी
  सृजन तिथि :
दुनिया का इतिहास पूछता, रोम कहाँ, यूनान कहाँ? घर-घर में शुभ अग्नि जलाता। वह उन्नत ईरान कहाँ है? दीप बुझे पश्चिमी गगन
आओ मर्दो, नामर्द बनो - अटल बिहारी वाजपेयी
  सृजन तिथि :
आओ मर्दो, नामर्द बनो! मर्दों ने काम बिगाड़ा है मर्दों को गया पछाड़ा है झगड़े-फ़साद की जड़ सारे जड़ से ही गया उखाड़ा है मर
नशा - प्रेमचंद
  सृजन तिथि :
ईश्वरी एक बड़े ज़मींदार का लड़का था और मैं एक ग़रीब क्लर्क का, जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी। हम द
मुक्ति-मार्ग - प्रेमचंद
  सृजन तिथि :
सिपाही को अपनी लाल पगड़ी पर, सुंदरी को अपने गहनों पर और वैद्य को अपने सामने बैठे हुए रोगियों पर जो घमंड होता है, वही क
अतीत - प्रेमचंद
  सृजन तिथि :
अतीत चाहे दु:खद ही क्यों न हो, उसकी स्मृतियाँ मधुर होती हैं।
हमारे राष्ट्रपिता - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 22 अगस्त, 2021
महात्मा गांधी कहलाएँ राष्ट्रपिता हमारे, आत्मशुद्धि शाकाहारी प्रेरणा देने वाले। सादा जीवन व उच्च विचार रखने वाल
ख़ामोशियों की आवाज़ - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 2 अप्रैल, 2019
सच तो यह है कि ख़ामोशियाँ भी बोलती हैं, बस उनकी आवाज़ सुनने वाले कान होने चाहिए। ख़ामोशियों की आवाज़ कानों के बजाय आत्मा
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 25 जनवरी, 2019
भूमंडल में गूँज रही है, ऋषिवर बापू की गाथा। था वह मनुज हिमालय सा, नहीं झुका जिसका माथा। भय का बिलकुल नाम नहीं था, सत
श्रेष्ठ कौन - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 22 अप्रैल, 2001
मानव श्रेष्ठ नहीं है कोई, श्रेष्ठ बनाते हैं गुण-अवगुण। जिसको दस ने श्रेष्ठ है समझा, वह बन जाता उनका झंडा। पर जैसे ह
आदर्श परिवार - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 12 मार्च, 2003
ऐसा एक परिवार हो, सुख दुख का संसार हो। भाई बहन में प्यार जहाँ हो, जन्नत जैसा स्वर्ग वहाँ हो। माता-पिता हो देव की मूर
सरिता और जीवन - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 14 जून, 2004
जीवन एक सरिता है, जिसका अंत भी निश्चित है। कभी उमंगे, कभी तरंगे, कभी रुकाव भी निश्चित है। जीवन एक सरिता है। यह कभी
ईश्वर की महिमा - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 23 मई, 2002
जिसका जग में कोई नहीं, जो सब से अज्ञान। भक्ति के सागर में डूबो, बन जाओगे महान। एक हरि ही तो हैं तेरे, बाक़ी सब अनजान।
गुरु महिमा - अनिल भूषण मिश्र
  सृजन तिथि : 6 जुलाई, 2020
गुरु-शिष्य का है प्यारा नाता, आदि काल से यह सबको भाता। गुरु हैं देते ज्ञान विलक्षण, करते अपने शिष्यों का संरक्षण।
गौ माता - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 19 मई, 2020
यह गाय कहलाती है गौ माता, इतिहास में जिसकी कई गाथा। ख़ुद के बच्चें को भूखा रखकर, पिलाती है जगत को दूध माता।। गाय हमा
बसंत - अनिल भूषण मिश्र
  सृजन तिथि : 31 जनवरी, 2022
हे ऋतुराज प्रकृति भूषण बसंत! तुम लाए धरा पर ख़ुशियाँ अनंत। बागों में अमराई महकी, डालों पर चिड़ियाँ चहकी। सज गया है ध
गणतंत्र दिवस - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 11 जनवरी, 2021
गणतंत्र दिवस का हुआ आगमन, गूँजायमान हुए धरती और गगन। कोहरे की सर्द चादर सिमट गई, बहने लगी सुखमयी बसंती पवन। भारतव
प्रियतम - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 25 जनवरी, 2022
प्रियतम तुम पतंग मैं डोर हूँ, प्रेम पावन मौली का छोर हूँ। नियति प्रदत सम्बन्ध हमारा, हृदयारण्य में विचरित मोर हूँ
ऋतुराज बसंत - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 12 फ़रवरी, 2021
ऋतुराज बसंत पावन पर्व आया, प्रकृति में ख़ुशी व उल्लास छाया। परिमलित शीत बयार संचरित हो, सुप्तस्थ हृदयाग्नि को है भ
युवा शक्ति - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 2 जनवरी, 2021
आह्वान कर युवा शक्ति का स्वदेश ने तुम्हे पुकारा है, भूख ग़रीबी भ्रष्टता मिटाना अब संकल्प तुम्हारा है। अदम्य शक्
नवप्रभात नवचेतना - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 18 मई, 2020
सोमदेव की कृपा से, शीतल भाव विचार। उषाकाल की लालिमा, करे सुखद संसार।। श्रवण मनन चिन्तन सदा, मौन बने नित शक्ति। सम
वधू - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 16 जनवरी, 2022
बड़े चाव से बनी थी दुल्हन, आई पिया के घर आँगन, अपनों को छोड़ बनाने आई थी, ससुराल को अपना प्रांगण। अरमान सब छूट गए पीछे, न
माँ - ब्रजेश कुमार
  सृजन तिथि : 2021
माँ प्यार है, दुलार है, ममता की फुहार है। माँ सहेली है, मित्र है, माँ का प्रेम सबसे पवित्र है। माँ लोरी है, छंद है, सं
दर्द - ब्रजेश कुमार
  सृजन तिथि : 2018
दिल में दर्द भरा है इतना, कोई सहे भी तो सहे कितना। गैर तो ख़ैर गैर ही थे, अपनों ने भी कहाँ समझा अपना। मैं तो अपनों ही स
वह आज भी बच्चा है साहब - जयप्रकाश 'जय बाबू'
  सृजन तिथि : 6 सितम्बर, 2021
वह आज भी बच्चा है, नन्हा सा मासूम सा, वही जिसे कहते है लोग, कोरा सा काग़ज़ सा। मिला मुझे भगवान को, साँचे में ढालते हु
सुभाष एक सितारे थे - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2022
भारत सौंधी माटी में महके, सुभाष एक सितारे थे। आज़ादी आंदोलन चमके, नेताजी एक धुव्रतारे थे।। जिनकी आज़ाद हिंद फ़ौज से,
अकेले हम अकेले तुम - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 29 जनवरी, 2022
हमारे अपने विचार हैं हमारी अपनी सोच है, पर सच यही है कि न हमारा कोई है न हम किसी के हैंं। हम कल भी अकेले थे आज भी अकेल
बाल मज़दूर - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 12 अक्टूबर, 2004
बंद करो यह अत्याचार, बच्चे मिलते नहीं बाज़ार। वो भी एक मानव ही हैं, जिनको देना है अधिकार। बंद करो यह अत्याचार, बच्चे
नई शताब्दी - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 1 जनवरी, 2000
नई शताब्दी का हुआ आगमन, खिल उठा मानव का जीवन। नया उल्लास है, नूतन वर्ष, सारे जग में फैला है हर्ष। प्रवेश हुआ विज्ञा
नया मार्ग - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 20 जून, 2001
कठिन राह के दुर्गम मार्ग पर, जाना है तो जाओ। नई उमंग और नई तरंग, लेकर वापस आओ। अपने ख़ुशी के इस अवसर पर, अतीत के ग़म भू
हे वीणा वादिनी स्वागत बारंबार है - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 2 फ़रवरी, 2022
हम बच्चों को सबसे प्यारा वसंत पंचमी त्यौहार है, हे वीणा वादिनी शारदे मैया स्वागत बारंबार है। निर्मल मन से मूर्ति
ये मिठाइयाँ - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 2 फ़रवरी, 2022
कितनी प्यारी ये मिठाइयाँ, जैसे यौवन की अँगड़ाइयाँ। जैसे बचपन के सहेलियाँ, जैसे नानी की पहेलियाँ। अति सेवन से होती
सरस्वती वन्दना - अनिल भूषण मिश्र
  सृजन तिथि : 3 फ़रवरी, 2022
हे ज्ञानदायिनी बुद्धिदायिनी माँ सरस्वती तुम हो कितनी महान, नहीं कोई कर सकता इसका बखान। त्रिभुवन तुम्हारी आभा से
विश्व प्रसिद्ध अजमेर दरगाह का उर्स - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 2 फ़रवरी, 2022
सारे विश्व में प्रसिद्ध है अजमेर दरगाह का उर्स, देश और विदेशों में सबको होता जिसका हर्ष। स्मार्ट सिटी अजमेर में लग
माँ शारदे को प्रथम नमन - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2019
हम वंदन करते सर्व प्रथम तेरे नाम का, पूजा-पाठ हम करते सरस्वती मात का। आ जाओ मेरे कंठो में मातेश्वरी शारदा, हृदय विर
राम युगों युगों में आते है - मयंक द्विवेदी
  सृजन तिथि : 30 जनवरी, 2022
राम युगों युगों में आते है मर्यादा की बन परिभाषा आदर्शो की बन पराकाष्ठा राम युगो युगो में आते है। पिता के वचन निभा
बसंत एक नज़रिए अनेक - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 2 फ़रवरी, 2020
बसंत का नाम आते ही ज़ेहन में उभरते हैं बसन्त ऋतु के कई चेहरे कई रंग, बस निर्भर करता है लोगों का अलग अलग नज़रिए से मधुमास
सरस्वती वंदना - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 28 जनवरी, 2022
हे वीणा धारिणी देवी! अंधियारा दूर कर दो, मैं हूँ अज्ञानी माता विद्या बुद्धि का वर दो। हे श्वेत वस्त्र धारिणी! मनो
देखो वसंत आया है - ब्रजेश कुमार
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2022
वन-उपवन में फूल खिले, सुगंध लगे बिखराने। मकरंद की चाह लिए, मधुकर लगे मँडराने। भौंरों की मधुर गुंजन ने, सबका मन हर्ष
बसंत - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2 फ़रवरी, 2022
ऋतुराज बसंत जब आता है, संग माँ सरस्वती को लाता है। माघ मास शुक्ल पक्ष को, बसंत पंचमी भी साथ लाता है। माँ धवलधारिणी,
नशा - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 23 अप्रैल, 2002
उठ रहा धुँआ जल रहा परिवार, लेकिन मौन बैठकर देख रहा संसार। क्यों जानकर हम बन जाते अनजान, गुटका, खैनी, मदिरा का करते
करो तैयारी - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 15 अप्रैल, 2005
रात चाँदनी बीत चुकी कठिन राह पर जाना है, गहरे सागर में छिपे मोती का पता लगाना है। जीवन के इस सरगम से संगीत नया बनान
तू सज-धज के नज़र आती हैं - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : नवम्बर, 2020
शफ़क़ की पैरहन ओढ़ें शाम जब मिरे मस्कन आती हैं, सुर्ख़ मनाज़िर में तू दुल्हन बनी सज-धज के नज़र आती हैं। तन्हा रात हैं, शोख़
वर्तमान बहुत बचकाना है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
एक खंडहर जिसमें बना हुआ तहख़ाना है! आस पास की उड़ती ख़बरों ने पहचाना है!! दरवाज़े इतिहासों के पृष्ठ पलटते हैं! अब आँग
पुरवाई कुछ बोल रही है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
पुरवाई कुछ बोल रही है- पछुआ सुनती है! हरियाली ने भरपूर जीवन पाया है! बूँदें बरस रहीं बादलों की माया है!! पावस की श
रोने से भी क्या होगा? - हरदीप बौद्ध
  सृजन तिथि : 14 दिसम्बर, 2021
ग़म हैं आज हज़ारों यारों, पर रोने से भी क्या होगा? करनी हैं गर ख़्वाहिशें पूरी, तो सोने से भी क्या होगा? प्रेम किया है प्
आलोचक - हरदीप बौद्ध
  सृजन तिथि : 20 जनवरी, 2022
सुनो! आलोचकों मेरी ख़ामोशी ही अनगिनत सवालों का जवाब है। तुम करते रहो प्रतिकार मुझे अच्छा लगता है, आपका खीझना व्यव
दया के सागर - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : अप्रैल, 1996
हे दीन-दयालू दया के सागर नाम तेरा सुखदाई है। अपने भक्त जनों की तुमने हर पल लाज बचाई है।। ऋषि, मुनि, सन्यासी, योगी गु
मेरा भारत देश महान - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : जुलाई, 2017
मेरा भारत देश महान, नहीं इससे बढ़िया देश कोई। ये बिल्कुल स्वर्ग समान, नहीं इससे बढ़िया देश कोई।। बात के पक्के, दिल के
शोर चारों ही तरफ़ देख सवालों का है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 2 अक्टूबर, 2021
शोर चारों ही तरफ़ देख सवालों का है, आज दुश्मन ये नया कौन उजालों का है। आग चूल्हों में न हो पेट मगर भर देगा, एक फ़नकार य
श्रद्धांजलि: स्वर कोकिला लता मंगेशकर - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 6 फ़रवरी, 2022
अस्ताचल लतिका लता, सुरभि गीत संसार। देशरत्न सुर कोकिला, भवसागर से पार।। प्रीत गीत संगीत की, सामवेद प्रतिरूप। अवत
श्रद्धांजलि के दो शब्द लताजी की याद में - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 6 फ़रवरी, 2022
सुरों का सजाया अनुपम संसार आपने, हिन्दी साहित्य को दिए कितने ही नगमे। हिन्दी गीत संगीत को मिली आपसे नई पहचान, विश्
भारत रत्न लता मंगेशकर - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 6 फ़रवरी, 2022
स्वर कोकिला और महान थी गायिका, भारत वर्ष की शान ऐसी वो पुण्यात्मा। आवाज़ से बनाई जिसने ऐसी पहचान, गवाह है जिसका धरत
ढूँढ़ता हूँ - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 1 जून, 2017
पल-पल बदलते रिश्तों में, प्यार ढूँढ़ता हूँ। समुन्दर से खारे पानी में, गंगधार ढूँढ़ता हूँ।। दुश्वारियाँ बोझिल सफ़र,
मधुरिम मन के - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 1 जनवरी, 2021
मधुर-मधुर तुम, मधुरिम मन के, आलंबन मेरे जीवन के। तुम्हें देख ही तृप्त हो जाते, प्यासे सपने मेरे नयन के। अधर है तेरे
देखो फिर आया बसंत - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2 फ़रवरी, 2022
देखो फिर आया बसंत सबके मन को हर्षाया बसंत नव कोपलें पनप रही है, फूलों की चादर पसर रही है, महक उठा है जनमन जीवन पुलकि
प्रकृति का क़हर - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 1 फ़रवरी, 2022
प्रकृति ने हमें हर व्यवस्था दी, हमें हर सुख सुविधाएँ दी, हमें रहने खाने जीने के हर साधन उपलब्ध कराए, हमारी हर सुविध
कोशिश कर - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 7 फ़रवरी, 2022
ऐ मनुज! तू आगे बढ़ राहों में बाधा से ना डर लक्ष्य के सफ़र पर चल तुझमें है सफलता पाने का बल चल आगे बढ़ तूफ़ाँ से ना डर जि
फूल और भौंरे - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 4 फ़रवरी, 2022
बाग में खिले फूल, भौंरों को बुला रहा। अपनी रमणीक सौंदर्य से, हम सबको लुभा रहा। अपने रंग-बिरंगे रंग से, बग़ीचे को मन
काश मैं भी एक टेडी बीयर होता - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 5 फ़रवरी, 2022
काश मैं भी एक टेडी बीयर होता साल में एक दिन ही सही मगर सब का डियर होता, सब देते मुझे अपने दिल में जगह सबको मुझे खोने क
काश मैं भी एक गुलाब होता - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 5 फ़रवरी, 2022
काश मैं भी एक गुलाब होता तो उनके दिल की सल्तनत का नवाब होता, महका देता उनके मन का कोना-कोना इस गुलाब की तरह मैं भी ला
हे कृष्णा साँवरे - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 26 मई, 2020
प्यारे तू सब जानता है, प्यारे तू सब देखता है। तूने तक़दीर लिखी है, मेरी इसमें क्या ख़ता है। मैंने तो वो ही किया है, तू
चले गुलेल - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
हो गया है थाने का अपराधी से मेल। उजाले का ख़ून हो गया। पहरुए अफ़लातून हो गया।। जीवन लगता है मानो शतरंज का खेल। क
हुई दफ़्तर में बंदरबाँट - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
अफ़सर-बाबू में साँट-गाँठ! योजनाएँ सब हैं लंबित! बदअमली महिमा मंडित!! उन्हें बुके है हमको डाँट! सबसे बड़ा रुपैया
स्वागत ऋतुराज का - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
कर रहा माघ स्वागत- ॠतुराज का। टेसू, सेमल, गुलमोहर। होता है लुब्ध हर बशर।। कोयल बाँचे समाचार- आज का। आम्रकुंज ह
अपने महबूब से आज इज़हार करना है - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 7 फ़रवरी, 2022
लेकर आया हूँ अँगूठी और गुलाब उनके लिए, उनके क़दमों में झुक कर उनसे इज़हार करना है। चाहत नहीं मुझे अब किसी चीज़ की बस उ
अनन्त ज्ञान का भण्डार शिक्षक - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 12 मई, 2020
शिक्षक वही है जो सदमार्ग का रास्ता दिखाएँ, अँधकार से उभारे व ज्ञान का प्रकाश दिखाएँ। उसके मनमस्तिष्क में ज्ञान की
संघर्ष - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 11 फ़रवरी, 2022
जलते रहे ज़लज़ले में भी, खरे उतरे संघर्षों की शमशीर पर, तूफ़ान से भी न घबराए, टिके रहे तटस्थ यथार्थ की ज़मीन पर। सूरज के उ
पुस्तक - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 6 जनवरी, 2021
जिसने हमें बचपन में काकाहारा सिखाया, ईकाई-दहाई पढ़ाया, अक्षर ज्ञान कराया। जिससे ज्ञानार्जन कर रोज़गार था पाया, जीव
गुलों की छाँव - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
बाग में पड़ रहे हैं तितली के पाँव! फूलों में हैं ख़ुशबुएँ आकर बसी! बबूल की है बाग से रस्साकसी!! तैरता है हवा में स
मौसम अनमना - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
पूष को सूर्य किरण रही है बुहार! जाड़े में हैं जम गईं रातें! कंबल ऊनी शाल के नाते! बाग़ में मँडराते अलि की गुहार!
पुलवामा के अमर शहीद - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 14 फ़रवरी, 2021
पुलवामा के अमर शहीदों, तुमको भुला नहीं सकते। त्याग और बलिदान तुम्हारा, उसको भुला नहीं सकते। वैलेंटाइन डे के दिन
फूल मुस्कुराते हैं - डॉ॰ कुमार विनोद
  सृजन तिथि : अक्टूबर, 2021
मुस्कुराने के लिए ज़रूरी नहीं पूरी तरह विज्ञापन में उतर जाना इन्सान के लिए तनाव रहित मस्तिष्क और पेट में अनाज का
हम इनसान हैं... - मंगलेश डबराल
  सृजन तिथि :
हम इनसान हैं, मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सचाई बची रहे।
सोने से पहले - मंगलेश डबराल
  सृजन तिथि :
सोने से पहले मैं सुबह के अख़बार समेटता हूँ दिन भर की सुर्ख़ियाँ परे खिसका देता हूँ मैं अत्याचारी तारीख़ों और हत्
प्रभाती - रामधारी सिंह 'दिनकर'
  सृजन तिथि :
रे प्रवासी, जाग, तेरे देश का संवाद आया। (1) भेदमय संदेश सुन पुलकित खगों ने चंचु खोली; प्रेम से झुक-झुक प्रणति में प
संत रविदास जी - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 13 फ़रवरी, 2022
माघ मास की पूर्णिमा को रविवार के दिन जन्में प्रसिद्ध प्रमुख संतों में एक संत रविदास जी का जन्म काल विभिन्न विद्वान
मस्जिद सों कुछ घिन नहीं - रैदास
  सृजन तिथि :
मस्जिद सों कुछ घिन नहीं, मंदिर सों नहीं पिआर। दोए मंह अल्लाह राम नहीं, कहै रैदास चमार।।
रैदास प्रेम नहिं छिप सकई - रैदास
  सृजन तिथि :
रैदास प्रेम नहिं छिप सकई, लाख छिपाए कोय।। प्रेम न मुख खोलै कभऊँ, नैन देत हैं रोय।।
जनम जात मत पूछिए - रैदास
  सृजन तिथि :
जनम जात मत पूछिए, का जात अरू पात। रैदास पूत सब प्रभु के, कोए नहिं जात कुजात।।
ब्राह्मन कोय न होय - रैदास
  सृजन तिथि :
ऊँचे कुल के कारणै, ब्राह्मन कोय न होय। जउ जानहि ब्रह्म आत्मा, रैदास कहि ब्राह्मन सोय।।
पीआ राम रसु पीआ रे - रैदास
  सृजन तिथि :
पीआ राम रसु पीआ रे। (टेक) भरि भरि देवै सुरति कलाली, दरिआ दरिआ पीना रे। पीवतु पीवतु आपा जग भूला, हरि रस मांहि बौराना र
अब कैसे छुटै राम रट लागी - रैदास
  सृजन तिथि :
अब कैसे छुटै राम रट लागी। (टेक) प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग−अंग बास समानी। प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चि
प्रेम पंथ की पालकी - रैदास
  सृजन तिथि :
प्रेम पंथ की पालकी, रैदास बैठियो आय। सांचे सामी मिलन कूं, आनंद कह्यो न जाय।।
रैदास हमारौ राम जी - रैदास
  सृजन तिथि :
रैदास हमारौ राम जी, दशरथ करि सुत नाहिं। राम हमउ मांहि रहयो, बिसब कुटंबह माहिं।।
रैदास सोई सूरा भला - रैदास
  सृजन तिथि :
रैदास सोई सूरा भला, जो लरै धरम के हेत। अंग−अंग कटि भुंइ गिरै, तउ न छाड़ै खेत।।
संत शिरोमणि रविदास महाराज - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 6 फ़रवरी, 2022
सन्त शिरोमणि कहलाएँ महाराज रविदास, कोने-कोने में जानें जाते रविदा नाम रैदास। रोहिदास रेमदास रुइदास रौदास रायादा
संत रविदास - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 27 फ़रवरी, 2021
माघ पूर्णिमासी का बना दिन ख़ास, माँ कलसा पिता थे श्री संतोख दास। काशी नगर में चँहु ओर दिव्य प्रकाश, माँ कलसा के घर जन
आदमी लगने लगा है कोई हौआ - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
मंडराते खतरे ज्यों चील औ कौआ! कतर ब्योंत है आपसदारी में! पूरे मौक़े हैं रंगदारी में!! ज़हरीले नाते हैं मानो अकौआ!
फलीभूत होती आशाएँ - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
कृष्ण पक्ष का, शुक्ल पक्ष है। फलीभूत होती आशाएँ। निष्फल होती हैं कुंठाएँ।। खुला झरोखा, वही कक्ष है। भाग्य हुआ
उम्मीद पर करने लगी संवेदना हस्ताक्षर - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
उम्मीद पर करने लगी संवेदना हस्ताक्षर। हैं ख़्वाब आँखों के पखेरू हो गए। विश्वास के पर्वत सुमेरू हो गए।। आशा अँगू
कालिख अँधेरों की - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 12 फ़रवरी, 2022
चेहरे पर रातों के कालिख अँधेरों की। आँगन में उतरे हैं धूप के पखेरू। उम्र ढली उड़ जाते रूप के पखेरू।। आई याद मेड़
माँ का प्यार - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 15 अप्रैल, 2002
रात भर जाग कर सुलाया है मुझे,