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अंधविश्वास अखबार अधिकार अपराध अनमोल अब्दुल कलाम अभिलाषा अरमान अवसाद असफलता अहंकार


आँख आँसू आईना आकाश आत्मनिर्भर आत्महत्या आदत आदमी आधुनिकता आंनद आयु आवाज़


इंसान इंसानियत इश्क़


ईद ईश्वर


उद्देश्य उम्मीद उम्र


"ऊ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



एकता


"ऐ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"ओ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"औ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



क़ब्र कमजोरी कर्म कलम कवि काँटा कामना कामयाब कारगिल विजय दिवस किताब किसान किस्मत कुदरत कृष्ण जन्माष्टमी


ख़ामोशी खुशबू खुशी खेल ख़्याल ख़्वाब


ग़म गरीब गाँधी जयंती गाँव गुरु पूर्णिमा गैर


घर


चन्द्रशेखर आजाद चाँद चाय चाहत चिंता चुनाव चुनौती चूड़ियाँ चेहरा चैन


छठ पर्व छाँव


जनता जमाना जमीन जल जवानी जान जानकारी ज़िंदगी जीवन


"झ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"ट" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"ठ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



डर डोली


"ढ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



तन्हा तारा तिरंगा तीज तीर्थ तुलसीदास


"थ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



दर्द दान दिल दिवाली दीया दीवाना दुःख दुर्घटना दुश्मन दुश्मनी दुष्कर्म दूर देर देश देशभक्ति दोस्ती दौर


धन धनतेरस धरती धूप धैर्य


नज़र नफ़रत नव वर्ष नवरात्रि नाग पंचमी नारी नास्तिक निर्णय निंद न्याय


पक्षी पत्थर परछाई परवाह परिवर्तन परिवार पर्यावरण पशु पहचान पास पिता पितृ पक्ष पूजा पूर्णिमा पृथ्वी पेड़ पौधे प्यार प्रकृति प्रतीक्षा प्रार्थना प्रिय प्रेम प्रेमचंद प्रेरक


फरिश्ता फूल फौजी


बचपन बच्चे बहन बाघ बात बाबा साहब बारिश बुद्ध पूर्णिमा बूढ़ी बेटी बेरोजगारी बेवफ़ाई


भक्ति भगवान भगवान कृष्ण भगवान गणेश भगवान बुद्ध भगवान राम भगवान विश्वकर्मा भगवान शिव भगवान हनुमान भाई भाग्य भारत भावना भूख भूल भोजन भोर भ्रूण हत्या


मंज़िल मजदूर मजाक मधुशाला मन मर्यादा मसीहा महत्व महबूबा महान माँ माँ काली माँ दुर्गा माता पिता मानव मानवता मालिक मिट्टी मुलाकात मुस्कान मुसाफिर मृत्यु मोहब्बत मौत मौन मौसम


यात्रा याद युवा योग योगदान


रंग रक्षा बंधन राज राजनीति राजा राधा कृष्ण रावण राष्ट्र रिश्ता रोटी


लड़की लफ़्ज़ लम्हा लहू लेखक लॉकडाउन लोग


वक़्त वतन वफ़ा विजय विदा विश्वास वृक्ष वृद्ध व्यथा व्यर्थ व्यवहार


शक्ति शब्द शरद पूर्णिमा शरद ऋतु शराब शहीद शांति शान शिक्षक शिक्षा शिष्टाचार शोक श्रद्धांजलि श्रम श्राद्ध श्रृंगार


संकल्प संघर्ष संस्कार संस्कृत भाषा संस्कृति सत्य सपना सफर सफलता समय समस्या समाज समाधान सरकार सलाम सवेरा साजन साथ सादगी सावन साहस साहित्य सिनेमा सिपाही सीख सुख सुख दुःख सुखी सुरक्षा सुविचार सूरज सृष्टि सेवा सैनिक सोशल मीडिया सौतेला सौदा स्त्री स्वच्छता स्वतंत्रता स्वतंत्रता दिवस स्वदेशी स्वस्थ स्वास्थ्य


हत्या हमसफर हाथी हिंदी भाषा हृदय हैवानियत

क्ष

"क्ष" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।


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"त्र" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।


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ज्ञान
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विधा/विषय " - "

एकान्त - नमन शुक्ला 'नया'
  सृजन तिथि : 17 अप्रैल, 2021
जूठनें ना उठाई, न जूठा पिया। इसलिए दूर संसार ने कर दिया। मोह, संकोच, सम्बन्ध सब त्यागकर, आत्म सन्तोषवश सत्य ही कह सक
पुरुष होना कहाँ आसान है - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 2021
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो, मगर पुरुष होना कहाँ आसान है! पुरुष के सिर पर है ज़िम्मेदारी सारी, पत्नी मेरा हक़ है तुम
विरह गाते हो - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2021
जब मन होता है आते हो। जब जी चाहे तब जाते हो।। आते जाते बिना बताए, हमको अक्सर चौंकाते हो। या तो तुम मनमौजी हो जी, या
निरपेक्ष - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2021
अब क्या लिखा है पत्र में तेरी मैम ने? ओह! पत्र नहीं मैसेज में? पत्रों के ज़माने अब कहाँ रहे! मैसेज आते-जाते हैं अब तो मोब
इसका पैमाना क्या होता है - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2021
सब की नज़रों से गिर जाना क्या होता है। बोलो गिरकर फिर उठ पाना क्या होता है।। कैसे कहा गिरा कोई सबकी नज़रों से, कहो ज़र
जो धरती पर थे - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2021
जो धरती पर थे अब भी हैं धरती पर ही, उनसे सीखो क़दम जमाना क्या होता है।
धब्बे - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2021
मेरी दैवीय (मोटी सी) दैहिक संरचना को देख-देख कर कब मेरी बहन ने मुझे 'गोलू' और गोलू से 'गुल्लड़' की उपाधि से विभूषित कर डा
नारी शक्ति: आदिशक्ति - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2021
आदिशक्ति जगत जननी का इस धरा पर जीवित स्वरूप हैं हमारी माँ, बहन, बेटियाँ हमारी नारी शक्तियाँ। जन्म से मृत्यु तक कि
कम बोलें, मीठा बोलें - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2021
एक आम कहावत है कि अधिकता हर चीज़ की नुकसान करती है, फिर भला अधिक बोलना इससे अछूता कैसे रह सकता है। हम सबको अपने आप की व
छुटकी - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2021
दिसंबर 2020 के आखिरी दिनों की बात है। सुबह सुबह एक फोन कॉल आता है। नाम से थोड़ा परिचित ज़रूर लगा, परंतु कभी बातचीत नहीं ह
वतन से जुड़ो - नमन शुक्ला 'नया'
  सृजन तिथि : 9 जनवरी, 2021
आज तक तुम जिए हो, कलह-स्वार्थ में, अब तनिक राष्ट्र के संगठन से जुड़ो। जाति, भाषा, धरम, प्रान्त सब भूल कर, हिन्द की पूज्
जय जवान जय किसान - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : 2021
भारत माँ के पूत महान, जय हो जवान और किसान। एक देश की रक्षा करता, एक पेट देश का भरता। इनसे ज़िंदा है हिंदुस्तान, जय हो
फूलों सा तुम खिलते रहना - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : 2021
नेकी के रास्ते पर चलते रहना, प्यार से आगे बढ़ते रहना। सफलता रुक नहीं सकती, मेहनत तुम करते रहना। राहों में हैं काँ
बड़ा झमेला है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2021
गाँव लगे हैं ठीक शहर में- बड़ा झमेला है। दरका-दरका लग रहा आकाश। है चुभ रहा काँटों सा भुजपाश।। तारे तो हैं मगर स्
दो बातों को सहना सीखो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2021
दो बातों को सहना सीखो। औ नदिया सा बहना सीखो।। कोई शख़्स गले पड़ जाए, बेबाकी से कहना सीखो। आलीशान महल दे डाला, इन मह
सख़्त शहर नहीं क़बीले हैं - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2021
सख़्त शहर नहीं क़बीले हैं। हरकत से ढीले-ढीले हैं।। लगे हुए जो घर के सम्मुख, कनेर वे पीले-पीले हैं। बादाम-दशहरी या चौ
चिड़िया - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 2021
एक चिड़िया चमन में चहकने लगी, जनक अँगना बहारें महकने लगी। काँध बेटी चढ़े पग चले पग धरे, तात की लाड़ली ख़्वाब पूरे कर
मरहम - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 2021
ज़ख़्म बहुत गहरे हैं उनके, हर आँख यहाँ भीगी है। किस किसके आँसू पोछेंगे, मानवता ही ज़ख़्मी है।। मरहम ही कम पड़ जाएगा, तन
हिना - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 2021
मेंहदी हाथ में झिलमिलाए सदा। संग ख़ुशियाँ सुता की सुनाए सदा।। पत्तियाँ बाग़ से तोड़ के लाड़ली, हस्त प्रिय प्रेम दु
शिवशरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' - विमल कुमार 'प्रभाकर'
  सृजन तिथि : 18 अप्रैल, 2021
हिन्दी साहित्य के सुविख्यात वरिष्ठ कवि, लेखक, आलोचक, सुधी सम्पादक शिवशरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' समकालीन साहित्य में
सौन्दर्यस्थली कालाकाँकर - विमल कुमार 'प्रभाकर'
  सृजन तिथि : 2 मई, 2021
प्राकृतिक सौन्दर्य की सुरम्यस्थली कालाकाँकर में मैंने अपने जीवन के सुखद दो वर्ष बिताएँ हैं। मैं बी.एच.यू से कालाक
विश्वास - सैयद इंतज़ार अहमद
  सृजन तिथि : 2021
मंज़िल इतनी भी दूर नहीं, कि ख़ुद चल कर, उसे पा न सके, हालात हमारे, इतने न विकट कि अपनों को आज़मा न सके। थोड़ी कोशिश बस बाकी
नसीहत - सैयद इंतज़ार अहमद
  सृजन तिथि : 2021
दूसरों को दोष मत दो, अपनी कारदानियों का। ख़ुद से उपजाई, बे-तुकी परेशानियों का।। तुम ही तो ज़िम्मेदार हो अपनी विफलता
मध्यम वर्ग - सैयद इंतज़ार अहमद
  सृजन तिथि : 2021
संघर्ष करते रहो, कयोंकि तुम मध्यम वर्ग हो, तुम किसके काम के हो, जो कोई तुमको सहारा देगा। तुम में से आगे निकल चुके, ज
तुम्हारी कमी - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 2021
राधिके! आज तुम्हारी कमी, महसूस हो रही है मन को। लगता कोई नहीं है मेरा, तुम्हारे सिवा। कभी डाँटना तो सुन लेती चुपचा
जब यादें उनकी आती - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 2021
जब यादें उनकी आती, आँखें-आँसू भर लाती। थी जब साथ वो मेरे, रहता दुःख अधिक घनेरे। आँखों में सपनें उनके, लेकर ख़ुशियाँ
फागुन में - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 2021
उनकी यादें सताने लगे फागुन में। कोयलिया कूकी डारी पे लगा मुझे तुम बुला रही हो। बंशी सी माधुरी सूरों में सरगम डोर ब
यही सोचता हूँ - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 1980
लिखूँगा तुम पे ग़ज़ल, हर रात यही सोचता हूँ। बनेगी या नहीं कोई बात यही सोचता हूँ।। तुमसे कुछ कह ना सका इसका मलाल है मुझ
यही सच है - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 2021
यही सच है, कि- ज़िन्दगी है तो मौत भी होगी। फिर, मौत से डरना कैसा? बावजूद, हमने देखा है हर शख़्स को ताकते हुए दूर कहीं श
आँखों में आँसू होठों पे नग़्मा - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 2021
आँखों में आँसू होठों पे नग़्मा दिल में उदासी, होगी क्या इससे बुरी हालात यही सोचता हूँ।
सौतेला - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2021
माँ को रोता देख रवि परेशान सा हो गया। पास में बैठे गुम-सुम बड़े भाई से पूछा तो माँ फट पड़ी। उससे क्या पूछता है? मैं ही बत
जीवन में हर व्यक्ति को... - विमल कुमार 'प्रभाकर'
  सृजन तिथि : 2020
जीवन में हर व्यक्ति को अपना कीर्तिमान स्थापित करना पड़ता है। जीवन में परिश्रम ख़ूब करना चाहिए इससे जीवन निखरता है
पुनः धर्मयुद्ध - मनोज यादव 'विमल'
  सृजन तिथि : 2018
बस काल-काल में अंतर है, और समय में थोड़ा परिवर्तन है। नही तो द्युत सभा तो आज भी जारी, और सत्ता का भरपूर समर्थन है। धृ
ख़्वाहिश है बोलता ही रहूँ - मनोज यादव 'विमल'
  सृजन तिथि : 2020
ख़्वाहिश है बोलता ही रहूँ। वहाँ तक, जहाँ तक धरती दम तोड़ती हो। वहाँ तक, जहाँ तक आकाश का किनारा हो। वहाँ तक, जहाँ तक किस
प्रेयसी का ख़त - मनोज यादव 'विमल'
  सृजन तिथि : 2020
बंद लिफ़ाफ़े में आया, मेरी प्रेयसी का ख़त छुपते-छुपाते आया, मेरी प्रेयसी का ख़त। लिफ़ाफ़े की कोर-कोर कुंद हो गई थी लगता ह
महँगाई - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 2021
गैस सिलेंडर महँगा क्या हुआ, बस्ती का हर चूल्हा अब सुर्ख़-ओ-राख़ हुआ। माँओं ने बड़ी कुशलता से सीख लिया था गैस चूल्हा चल
मेरा मुस्तक़बिल नज़र आता हैं - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 2021
सुनकर ये मधुर धक-धक की आवाज़ ये सच मन में जागा है, हो न हो दिल रुपी सरिता में तेरे नाम का कंकड़ तसव्वुर ने फेंका है। तुम
तन्हाई को लगी हैं उम्र तो लगने दें - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : जुलाई, 2020
तन्हाई को लगी हैं उम्र तो लगने दें, ज़िंदा रहना हैं तो घर पर रहने दें। जिसने बेचा हैं ईमान दूकानदारी में, लानतें आएग
संघर्ष सफलता की कुंजी है - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 2020
संघर्ष एक ऐसा अनुभव है, जो जीवन में आने वाली हर एक पड़ाव को पार करने के लिए एक मूल्यवान अस्त्र के तरह हमारे सामने आ खड
स्त्री तू ही क्यों? - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 15 जनवरी, 2021
स्त्री तू ही क्यों अपने शब्दों को मिटाकर अपने ही एहसास को मन में ही मार देती है...! स्त्री तू ही क्यों अपने भीतर की श
मज़दूर की क़िस्मत - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 2021
ऊँचे कँगूरे किलों में, मीनार और महलों में, अपना ख़ून पसीना लगाता हूँ। संगमरमर से सुंदर दीवार सजाता हूँ।। शाम को चटन
टेक्नोलॉजी और शिक्षा - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 2021
प्रौद्योगिकी विषय अंग्रेजी में टेक्नोलॉजी के नाम से जाना जाता है। यह एक ग्रीक शब्द "टेकनॉलाजिया" से लिया गया है जह
मेरी प्रिय - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 2021
तुझको ना देखूँ तो मन घबराता है, तुझ से बातें करके दिल बहल जाता है। मेरा खाना पानी भूल जाना, तुझे भूखी देखकर तुरंत खा
प्रेम की फ़सल - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
वक़्त के साथ सोहन भी बड़ा हो रहा था, जिस क़बीले में वो रहता था। वहाँ अक्सर लड़ाई-झगड़ा, गाली-गलौज लोग एक दूसरे को बिल्कुल न
शाम ढले घर का रस्ता देख रहे थे - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 2021
शाम ढले घर का रस्ता देख रहे थे। कुछ क़ैद परिन्दे पिंजरा देख रहे थे।। सब बच्चे देख रहे थे खेल खिलौने, और मियाँ हामिद
कोरोना योद्धाओं को सलाम - संस्कृती शाबा गावकर
  सृजन तिथि : सितम्बर, 2020
कोरोना वैश्विक महामारी ने अब तक पूरी दुनिया को अपने चपेट में ले लिया है। दुनिया भर में इस वाइरस की वजह से संक्रमण तथ
शिक्षित बेरोज़गारी की समस्या - संस्कृती शाबा गावकर
  सृजन तिथि : मई, 2021
"तड़प रही है भूखी जनता, विकल मनुजता सारी। भटक रहे है नवयुवक देश के, लिए उपाधियाँ भारी॥ काम नहीं, हो रहे निकम्मे, भारत क
उसकी अब रहबरी हो गई है - दिलशेर 'दिल'
  सृजन तिथि : 2021
उसकी अब रहबरी हो गई है। ज़ीस्त आसान सी हो गई है।। हर तरफ़ रोशनी हो गई है, शायरी जब मिरि हो गई है। अब अकेले नहीं चल सकू
उसकी अब रहबरी हो गई है - दिलशेर 'दिल'
  सृजन तिथि : 2021
उसकी अब रहबरी हो गई है। ज़ीस्त आसान सी हो गई है।।
रोशनदान - मनोज यादव 'विमल'
  सृजन तिथि : 2020
खुली किताब से धूल झाड़ लो तो पूछो, नई सुबह का आग़ाज़ देख लो तो पूछो। कहीं कुछ भूल तो नही गए हो घबराहट में तुम, ज़रा भूल को
आओ मिल कर पेड़ लगाएँ - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 2021
आओं सभी मिल कर पेड़ लगाएँ, पर्यावरण को साफ़ स्वच्छ बनाएँ। पेड़ो से ही मिलती है ऑक्सीजन, जिससे जीवित है जीव और जन।।
संविदा शिक्षक का दर्द - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 1 फ़रवरी, 2014
मास्टर साहब हमारा बक़ाया कब दोगे? भाई दे दूँगा तनख्वाह आने दो। अगर आप हमारे मुन्ने को कुछ दिन पढ़ाये ना होते तो कसम स
बस यही कहानी है - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 2021
पापा की परियों की बस यही कहानी है, आँखो मे है सपने और थोड़ा सा पानी है। जुनून है हौसला है आगे बढ़ने के लिए, इस लिए सब
कहानी नहीं हैं - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 2021
माना कि मुझमें अभी वो रवानी नहीं हैं, लेखनी निखार दे वो कहानी नहीं हैं। कोशिश भी ना करूँ गिर कर उठने की, इतनी कमज़ोर
इश्क़ से गर यूँ डर गए होते - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 5 अप्रैल, 2021
इश्क़ से गर यूँ डर गए होते। छोड़ कर यह शहर गए होते।। मिल गए हमसफ़र से हम वर्ना, आज तन्हा किधर गए होते। होश है इश्क़ में
सौंदर्य - सतीश मापतपुरी
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
तुम खुले केश छत पे ना आया करो, शब के धोखे में चँदा उतर आएगा। बेसबब दाँत से होंठ काटो नहीं, क्या पता कौन बे-वक़्त मर जाए
मन - रमेश चंद्र बाजपेयी
  सृजन तिथि : 2020
मन से उत्पन्न हुए कई विकार मन से बनी कितनी ही बातें, मन ही देता है अभिव्यक्ति जिसने दी कल्पना की सौग़ातें मन के लड्
संघर्ष - सलिल सरोज
  सृजन तिथि : 2020
जीवन की शुरुआत के बारे में कोई निर्णायक सबूत नहीं है। हमने अनुमान और शोध किए हैं। हम सच्चाई के बहुत क़रीब आ गए हैं, या
हे जगत जननी! तुझे प्रणाम - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 2021
गोद में बालक है, कर में बालटी, या सर में डलिया खाद गोबर, या है गट्ठा लकड़िया या घास भारी, सर पे इतना बोझ, उसके रोज़ है। प
जाने क्यों लोग - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 2021
जाने क्यों लोग राह से यों, भटक जाते हैं। जाने क्यों लोग...।। दर्द सह लेते हैं, दवा नहीं लेते हैं। दर्द सस्ता, दवा को म
जलना उचित है - दीपक राही
  सृजन तिथि : मई, 2021
उन सब धारणाओं का, जलना उचित है, जो करती है भेद, मनुष्य का मनुष्य से। मेरा जलना उचित नहीं, उन सब विचारों का, जलना उ
जवानी - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : मई, 2021
हँसाए जवानी रुलाए जवानी। अजी रंग कितने दिखाए जवानी।। मिले मुश्किलें ज़िंदगी में हमेशा, कि हर मोड़ पर आज़माए जवानी।
माँ कात्यायनी वन्दना - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
हे! मात! नत मस्तक नमन नित, वन्दना कात्यायनी। अवसाद सारे नष्ट कर हे, मात! मोक्ष प्रदायनी। हे! सौम्य रूपा चन्द्र वदनी,
शारदे वन्दना - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
तुम्हें कर जोड़कर माँ शारदे प्रणाम करता हूँ। हमें सुरताल दो माता तुम्हारा ध्यान करता हूँ। मिटाकर द्वेष माँ मेरे ह
माँ अम्बे स्तुति - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 25 मार्च, 2021
नमामि मातु अम्बिके त्रिलोक लोक वासिनी! विशाल चक्षु मोहिनी पिशाच वंश नाशिनी!! समस्त कष्ट हारिणी सदा विभूति कारिणी!
गणेश वंदना - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
पधारो देव शिवनंदन। करूँ मैं आपका वन्दन। न पूजा पाठ पूरा है। तुम्हारे बिन अधूरा है। प्रथम तुम पूज्य प्रथमेश्वर।
अवध में जन्मे हैं श्रीराम - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 15 अप्रैल, 2021
हुए सब हर्षित हैं पुर ग्राम। अवध में जन्मे हैं श्रीराम। बज रहे ढोल नगाड़े साज। छा गईं घर घर ख़ुशियाँ आज। मचा है चहुँ
कृष्ण वन्दन - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 25 अप्रैल, 2021
जय मोहन माधव श्याम हरे। मधुसूदन रूप ललाम धरे।। धर ध्यान करूँ विनती मन से। अँधियार मिटे इस जीवन से।। प्रभु निर्मल
आवारा परदेशी - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : जून, 2021
मै आवारा परदेशी हूँ, मेरा नही ठिकाना रे, ओ मृग नयनों वाली सुन ले, मुझसे दिल न लगाना रे। जब तीर नज़र का किसी जिगर को पा
क्या तुम मेरे हो - प्रवीण श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
सर्वस्व त्याग किया मैंने, प्रेम भी, दुख भी, और वह अहसास भी जो कभी मन में था कि तुम मेरे हो, तुम मेरे हो। जीवन मे तुम्ह
आशा दीप - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : मई, 2021
आओ आशा दीप जलाएँ। अंधकार का नाम मिटाएँ।। फूलों से महकें महकाएँ, दुखियारों के दुःख मिटाएँ। रूह जलाकर ज़िंदा रहना,
सदा सुखी रहो बेटा - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : जून, 2021
रिटायर्ड इनकम टैक्स ऑफिसर कृष्ण नारायण पांडे आज अपनी आलीशान कोठी में बहुत मायूसी महसूस कर रहे थे, क्योंकि उनकी दो
जगत जननी दुर्गमा - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2020
हे! माँ जगत जननी दुर्गमा, अब विश्व का कल्याण कर दे। हम सभी तो शिशु तुम्हारे, प्यार का आँचल प्रहर दे। हे! दयामयि हे!
समर्पण - अभिषेक अजनबी
  सृजन तिथि : 2021
हम बुलाते रहे, वह भूलाते रहे। इश्क़ में ख़ूब जलते जलाते रहे।। वह हमें छोड़ करके चले ही गए, हम उन्हें आज तक गुनगुनाते
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 10 अप्रैल, 2021
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम। बनो तो मिरी शोअरा तुम।। ये सोना ये चाँदी ये हीरा, है खोटा मगर हो खरा तुम। तिरा ज़िक्र हर बज़
नज़ारे - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 20 मार्च, 2021
देखते ही खूबसूरत नज़ारे... एक चित्रकार उतार लेता है नज़ारों को कैनवास पर, एक फ़ोटोग्राफ़र क़ैद कर लेता है उन नज़ारों को कै
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 10 अप्रैल, 2021
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम, बनो तो मिरी शोअरा तुम।
आबादी अवसर या अवसाद - परमजीत कुमार चौधरी 'सोनू'
  सृजन तिथि : 11 जुलाई, 2021
आज जनसंख्या दिवस है यानी 11 जुलाई 2021। आज के दिन में ही उत्तर प्रदेश की सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण क़ानून की ड्राफ्ट पे
सतत विकास में कहाँ हैं हमारा समाज? - परमजीत कुमार चौधरी 'सोनू'
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
हमारा देश और समाज निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर है और हमने काफी सारे उपलब्धियां भी हासिल की है। परंतु क्या हमारा समा
क्या क्या देखा - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : मार्च, 2021
बदला इंसान नही, हटा उसका मुखौटा देखा। मैने तो बदलते ज़ुबान अरु, पलटते इंसान को देखा।। भाई-भाई में जंग लड़ते देखा, प
कोख का बँटवारा - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : जून, 2021
रामनारायण के दो बेटों का नाम रमेश और सुरेश है। युवा अवस्था में रामनारायण के मृत्यु होने के बाद उनकी पत्नी रमादेवी
कमी हैं एक दोस्त की - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 23 अप्रैल, 2021
जो बिन कहे, मेरा हाल समझ ले! ख़ुद तो पागल हो, मुझे भी पागल कर दे! अल्फ़ाज़ कम, ख़मोशी ज़्यादा समझे! उदासी में भी हँसा दे,
मिलेगी एक दिन मंज़िल - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : जून, 2021
मिलेगी एक दिन मंज़िल अभी यह आस बाक़ी है। अजी मकसद अभी तो ज़िंदगी का ख़ास बाक़ी है।। रहेगा कुछ दिवस पतझड़ उसे हँस कर गुज़ार
तन पर यौवन - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 2020
ओ रे बचपन! फिर से सच बन। मायूसी में, ख़ामोशी में, चिंताओं में, दुविधाओं में, निर्धनता में, नीरसता में, पीर भुलाकर कर
मिलेगी एक दिन मंज़िल - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : जून, 2021
मिलेगी एक दिन मंज़िल अभी यह आस बाक़ी है। अजी मक़सद अभी तो ज़िंदगी का ख़ास बाक़ी है।।
उपहार - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : मार्च, 2021
हमें जो मिला है ये मानव शरीर इस पर गर्व कीजिए, इसे ईश्वर से मिला ख़ूबसूरत उपहार समझिए। उपहार मिलने पर जैसे हम नाचत
ख़ुद का निर्माण करें - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
मानव जीवन अनमोल है, इस बात से इंकार कोई नहीं करता। परंतु यह भी विडंबना ही है कि ईश्वर अंश रुपी शरीर का हम उतना मान सम्
बात बिगड़ गई बात बताने में - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 20 अप्रैल, 2021
बात बिगड़ गई बात बताने में, यार हिचकते हाथ मिलाने में। चौकीदार चुरा ले गया जेबर, लोग बिजी थे फूल लगाने में। देखी दु
मुझे सब याद है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 17 जनवरी, 2021
मुझे सब याद है! तपती ज़िन्दगी की उदास दोपहर में; तुम गुलाब की सुगंध की तरह; मेरी हृदय में समाई थी। अपने अलकों को बिख
हारना हमको नहीं गवारा - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
जिगर में हमारे आग हम रखते, बाँधे है कफ़न काल से न डरते। दहाड़ मारकर शिकार है करते, शेरों बीच रहे किसी से न डरते।। कठि
अपनी ज़िम्मेदारी समझो - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 24 अप्रैल, 2021
अपनी ज़िम्मेदारी समझो, आदतें छोड़ क्यों नही देते,  समाज की धारा में बहो, बेइज़्ज़ती छोड क्यों नहीं देते। रात को लौटते
माँ की ममता - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 26 फ़रवरी, 2021
माँ की ममता जगत निराली, माँ के बिन सब खाली-खाली। अजब निराली छाया है, माँ का हाथ हो सिर पर जिसके, अनहोनी सब दूर को खिस
जलता जाए दीप हमारा - अनिल मिश्र प्रहरी
  सृजन तिथि : 2020
मिट्टी के दीपों में भरकर तेल-तरल और बाती, तिमिर-तोम को दूर भगाने को लौ हो लहराती। मिट जाए भू का अँधियारा, जलता जाए
ह्यूमर उर्फ़ हास्य - अमृत 'शिवोहम्'
  सृजन तिथि : 30 दिसम्बर, 2020
ह्यूमर; जी हाँ यही वह शब्द है जो सदा से प्रचलन में तो है, मगर जिसके बारे में अभी तक ज़्यादा लिखा नहीं गया है। अंग्रेजी
कर्मवीर बनो - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 8 अक्टूबर, 2020
विधाता को क्यों कोसना जब कर्म पर हैं भरोसा विधाता ने सर्वांग सही सलामत दिए तो भाग्य पर क्यों रखते हो आशा...? बिना क
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2020
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं। जिनपर किया भरोसा वो ही बदल गए हैं।। हालात हैं बुरे तुम वो छोड़कर चले हो, अरमान
आओ इस धरा को हरित बनाएँ - संतोष ताकर 'खाखी'
  सृजन तिथि : जून, 2021
आओ इस धरा को हरित बनाएँ एक एक पेड़ से कर शुरुआत, आओ क़सम ये खाएँ, यह सिलसिला बारंबार अपनाएँ, आओ इस धरा को हरित बनाएँ।
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2020
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं। जिनपर किया भरोसा वो ही बदल गए हैं।।
आने वाला कल अच्छा है - रमेश चंद्र बाजपेयी
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2020
मनसा, वाचा, कर्मणा से, सरसब्ज़ हैं आप, तो आने वाला कल अच्छा है। मन से परोपकार करना, मन से किसी दिल को सांत्वना देना, यह
जय हिन्द जय हिन्द की सेना - सतीश मापतपुरी
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
नहीं छोड़ना उस कायर को, सीमा पर जो चढ़ा सियार। आर-पार का करो फ़ैसला, मारो खींच गले तलवार।। सबक़ सिखाना होगा इनको, जो भारत
कर भला तो हो भला - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 6 जुलाई, 2021
"क्या हुआ मोहन, इतने उदास क्यों हो? तुम तो इंटरव्यू के लिए गए थे, क्या हुआ तुम्हारी नौकरी का?" -जाड़े के दिनों में मोहन
दे दे मुझको तेरा हाथ - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
ना मुझे धन दौलत, ना मुझे स्वर्ग चाहिए। साथ रहो बस तुम मेरे, ऐसा प्यार भरा पल चाहिए।। नयनों में बसे हो बस एक दूजे के
फ़रमान करें तो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 1983
आओ हम संधान करें तो। सिर चढ़ता अभिमान करें तो।। गर नायाब ग़ज़ल लिखना है, रुक्न, बहर, अरकान करें तो। पैसों की लालच
वक़्त सुन कुछ बोलता है - अनिल मिश्र प्रहरी
  सृजन तिथि : 2020
हर क़दम निर्भय बढ़ाना, दृष्टि मंज़िल पर गड़ाना, राह की उलझन अमित से मन विकल क्यों डोलता है? वक़्त सुन कुछ बोलता है।
कैसी दुनिया - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 8 जुलाई, 2021
ईश्वर कैसी दुनिया है तेरी, यहाँ रोते लोग हज़ारों हैं। मंदिर में छप्पन भोग लगें, प्रभु फल मेवा भण्डारे चुगें, तरसते
किरदार - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 2 मार्च, 2021
असली किरदार को कोई जानता नहीं, नक़ली किरदार के चर्चे बड़े हैं। सच्चे ग़रीब की कोई मानता नहीं, झूठे अमीर के साथ खड़े ह
एकता की शक्ति - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 27 जनवरी, 2021
मैं हूँ साथ खड़ा तेरे, फिर डरने की क्या बात, हौसला उम्मीद से कर लेंगे, ये नौका भी पार। तू बन तो सही हिम्मत मेरी, कर थोड़
समय प्रबंधन - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 1 फ़रवरी, 2021
मैं बहुत व्यस्त हूँ, या मेरे पास समय नहीं है, क्या ये वाक्य हमारे जीवन में बाधक है? यह एक बहुत ही दिलचस्प सवाल और समस्
कामयाबी का परिणाम - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 1 जुलाई, 2021
एक छोटे से गाँव की बात है जहाँ चरनदास का परिवार रहता था जिसके दो बेटे राम और श्याम थे। राम और श्याम की माता कमला देवी
वह तो झाँसी वाली रानी थी - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 18 जून, 2021
चलो सुनाऊँ एक कहानी जिसमें एक रानी थी, मुख से निकले तीखे बाण वो शमशीर दिवानी थी। थी वो ऐसी वीरांगना उसकी शौर्य भर
सावन की बरसात - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
आया बरसात का मौसम झूमले, बादल आए झूम झूमके और बादलों को चूमले। ऋतु बदली गया ज्येष्ठ आषाढ़ साल का था इंतज़ार माह बद
लेखनी - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 16 जुलाई, 2021
उम्र के इस गुज़रते पड़ाव में, लिखना जब शुरू किया मैने। लेखनी से हुई दोस्ती मेरी, ज़िंदगी का नया रूप जिया मैने। भावों
निशा चुभाती ख़ंजर - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 14 जुलाई, 2021
प्रेम रस में तेरे, भीगा मेरा मन। तुम हो प्रिये, साहित्य की रतन।। शब्दों की तुम, पिरोई हो माला हो। साहित्य की तुमन
भोर की प्रतीक्षा में - प्रवीण श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2020
सुधा गृह कार्य से निपटकर आराम करने की ही सोच रही थी कि अचानक किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी। मन ही मन कुढ़ती हुई सुधा दरवा
माँ - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
माँ ने मुझे जना, माँ ने मुझको पाला। माँ ने रखा मुँह में मेरे, भोजन का प्रथम निवाला।। माँ ने आँचल में ढककर, है मुझक
अनेकता में एकता - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 26 फ़रवरी, 2021
आओ यारो फिर से, आदर्शवादी स्वरूप की, शृंखला से जुड़ जाएँ। लोकाचारी निर्मित करके, एक नई कहानी लिख जाएँ। हर वक़्त की कश
माँ की परिभाषा - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 16 जुलाई, 2021
वह पढी लिखी नहीं, लेकिन ज़िंदगी को पढा है। गिनती नहीं सीखी लेकिन, मेरी ग़लतियों को गिना है।। दी इतनी शक्ति हर जिव्हा
हिन्दी मेरी पहचान - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2020
आज हिन्दी है तो अपनी बात रख पाता हूँ, अंग्रेजी नहीं आती तो कहाँ पछताता हूँ। अपनी कहूँ तुम्हारी सुनूँ ये हुनर हिन्द
माँ की ममता - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 5 मई, 2021
तुम्हारे हर रुप को मेरा वन्दन है माँ, तेरे इन चरणों को मेरा प्रणाम है माँ। माँ तू ही यमुना और तुम ही जमुना, तुम ही गं
सुन लो सारे - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 20 मई, 2021
रफ़ कॉपी में रंग रखों तुम अब मुक़म्मल सारे, तुम्हें लिखना होगा पढ़ते रहना होगा गरचे स्कूल बंद हो सारे। रूह के लिबाज़
मोगरे का फूल - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 28 अप्रैल, 2021
चश्म-ओ-गोश के तट पे चिड़िया चहचहाने आई, रिज़्क़ लाज़िम हैं, उठ ना, बख़्त कहता है। अब तक ना सजी मिरी सुब्ह-ओ-जीस्त, बग़ैर ति
हालात - दीपक राही
  सृजन तिथि : मई, 2021
मौजूदा हालात का, क्या हम ज़िक्र करें, जो आने वाला है, उसकी फ़िक्र करें, पार्क भी यहाँ शमशान बने, पानी में है लाशें बहे
मददगार - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 5 मई, 2021
वर्तमान में समय और माहौल विपरीत है, हर ओर एक अजीब सा ख़ौफ़ फैला है, ख़ामोशी है, सन्नाटा है कब क्या होगा? किसके साथ होगा?
हमारी राय शुमारी अगर ज़रूरी है - दिलशेर 'दिल'
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2020
हमारी राय शुमारी अगर ज़रूरी है। हमे भी मुल्क की रखनी ख़बर ज़रूरी है।। हरा भरा हो अदब का चमन हमारा तो, हमारे घर में सुख़
हौसला - समुन्द्र सिंह पंवार
  सृजन तिथि : 14 जनवरी, 2021
ना रहता सदा अँधेरा, नित होता नया सवेरा, नित होती है प्रभात, और नित बदल रहे हालात। कर हौसले के साथ, अपनी ज़िंदगी की शुर
अपनों का साथ - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 30 नवम्बर, 2020
साथ अगर हो अपनों का, ये सौग़ातें क्या कम हैं, ख़ुशियाँ दूनीं हो जातीं, साथ में तुम और हम हैं। रिश्ता लम्बा रखना हो तो,
एक मुलाक़ात ख़ुद से - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 12 मई, 2021
औरों से तो सब मिलते हैं, ख़ुद से न होती मुलाक़ात। आज ख़ुद को ख़ुद से मिलाया, यह भी हुई नई एक बात। औरों का साथ ढूँढता हर को
मनोहर पहाड़ - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 5 मार्च, 2021
हरियाली के आँचल में बसती चलती साँसें मेरी, सुखद, शीतल समीर में उड़ती जाती आशाएँ मेरी। मनोहर पर्वत पहाड़ों में बस
नज़रिया - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : जून, 2009
बदल दिया नज़रिया इंसानों ने सोचने का, सही और ग़लत को ना पाए समझ, जब सामने थी अपने मंज़िल, तो भूल चुका था मंज़िल पाने का रा
साहित्यकारों की हर एक रचना... - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 19 जुलाई, 2021
साहित्यकारों की हर एक रचना, उनकी बेशकीमती सम्पत्ति व एक उपलब्धि है।
एक तुम जो छेड़ दो - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 2021
एक तुम जो छेड़ दो हज़ारों तरंगे उत्पन्न हो जाए ह्रदयतल में, तुम जो करो निगहबानी शत् शत् कमल दल खिले अन्त:तल में, अपने
मेरे पापा - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 20 सितम्बर, 2019
शान मान और अभिमान हैं पापा। मेरे जीवन की पहचान हैं पापा। पापा है तो हर सपने अपने, हर मुश्किल का आसान हैं पापा। जर ज़
अपनी अनुभूति - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 2017
बदहवास है हवा की झोंके, यह ज़िंदगी के उलझे हुए नशा, यह संसार के अभावनिय स्थिति, और मनुष्य के मन में भरी हुई अनगिनत चाह
तुम मानव बनना भूले हो - मनोज यादव 'विमल'
  सृजन तिथि : 2016
तुम प्रश्न करना भूले हो, तुम संवेदना को भूले हो। तुम्हे इल्म नही इतना सा की तुम हुक़ूक़ माँगना भूले हो।। तुम सच बोल
वसुंधरा - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 1 अप्रैल, 2021
आसमान रूठ गया, हुई धरती लहूलुहान। जानवर भी रो रहें, पेड़ हुए निष्प्राण। पहाड़ मिट रहें, सुख रही नदियाँ। जाने कहा
रुक ना जाना तू कहीं हार के - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 14 अप्रैल, 2011
जीतता चल राह के हर दंश को तू मारके, रुक ना जाना तू कहीं हार के। तेरी मंज़िल तुझमें है ये तू जान ले, वीर तुझसा नहीं है ज
यारों कोशिशें भी कमाल करती है - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 27 मार्च, 2016
यूँ ही नहीं मिल जाती मंज़िल, सिर्फ़ एक पल भर सोचने से, इंसान की कोशिशें भी कमाल करती हैं, यूँ ही नहीं मिलती रब की मेहरब
नव वर्ष किरण - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 1 जनवरी, 2021
नव नूतन आशा रश्मि बिखरी दिशि चहुँओर, क्षितिज से आई सलज्ज मनभावन सी भोर। प्रफुल्ल उल्लिसित होकर तन मन महक उठा, नई र
प्यार वही है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : मई, 2009
टूट गई तलवार मगर धार वही है, छूट गई मुलाक़ात मगर प्यार वही है। ऐसा कोई संयोग कहाँ, जिसमें छुपा वियोग न हो मिलता उसे
लॉकडाउन और बढ़ती बेरोज़गारी - संस्कृती शाबा गावकर
  सृजन तिथि : सितम्बर, 2020
क्या कोरोना के फैलने के ख़ौफ़ से देशभर में लॉकडाउन की स्थिति पैदा कर बेरोज़गारी को जन्म दिया? दुनियाभर में फैले कोरोन
गाँव में नई सोच - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 2016
सीखा था जो शहर में सिखाना उसे चाहता हूँ, गाँव में एक नई सोच पैदा करना चाहता हूँ। पढ़े बेटा बेटी भविष्य उनका सँवारना च
डगमगाते क़दम - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 12 जून, 2019
मैने डगमगाते क़दमों को देखा है, उन बूढ़ी हड्डियों  को लाठी का सहारा लेते देखा है। पाल-पोसकर बड़ा किया जिस औलाद को
गुरुवर की महिमा - संतोष ताकर 'खाखी'
  सृजन तिथि : 23 जुलाई, 2021
मस्तिष्क के कोने कोने में ज्ञान से रिक्त को, ह्रदय के क़तरा क़तरा भाव से रहित को, कर ज्ञान भाव से युक्त एक सार्थक उत्प
यूँ न खेला करो दिल के जज़्बात से - सतीश मापतपुरी
  सृजन तिथि : 1975
यूँ न खेला करो दिल के जज़्बात से। ज़िन्दगी थक गई ऐसे हालात से।। रोज़ मिलते रहे सिर्फ़ मिलते रहे, अब तो जी भर गया इस मुल
आप भी आ जाइए - सतीश मापतपुरी
  सृजन तिथि : 1976
कब तलक मैं यूँ अकेला इस तरह जी पाऊँगा। इस निशा नागिन के विष को कैसे मैं पी पाऊँगा। इस ज़हर में अधर का मधु रस मिला तो जा
नाम लिखा दाने-दाने में - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 21 जुलाई, 2021
नाम लिखा दाने-दाने में। लुत्फ़ मिला करता खाने में।। सात सुरों की उड़ती खिल्ली, रेंक-रेंक कर है गाने में। उनने उल
प्रेयसी के प्रति - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 6 सितम्बर, 2020
प्रेम का सुखद पल अच्छा था! उन क्षणों में; जब मैं पास होता, बिल्कुल पास। बातों ही बातों में सब कुछ लुटा देता अपना ज्
मित्रता - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 15 अप्रैल, 2010
जीवन में ग़म बहुत है, लेकिन है इक बात। सारे ग़म कट जाते हैं, यदि हो मित्र का साथ। यदि हो मित्र का साथ, सुख दुःख में काम
आम आदमी और कोरोना - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : मई, 2020
यह जीवन जितना दुर्लभ है उतना ही जीना दुष्कर। हमारा देश विगत दो सालों से जिस विषम परिस्थितियों से गुज़र रहा है, उसका
ओटीटी (ओवर-द-टॉप): एंटरटेनमेंट का नया प्लेटफॉर्म - सलिल सरोज
  सृजन तिथि : 22 जुलाई, 2021
ओवर-द-टॉप (ओटीटी) मीडिया सेवा ऑनलाइन सामग्री प्रदाता है जो स्ट्रीमिंग मीडिया को एक स्टैंडअलोन उत्पाद के रूप में पे
गुरु का महत्व - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 24 जुलाई, 2021
जल जाता है दीये की तरह जीवन रोशन कर जाता गुरु। ख़ुद रखे अँधेरा दीपक की तरह जीवन को प्रकाशित करता गुरु।। सड़क की तरह
संशय के दरवाज़े - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 5 दिसम्बर, 2019
आँखें- सपने बग़ैर भग्न खंडहर लगतीं हैं। समय उलूक सा आज बोल रहा। संशय के दरवाज़े खोल रहा। उम्मीदें भी मन को- इक ठगि
चाँद से चेहरे को तारों से सजा रखा है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2021
चाँद से चेहरे को तारों से सजा रखा है। अपने प्रियतम को पलकों में छुपा रखा है।। भूल न पाऊँगा तुझको किसी भी सूरत में,
पतंग की उड़ान - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 23 जुलाई, 2021
पतंग भरती जैसे उड़ान, बढ़ेगा वैसे मेरा मान। सफलता मेरे पंख होंगे, खुला होगा मेरा आसमाँ।। इरादे मेरे बुलंद होंगे,
सुन री हवा तू धीरे चल - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 14 जून, 2021
सुन री हवा तू धीरे चल उसके सर से दुपट्टा सरक रहा है... सज सँवरकर निकली है वो यहाँ सारा चमन महक रहा है। सौन्दर्य ऐसे
तुम ही हो - गौतम कुमार कुशवाहा
  सृजन तिथि : 25 मार्च, 2020
तुम ही अरमान हो मेरी, तुम ही जान हो मेरी। तुम ही दुश्मन, तुम ही दोस्त, तुम ही सारा जहान हो मेरी।। मेरे आँखों का तारा
प्रकृति संरक्षण - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2021
सुन बदरा रे! हैं विकल जीव सारे, शिथिल सब थके हारे। तप्त हलक अधरा रे! सुन बदरा रे! सूखे ताल-तलैया, अब कौन ले बलैया?
सत्य - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2020
प्रेम राग बनी रहे, हर हाल में सच बोलिए। बात से कब क्या घटे, तकरार में रस घोलिए।। आसमाँ झुकता रहा, उस व्यक्ति के पग मे
पूनम की चाँद - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2020
सुहाग सेज पर बैठी, जब पूनम की चाँद। तब पूरी हुई मेरी, वर्षो की फरियाद।। आज जगत निहार रहा, कौन धनी है यार। घनी अमावस क
व्यथा धरा की - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2020
चीख़ रही धरती। कौन सुने विनती।। दोहन शाश्वत है। जीवन आफ़त है।। बाढ़ कभी बरपा। लाँछन ही पनपा।। मौन रहूँ कितना!
इंतज़ार - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2020
ग़ज़ब की छुअन थी रोमांचित था तन-मन, हया आँखों में थी आग दोनों तरफ थी। चुप्पी थी फिर भर न जाने क्यूँ हम दोनों रुके थे
वो बारिश का दिन - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2021
वो बारिश का दिन, रहे लवलीन, काग़ज़ी नाव, अच्छे थे। हम बच्चों का दल, देखते कमल, लड़ते थे पर, सच्चे थे।। लड़कपन थी ख़ूब, कीच
इन वादियों में - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 2021
इन वादियों में आकर दिल मेरा बहल गया, बहार देखकर हर तरफ़, मेरा मन मचल गया। इन वादियों में... रंग बिरंगे पुष्पों को चूम त
गुरु - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 24 जुलाई, 2021
गुरु अपने सभी शागिर्दों पर रहमतें बरसाता है अगरचे ज़ुबाँ से बरसे या मास्टरजी के दिव्य डंडे से। जिसने ये ईल्म, नेमते
एक वृक्ष की पीड़ा - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : मई, 2021
मैं वृक्ष हूँ। प्रकृति का फेफड़ा हूँ, मैं निःसंदेह निःस्वार्थ भाव से प्रकृति के संचालन में अनवरत अथक संघर्ष करता ह
विश्वगुरु बनने की राह पर भारत - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 12 जुलाई, 2021
भारत सदा ही विश्वगुरु रहा है जिसका केंद्र बिंदु आध्यात्म रहा है। अध्ययन, आराध्य और आध्यात्म का समायोजन भारत को फिर
डर ही डर - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 25 जुलाई, 2021
कोरोना का आतंक अभी कम हुआ नहीं, कि शुरू हो गया, कुदरत का ये द्वितीय क़हर है। गाँव हो या शहर, नदी या नहर, फँसी ज़िन्दगी, ड
नयापन की तलाश - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : दिसम्बर, 2020
मानव हैं हम हमें थोड़ा नहीं कुछ अधिक चाहिए रिश्ते अब हो चुके हैं पुरानी इसमें हमें परिवर्तन चाहिए...!! आज जो हैं उ
साक्षी हो कर भी मुकर गए - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 19 जुलाई, 2019
साक्षी हो कर भी मुकर गए, ज़मीर पल में क्यों बिसर गए। माँ-बाप भगवान लगते थे, आँखों से अब क्यों उतर गए। विडियो बनाने म
शुरू नॉविल किया पढ़ना लगा वो रहबरी वाला - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
शुरू नॉविल किया पढ़ना लगा वो रहबरी वाला, सफे दो चार पलटे थे कि निकला रहज़नी वाला। गुज़ारिश है यही चश्मा हमें धुँधला क
मेरा सफ़र भी क्या ये मंज़िल भी क्या तिरे बिन - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 27 अप्रैल, 2021
मेरा सफ़र भी क्या ये मंज़िल भी क्या तिरे बिन, जैसे हो चाय ठंडी औ तल्ख़ यूँ पिए बिन। दीद बिन आपके मेरी ज़िंदगी तो जैसे, यू
हक़ हैं हमें भी कहने दो - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 30 जनवरी, 2021
हक़ हैं हमें भी कहने दो, बेटी हूँ हमें भी शान से जीने दो। हम भी करेंगे ऊँचा काम मत रोको हमें, आगे बढ़ने दो, बेटी हूँ
गहराई ज़िंदगी की - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 18 अगस्त, 2018
ज़िंदगी खेल नहीं है, जितना सरल दिखती है, उतनी ही कठिन, प्रतीत होती है। हर वक़्त दिखता, जो गहरा समंदर है, कभी उलझो तो, क
मेहनत के साथ स्मार्ट वर्क ज़रूरी - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 24 अक्तूबर, 2019
दोस्तों यह बहुत ही अच्छा और उचित सवाल है कि मेहनत तो हम बहुत करते हैं, लेकिन हमें मन मुताबिक़ सफलता का परिणाम हासिल न
ज़िंदगी के रूप रंग - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 29 मार्च, 2021
हर एक के लिए अलग रूप है ज़िंदगी किसी के लिए यह जन्नत है तो किसी के लिए जहन्नम है ज़िंदगी...! जहाँ बेरोज़गार के लिए रोज़गा
ख़ुशबू के जाम - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2020
नदिया के घाट पर मेले की धूमधाम। लहरें मेले की ले रहीं बलैंया। औरतें घूमतीं शिशु को ले कैंया।। है चहल-पहल मेले की
जमकर भड़के हैं - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 30 नवम्बर, 2019
हरी भरी ज़रख़ेज़ भूमी, लीलतीं सड़कें हैं। हाइवा-डंपर जो हाईवे में चलते। धुँए से गाँव के परिवेश को छलते। साँप रेंगत
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 25 जुलाई, 2021
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे, आज हसीनों पर शे'र कहेंगे। ज़िक्र क़यामत का होगा तो हम, उसकी अदाओं पर शे'र कहेंगे। ज़िक्
मेरा सावन सूखा सूखा - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 27 जुलाई, 2021
विरह व्यथा की विकल रागिनी, बजती अब अंतर्मन में। कितनी आस लगा बैठे थे, हम उससे इस सावन में। बरस रहे हैं मेघा काले फि
मिलन - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 26 जुलाई, 2021
सावन ने ली जब अँगड़ाई, तब सुधि आई है मधुकर को। चौंक गई मैं उन्हें देखकर, लौटे पिया अचानक घर को। प्यासी नज़रें सबसे च
मान लो यार हमें नशा होगा - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : मई, 2021
मानलो यार हमें नशा होगा, बे-ख़ुदी में ख़ुदा कहा होगा। कल को नस्लें नई ये सोचेंगी, आदमी किस तरह रहा होगा। राज़ खोलें अ
बात पुरानी ताने मार रही है - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 3 जून, 2021
बात पुरानी ताने मार रही है, याद किसी की ताने मार रही है। मेरे अंदर चीख़ रही ख़ामोशी, और उदासी ताने मार रही है। फैल गई
रिश्तों के मोल घट गए - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 5 नवम्बर, 2020
एक खोली थोड़ा दु:ख था, सबका साथ बड़ा सुख था। माता-पिता और भाई-बहन हँसता खेलता परिवार बड़ा ख़ुश था ख़ूब कमाई धन दौलत, ज़िन
पर्यावरण और गाँव - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2020
योगी रोगी हो गए, कहाँ करे अब वास। दूषित पर्यावरण से, मुश्किल में है साँस।। अब कहाँ है पात हरे, सावन में भी पीत। मौसम
व्यथित मन - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 2021
हृदय और भी हो जाता व्यथित! जब सर्वस्व हारकर, जाता तुम्हारे समीप; कर देती कंटकाकीर्ण, उर को मेरे अपने शब्दभेदी बाणो
प्रिये, अब तुम आ जाओ - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
तड़प रहा हृदय ये मेरा, सूरत तो दिखला जाओ। साँझ हो रही मन मधुबन में, प्रिये, अब तुम आ जाओ। कितने दिवस यूँ चले गए, कितन
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 29 फ़रवरी, 2021
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता, मेरा हर दिन का मनाना प्यारा नहीं लगता। आख़िर कौन-सी बात है जो नापसंद है
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 29 फ़रवरी, 2021
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता, मेरा हर दिन का मनाना प्यारा नहीं लगता।
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 25 जुलाई, 2021
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे, आज हसीनों पर शे'र कहेंगे।
बात पुरानी ताने मार रही है - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 3 जून, 2021
बात पुरानी ताने मार रही है, याद किसी की ताने मार रही है।
ख़ुद के दर्द से जाने कब से हूँ परेशाँ मैं - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : अप्रैल, 2021
ख़ुद के दर्द से जाने कब से हूँ परेशाँ मैं, नींद से गिला क्या कि रात भर नहीं आती।
मुस्कुराहटें हमारी तो अब हुनर की बात है - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 24 जून, 2021
मुस्कुराहटें हमारी तो अब हुनर की बात है, दर्द चीज़ है जो भी ये तो उम्र भर की बात है।
मेरा परिचय - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 28 जुलाई, 2021
वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, दिवस कैलेंडर शुक्रवार। मध्यरात्रि में हुआ अवतरित, हर्षित हुआ पूरा परिवार।। सवा मन ल
राखी भेजवा देना - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 1 अगस्त, 2021
बहन राखी भेजवा देना, अबकी ना मैं आ पाऊँगा। काम बहुत हैं ऑफिस में, मैं छुट्टी ना ले पाऊँगा।। कलाई सुनी ना रहें मेरी,
बुढ़ापा - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 18 अगस्त, 2020
तलवे घिस गए आने जानें में, उम्र गुज़र गई जिसे कमानें में। ज़िन्दगी भर जो कमाई इज़्ज़त, अपनें ही लगे उसे गँवाने में। प
ज़हन होगा प्रखर अब तो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 12 जनवरी, 2020
ज़हन होगा प्रखर अब तो, सुहाना है सफ़र अब तो। यहाँ माहौल ऐसा है, सुख़न की है लहर अब तो। ख़ुशी से हैं लबालब पल, हुए उत्सव प
आज़ाद हिन्दुस्तान - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 20 जनवरी, 2021
यह ममता भरा देश हमारा, सबको प्यारा यह देश मेरा, विभिन्नता में एकता जिसका नाम है, हमारा देश यह भारत महान है। अपनी इस
लोरी - प्रवल राणा 'प्रवल'
  सृजन तिथि : 27 जून, 2020
मेरे लाल आजा सो जा, चंदा भी सो गया है। निंदिया बड़ी ही प्यारी तेरी राह तक रही है। तेरे इंतज़ार में तेरी माता भी जग रही ह
भ्रष्टाचार - प्रवल राणा 'प्रवल'
  सृजन तिथि : 2 जून, 2021
देश के सामने भ्रष्टाचार बहुत बड़ी समस्या है, भ्रष्टाचार के निषेध के लिए क़ानून है, लोगों को शिकायत भी करनी चाहिए। किन
जीवन - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
जीवन चक्र निरंतर चलता, एक-एक दिन घटता जाए। पैदा होते शिशु कहलाए, धीरे-धीरे बुज़ुर्गी पाए। अपना बचपन सच्चा बीता, म
अडिग हौसला - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 2 नवम्बर, 2017
थोड़ा सा धैर्य रखा यारो, और थोड़ा सा विश्वास, माना परिस्थिति थी कठिन पर मन में थी गहरी आस। वो आस मैंने टूटने नहीं दी
आईना ज़िंदगी का - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 3 अगस्त, 2018
हौसला है तो यारो, कुछ काम कर डालो, अपना वक़्त ज़िंदगी में, अपने नाम कर डालो। छोड़ दो ये दुनिया किसको क्या कहेगी, यदि
तुम बिन जीवन कहाँ मिलेगा - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 3 जुलाई, 2021
तुम बिन जीवन कहाँ मिलेगा, गुलशन सा मन कहाँ मिलेगा। पल में राज़ी फिर नाराज़ी, यह परिवर्तन कहाँ मिलेगा। यौवन के दिल म
ऐ घटा - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 27 जुलाई, 2021
ज़रूरत पर नहिं शक्ल कभी तुम दिखलाते हो, ज़रूरत नहिं जब, ज़बरदस्ती नभ घिर आते हो। जाने क्यों निज बल पर इतना इतराते हो।।
छोटे दलों का गठबंधन - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 28 जुलाई, 2021
यहाँ संख्या मंत्र, बने है यंत्र, इस लोकतंत्र, गीत चले। जैसी गति तेरी, वैसी मेरी, तेरी मेरी, मीत भले।। गठजोड़ ज़रूरी, क
विरह पीड़ा - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 2 अगस्त, 2021
विरह पीड़ा में तप रहा था, अंतः में अनुराग लिए। कब के बिछड़े आज मिले हैं, हम सावन में प्राणप्रिये। हाड़ कँपाती शिश
सुनो शिकारी - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 31 जुलाई 2021
पहले तुम शिकारी की तरह जाल फैलाते हो। मेरी मजबूरी का फ़ायदा उठाकर पैसा सूद पर देकर मुझे जाल में फँसाते हो।। ब्या
मैं - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 20 जुलाई, 2021
खोज रहा हूँ ख़ुद में ख़ुद को, न पाया कभी ख़ुद को खोज। न जाने कहाँ खो गया मैं? खोज ही रहा ख़ुद को रोज़। फँसा रिश्तों के भँवर
मेरी कविता - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 6 अप्रैल, 2021
मेरी कविता स्वअनुभूति है, सहानुभूति नहीं। यथार्थपरक है, मनोरंजनपरक नही। मेरी कविता झकझोरती, झूठी झूमती नही। सच
जीवन कुछ इस क़दर - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 28 अक्टूबर, 2020
जीवन कुछ इस प्रकार है कि वहाँ रहने के लिए ज़मीन है, छत के लिए आसमान है, खाने के लिए दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं, फिर भी, जी
सपनों के पंख फैलाओ - सुनील माहेश्वरी
  सृजन तिथि : 24 अप्रैल 2018
ज़िंदगी मेरी है यारो, तो उम्मीद भी मेरी है, इसलिए आगे बढ़ने की ज़िद भी मेरी है। कोई साथ हो ना हो, कोई साथ दे ना दे, हार अ
नव सृजन करो तुम - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 30 अगस्त, 2020
ख़ामोशी की तह में सिमट कर ना गुज़ारो ज़िंदगी, ग़ुंचा ग़ुंचा दिल खोलकर पुष्पों की तरह खिलो तुम। हँसते, गाते, खिलखिलात
एक बच्चे का मन - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 4 अगस्त, 2021
"माँ क्या कर रही हो" "कुछ नही बेटा, दादा तुम्हारे बूढ़े हो गए हैं और आज कुछ मेहमान आ रहे हैं, तुम्हारा जन्मदिन है बेटा।
सफ़र से हमसफ़र - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 5 अगस्त, 2021
ये सीट मेरी है, विजयवाड़ा स्टेशन पर इतना सुनते अमित ने पीछे मुड़कर देखा तो एक हमउम्र की लड़की एक हाथ में स्मार्ट फोन
आधुनिक भाई - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 29 मई, 2015
देखता हूँ, उन कृतघ्नों को, गले में शराब की बोतल उड़ेलते, भाग्य को सराहते, ख़ुशियाँ मना रहे हैं। याद आता है वह दुर्दि
जब तेरी याद आती है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 1 जून, 2012
जब-जब आँखें नीर बहाए, सपनों में तुझको न पाए। यही सोचकर घबराए, कि तू उससे कहीं दूर न जाए। हृदय ये भाव जगाती है, जब तेर
आज बोलता है - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
हे युग-पुरुष! ओ प्रेमचंद तेरी लेखनी के नींव पर है टीका हुआ हिन्दी साहित्य का मानसरोवर, जिसकी लहर से उठती उफान नव-ह
जोकर - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 19 नवम्बर, 2019
ठोकरें खाते गए और मुस्कुराते रहे, हम अपनी हिम्मत को आज़माते रहे! आदत ही ऐसी है हमारी तो साहब, हम दुश्मनों को भी गले लग
वो बुढ़िया - सलिल सरोज
  सृजन तिथि : 2020
वो बुढ़िया कल भी अकेली थी, वो बुढ़िया अब भी अकेली है। चेहरे की झुर्रियाँ पढ़ कर पता चलता है, उसने कितने सदियों की पीड़ा
चाहे जितने भी हों ग़म हम हँस लेते हैं - ममता शर्मा 'अंचल'
  सृजन तिथि : 13 जून, 2021
चाहे जितने भी हों ग़म हम हँस लेते हैं, पलक भले रहती हों नम हम हँस लेते हैं। दूरी में भी नज़दीकी के ख़्वाब देखकर, ख़ुशी-ख़ु
आया शहर कमाने था बरकत के वास्ते - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 19 जून, 2021
आया शहर कमाने था बरकत के वास्ते, लेकिन भटक रहे बद-क़िस्मत के वास्ते। कह के बुरा भला हमे बद-नाम कर दिया, ख़ामोश हम रहे थ
कर्मवीर मास्टर - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 15 जनवरी, 2020
मिरी मसर्रतों से गुफ़्तगू कर ज़ीस्त ने कुछ यूँ फ़रमाया हैं, ज्ञानमन्दिर में आकर हयात ने हयात को गले लगाया हैं। सोहबत
तेरा शैदा हैं कवि - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 2 मार्च, 2020
मेरा आशियाना ढूँढती हैं तेरी आँखों का जलना, आओ, देखना शब कहेगी इस घर में चाँद रहता हैं। निगाहों को जब से तेरा दीद
सावन पर भी यौवन - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 5 अगस्त, 2021
छमछम छमछम नाची है बरखा, झम झम बरसे रे पानी। देखो मिलन की रुत आई है, लिखने को प्रेम कहानी। मधुबन भी है मदहोशी में डूब
मौत का तांडव - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 1 अप्रैल, 2020
दिख रहा मौत का कैसा तांडव, हाय ये किसने क़यामत ढाया। बेबसी क्यूँ कर दी कुदरत तूने, हाय कैसा ये कैसा क़हर छाया। मौत क
प्रेम के रंग - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 12 मार्च, 2021
होली खेलें श्याम यमुना जी के तीर, सखी चल ना सही यमुना जी के तीर। राधा रानी संग रास रचावें, गोरे बदन मा रंग लगावें। स
अनुशासन से हो सोना कुंदन - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 25 मार्च, 2020
अपने आपको मना कर पाने की सामर्थ्य के साथ ही गरिमा की समझ पैदा होती है यही अनुशासन की सीढ़ी है, यही सीढ़ी बनाती है सोने क
याचना - प्रवल राणा 'प्रवल'
  सृजन तिथि : अगस्त, 2021
वेदना के इन स्वरों को एक अपना गान दे दो, भटके हुए जो राहों से उनको भी ज्ञान दे दो। हम चले हैं राह पर यूँ लड़खड़ाते हुए
सफलता का रहस्य - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
दूसरों की ख़ूब सुनिए, उस पर मनन भी कीजिए ख़ूब। बात जो हो अपने काम की, उसे याद भी रखिए ख़ूब।। जीवन की जंग में, इसका कीजिए
कोरोना - विजय कृष्ण
  सृजन तिथि : 2021
जगत विनाश करने को, मानव के प्राण हरने को, एक वायरस कही से आन पड़ा, कोरोना इसका नाम पड़ा। इसका स्वरूप विस्तार देख, उल
अनाथ बच्ची - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 18 जुलाई, 2019
मैं मासूम थी, नादान थी, हर बात से अंजान थी, मेरा क़ुसूर क्या था? जो तूने मुझे छोड़ दिया, मैं तो नन्ही सी जान थी। बोझ सम
बेटियों से जहान है - हरदीप बौद्ध
  सृजन तिथि : 2020
हम सबकी ऊँची शान हैं बेटी, दुनिया में सबसे महान हैं बेटी। बेटी ही मन का मीत है, जीवन का सुंदर गीत है। प्रेम करो सब ब
वही तो भारत मेरा है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 12 अगस्त, 2021
जहाँ आता बसंत-बयार, कोयल भी करती गुंजार। पपीहा की है पीन-पुकार, आल्हा की गूँजती झंकार। वही तो भारत मेरा है।। आदर्
बात तो कर लिया करो - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 26 जून, 2020
दूर ही सही प्रिये तुम कभी हमसे बात तो कर लिया करो। झूठा ही सही, मन रखने को, प्रेम से प्रेम का हिसाब कर लिया करो।। व्
चलो साथियो संग संग चलो - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 15 जून, 2020
चलो साथियो संग संग चलो, दीन दुखियों की गूँज बनते चलो। चलो साथियो... पहुँच गए हम चाँद सितारों तक, जो दब कर रह गए, उन्हे
सावन की घटाओं - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 21 जुलाई, 2021
सावन की घटाओं, धीरे धीरे बरसो। मंद मंद पवन संग, प्रीत का राग गाओ।। सजने लगी सुहागनें, हाथों में हरी हरी चूडियाँ, मे
गाऊँ कैसे प्रेम तराने - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 11 अगस्त, 2021
टूट गया जब दिल का दर्पण, दर्द भरा गुज़रा है हर क्षण, याद कभी उसकी आती तो, पड़ते अश्रु बहाने। गाऊँ कैसे प्रेम तराने! पी
हम ज़माना भूल बैठे दिल लगाने के लिए - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 15 अगस्त, 2021
हम ज़माना भूल बैठे दिल लगाने के लिए, माँग हम सिंदूर से उसकी सजाने के लिए। रूठना नखरे दिखाना ये तभी अच्छा लगे, पास जब
पंद्रह अगस्त - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : अगस्त, 2020
पंद्रह अगस्त सैंतालीस को, कैलेंडर दिवस था शुक्रवार। मिली इस दिन हमें आज़ादी, खुला अपने सपनों का द्वार।। आज़ादी के
इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 4 जून, 2021
इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी, आज जा के देखा मुहब्बत कितनी बची हुई थी। आपसे जहाँ बात फिर मिलने की कभी हुई थी,
उनकी अदाएँ उनके मोहल्ले में चलते तो देखते - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 8 जून, 2021
उनकी अदाएँ उनके मोहल्ले में चलते तो देखते, वो भी कभी यूँ मेरे क़स्बे से गुज़रते तो देखते। बस दीद की उनकी ख़ाहिश लेकर भ
तूफ़ानों से लड़ना सीखा है - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 11 अगस्त, 2021
अंदाज़ हमारा तीखा है, तूफ़ानों से लड़ना सीखा है। मेरा देश ज्वलंत रंग है, इसके आगे हर रंग फीका है। घर बैठा दुश्मन भी मे
वीर सपूत - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 17 जुलाई, 2021
वीर सपूतों का जज़्बा था वह, जो लड़ गए सीमा पर शत्रु से। अपने प्राणों की परवाह न कर, टूट पड़े सरहद पर शत्रु पे। हथेली
बचपन की यादें - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 10 अगस्त, 2021
यादें बचपन बड़ी सुहानी, जैसे बहता पानी धार। उछल कूद कर मौज मनाएँ, बच्चों का है ये संसार। बिचरण करते पंछी जैसे, बचप
संस्कार - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 17 जुलाई, 2021
आँखों में भर आए आँसू, मान सम्मान कहाँ से पाएँ। आजीवन संस्कार सिखाए, अंत समय पर काम न आए। तेरे मेरे ख़्वाब वही हैं, ज
शिक्षक - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 5 सितम्बर, 2020
प्रणाम उस मानुष तन को, शिक्षा जिससे हमने पाया। माता पिता के बाद हमपर, उनकी है प्रेम मधुर छाया।। नमन करता उन गुरुव
तिरंगे की आवाज़ - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 12 अगस्त, 2021
हमारा तिरंगा कह रहा, मैं भारत की शान हूँ, देश के वीर सपूतों का, मैं एक अनूठा आन हूँ। देश के शहीदों का, मैं एक ज़िन्दा म
अकेला आदमी - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 2012
एक बंजारा रहे अकेला, न थी उसको कोई फ़िकर। बस करता था अपना काम, न जाने उसको कोई इंसान। कभी-कभी जब सोचे वो, क्यों होता ह
ऐसा बन्धन रक्षा बन्धन - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 14 अगस्त, 2021
यह धागों का है एक ऐसा बन्धन, कहते है सब इसको रक्षा-बन्धन। अटूट प्रेम बहन-भाई का उत्सव, बहनें लगाती भाई तिलक-चंदन।।
माँ तुम कभी थकती नहीं हो - विजय कृष्ण
  सृजन तिथि : फ़रवरी, 2018
माँ तुम कभी थकती नहीं हो। सुबह से लेकर शाम तक, घर हो या दफ़्तर, सबके आराम तक, बैठती नहीं हो, माँ तुम कभी थकती नहीं हो।
संकट जगाता मानवता - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 11 मई, 2021
मानव पर जब संकट आता है, मानवता जाग जाता है। गली-गली या मुहल्ले हो बुरा वक़्त जब आता है। आँखों में खटकने वाला भी, आँखो
शान्ति की तलाश - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 27 जुलाई, 2021
ढूँढता रहा इधर से उधर, पनाह शान्ति का। ढूँढते-ढूँढते तन्हा रह गया, पर पता नहीं कहीं शान्ति का।। किसी ने कहा वन में
उपहार - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : अगस्त, 2020
आज रक्षाबंधन का त्योहार था। मेरी कोई बहन तो थी नहीं जो मुझे (श्रीश) कुछ भी उत्साह होता। न ही मुझे किसी की प्रतीक्षा म
जीवन की भूल - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 10 अगस्त, 2021
माना कि भूल होना मानवीय प्रवृत्ति है जो हम भी स्वीकारते हैं। मगर अफ़सोस होता है जब माँ बाप की उपेक्षाओं उनकी बेक़द्
कोयल करे मुनादी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 30 अक्तूबर, 2019
अमराई में कोयल करे मुनादी। महुआ, टेसू, सेमल डरे डरे। झरबेरी के कोई कान भरे। मानो पीपल बना हुआ है खादी। ख़ुशियो
वक़्त बहुत ही शर्मिंदा है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2 जनवरी, 2020
वक़्त बहुत ही शर्मिंदा है, आतंक अभी भी ज़िंदा है। फूल बहुत कोमल होता है, जैसे अब खार दरिंदा है। मैने जन गण मन से पूँछ
मुक्त आकाश - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 17 अगस्त, 2020
घनघोर वारिश के बीच कच्चे जंगली रास्ते पर भीगता काँपता हुआ सचिन घर की ओर बढ़ रहा था। उसे माँ की चिंता हो रही थी, जो इस व
रक्षा बंधन - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 22 अगस्त, 2021
कहने को तो रक्षा बंधन भाई बहन के स्नेह का त्यौहार है पर अध्यात्म रूप से देखें तो इस त्यौहार के दिन हम परमात्मा से उम
नारी - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 14 अगस्त, 2019
नारी सदैव देश, धर्म औ' आन परिचायिका। ममता, स्नेह वात्सल्य, दया, क्षमा साक्षात रूप। नारी नदी सी जीवनदायिनी है गति
भोला आदमी - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 2013
आदमी तू बड़ा भोला है, बात बोले बड़बोला है। अच्छाई-बुड़ाई में भेद न जाने, आदमी तू बड़ा भोला है। न जाने तू सच्चाई, बस कहे
शाम को छः बजे - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 23 अगस्त, 2021
अंततः अब मिलना है उनसे मुझे, आज तक़रीबन शाम को छः बजे, सोच मन विचलित दिल ये कैसे सहे, तीव्र गति धड़कन शाम को छः बजे। दृग
चिराग़ों तले ही अँधेरा मिला है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 20 मई, 2021
चिराग़ों तले ही अँधेरा मिला है, मिला जो भी भूका कमेरा मिला है। इमारत सदा ही बनाई हैं जिसने, उसे पुल के नीचे बसेरा मि
न शिकवा ना शिकायत लाज़मी है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 13 मई, 2021
न शिकवा ना शिकायत लाज़मी है, मुहोब्बत बस मुहोब्बत लाज़मी है। दरख़्तों को मुनासिब सख़्तियाँ भी, गुलों को तो नज़ाकत लाज़म
वर्षों बीत गए - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 2016
वर्षों बीत गए तुम्हारी याद में, डूबती नैना उमरता हृदय भावुक मन लिए। कहाँ जाऊँ? किसको सुनाऊँ? मन का विरहा मन को सु
हैवान - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 2016
इन भोली सूरत के पिछे, है हैवान बसा क्या है? तुझको पता। भोली सूरत काले नैना, है चाल मस्त मौला, दिन को है बेवाक वो घूमे
लड़कियाँ कहाँ गई - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 20 अगस्त, 2020
लड़कों के झुण्ड में एक बच्ची खेलती थी लड़के लड़की को हराने के लिए हथकंडे अपनाते थे, लड़की होने का ताना देते थे लड
बहुत प्यारी होती हैं बेटियाँ - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 12 जून, 2021
प्यार का पुष्पहार होती हैं बेटियाँ, बाप की दुलारी होती हैं बेटियाँ। घर का चिराग़ होती हैं बेटियाँ, फूल की ख़ुशबू होत
माँ फिर से वापस आ जाओ - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 8 अगस्त, 2019
हे! माँ फिर से वापस आ जाओ। लोरी मधुरिम कंठ सुना जाओ।। मात! दंतहीन, बलहीन हूँ मैं, अब अस्सी बरस का दीन हूँ मैं। बाँहे
नाज़-ए-हुस्न से जो पहल हो गई - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 24 अगस्त, 2019
नाज़-ए-हुस्न से जो पहल हो गई, मौत भी आज से तो सरल हो गई। मोहिनी कमल नयनी बँधी डोर सी, सर्पिणी सी लिपट मय गरल हो गई। इश
तुझसे इश्क़ इज़हार करेंगे - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 24 अगस्त, 2021
मिलन प्रिये जब तुमसे होगा, दिल की हम तुम बात करेंगे। नयनों से हम नयन मिलाकर, तुझसे इश्क़ इज़हार करेंगे।। इक दूजे का
राम पद वन्दन - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 17 जून, 2021
राम नाम बचा कलयुग में, जीने का एक सहारा। इसके बिन व्यर्थ है जीवन, चाहे वैभव हो सारा। पौरुष, बाहुबल या साहस पर, होता ल
नाव घाट लगी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 18 मार्च, 2021
नैतिकता की बात करें क्या मन में गाँठ लगी। कालोनी में मन-मुटाव का जंगल ऊगा है। मन में पश्चाताप लिए फिर सूरज डूबा ह
बुझा दिए जाते हैं वो दिये - कमला वेदी
  सृजन तिथि : 15 अगस्त, 2021
घने तिमिर में अकेले ही जलकर, जो चहुँ-दिशि रोशनी अपनी बिखेरते हैं, बुझा दिये जाते हैं अक्सर वो दिये, जो तूफ़ानों में ज
ग़रीबी - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 7 दिसम्बर, 2020
ग़रीबी में पैदा हुए, क्या ग़रीबी में ही मर मिटेंगे। कितने ख़्वाब लेकर आए थे हम इस जहान में, क्या इस अधूरेपन में ही दम
आओ मनाए ख़ुशियों का पर्व - आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
  सृजन तिथि : 2018
आओ मनाए ख़ुशियों का पर्व, झूमें गाएँ इसमें सब। आओ जलाएँ उन दियों को, जो वर्षो पहले बूझ चूके थे। वजह क्या था, ग़लती किस
ज़िम्मेदारी - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 25 अगस्त, 2021
फ़ैशन करना वो क्या जानें, जिनपर घर की ज़िम्मेदारी। क्या जाने हम नेक अनाड़ी, महँगा फोन अपाचे गाड़ी। नही गया होटल में खा
रक्षा बंधन - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 22 अगस्त, 2021
पावन जग में पर्व ये, मिले भगिनी दुलार। रक्षाबंधन प्यार का, सच्चा है त्योहार।। बड़े किए जिसनें करम, बड़ा मिले उपहार।
कृष्ण जन्माष्टमी - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 28 अगस्त, 2021
विष्णु के दशावतार कृष्ण हैं, भाद्रपद अष्टमी जन्म लिया। निशा स्याह रात बारह बजे, कारागार में अवतरण लिया। प्रहरी स
तुम बिन कौन उबारे - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 7 अगस्त, 2020
गोवर्धन धारी हे! कान्हा, बन जाओ रखवारे, हे! कृष्णा हे! मोहन मेरे तुम बिन कौन उबारे। हर कोई है व्यथित यहाँ तो अपने दुः
कान्हा - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 5 अगस्त, 2020
कान्हा कोई नाम नहीं, कोई व्यक्ति नहीं, कान्हा तो साक्षात परबृह्म हैं अजन्मा हैं अमर हैं अजर हैं। परन्तु वह जसुदा मइ
कृष्ण जन्माष्टमी - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 30 अगस्त, 2021
राधा गुनगुना रही मन में गान, सुना दो कान्हा मुरली की तान। जन्माष्टमी का दिन है आज, बज रहें मुरली, मृदंग और साज। हँ
न ग़ुरूर बड़ा न शोहरत और धन - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 2019
न ग़ुरूर बड़ा न शोहरत और धन, है सबसे बड़ा रिश्ता और अपनापन।
पूनम की रैन - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 30 अगस्त, 2021
बांडी की तरह लगते ज़हरीले गोल गोल मटमैले सुनहरे श्याम कैश, आँखें ठहर जाएँ, खुली की खुली रह जाए, ऐसे दिल पर आघात करत
मुकम्मल जहान हैं - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 27 फ़रवरी, 2019
मेहमाँ तिरे आने से जीवन में आया मिठास हैं, ये शादी का लड्डू जीवन में लाया उल्लास हैं। कहते हैं ये लड्डू जो खाए वो पछ
बदलता दौर - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 18 अप्रैल, 2020
सो गया हूँ मोबाईल में वेब सीरीज देखकर, जगा दे सुब्ह, वो मंज़िल की पुकार कहाँ है। वर्तमान तो पढ़ रहा हैं स्माईल-ओ-यूट्य
कविता की सच्चाई - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 18 अगस्त, 2021
कविता मन से रची नहीं जाती, कविता कभी सीखी नहीं जाती। ह्रदय से उत्पन्न हुए भावों‌ को, सिर्फ़ कलमबद्ध की जाती है। सुर
ख़ामोशी एक सदा - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 7 नवम्बर, 2019
ख़ुशियाँ मोबाईल हो चली, पीपल तले ख़ामोशियाँ मिली। बेमतलब की बातें इतनी हुई, नफ़रतों को इससे हवा मिली। राजनीति ने अब
कौन कहता है तुझे तू दीपकों के गीत गा - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : मई, 2021
कौन कहता है तुझे तू दीपकों के गीत गा, ज़ुल्मतों का दौर है तो ज़ुल्मतों के गीत गा। क्या ख़बर है फूल कोई खिल उठे इंसाफ़ का,
चराग़ों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : सितम्बर, 2019
चराग़ों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है, अँधेरा मिट नहीं पाया उजालों की सियासत है। जहाँ तू सर पटकता है वहाँ बस एक पत्
ऐसा मेरा संविधान है - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 1 अगस्त, 2019
हर रंग ख़ुद में समेटे यह एकता की शान है। भारतीयों का मान है ऐसा मेरा संविधान है।। 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का उपहार सुजान है।
कू-ए-बुताँ तक फिरूँ आराम-ए-जाँ की ख़्वाहिश लिए - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 20 अगस्त, 2021
कू-ए-बुताँ तक फिरूँ आराम-ए-जाँ की ख़्वाहिश लिए, वर्ना मैं निकलूँ भी तो घर से कहाँ की ख़्वाहिश लिए।
स्वीकार करें मेरा प्रणाम - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 14 फ़रवरी, 2021
हे! दिव्य शक्ति माँ सरस्वती स्वीकार करें मेरा प्रणाम, दिव्य गुणों को धारण कर बन जाऊँ मैं देव समान। हे! ज्ञानदायन
गंगा - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 14 जुलाई, 2021
भगीरथ की तपस्या का फल, शिव जटाओं के खुल गए बल। गंगा अवतरण हुआ धरती पर, प्रवाहित मोक्षदायी अमृत जल।। गंगोत्री हिमन
मेघा ऐसे बरसो रे - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : जुलाई, 2021
तन मन भीग जाए, मेघा ऐसे बरसो रे। सुध बुध भूल बैठूँ, मेघा ऐसे बरसो रे। घनश्याम श्वेत किसी भी रंग में आओ, मैं रंग जाऊँ उ
चिरैया का आशा संदेश - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : मई, 2021
ओ चिरैया, क्या संदेश है तेरा चीं-चीं से, क्यों जी रहा मानव होठ सीं-सीं के। मैं तो बेज़ुबान हूँ, फिर भी देखो, संदेश है मे
हुआ शंखनाद - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 13 अगस्त, 2021
देश पर आई विपदा गहरी, हुआ शंखनाद जागो प्रहरी। शत्रु बैठे निगाहें टिकाए, नित नए आतंक फैलाए, चुनौतियाँ बढ़ती ही जाए,
सावन - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 27 जुलाई, 2021
नीलाम्बर में श्यामल घटा छाई, सावन की पहली बौछार आई। जून की गर्मी से तपी धरती ने, शुष्क उष्ण उर में शीतलता पाई। इंद
विद्यालय जाना है - शमा परवीन
  सृजन तिथि : 1 सितम्बर, 2021
एक प्यारा सा गाँव था। उस गाँव मे प्यारा सा विद्यालय था। उस विद्यालय मे सोनू नाम का एक बालक पढ़ता था। वह प्रतिदिन वि
शिक्षक दिवस - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 3 सितम्बर, 2021
ज़िंदगी में सर्वप्रथम गुरु, हमारे माता पिता को नमन। उनके बाद आते शिक्षक, जिनका करूँ मैं अभिनंदन। "अ" से लेकर "अ:" तक, "
रोटी की तलाश - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 21 अगस्त, 2021
संसद अँधेरी गुफा बन गई है जहाँ से रोटी के लिए लगने वाली आवाज़, उसकी दीवार से टकरा कर वापस लौट आती है। सोचता हूँ वो
गोकुल की पहचान - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 30 अगस्त, 2021
गूँजे गोकुल की गली, बंसी तेरी शान। गिरधर केशव नाम से, गोकुल की पहचान।। मोर पंख सिर पर सजे, मुरलीधर है नाम। घूमें गो
मुश्किलों में मुस्कुराना सीख ले - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 17 अगस्त, 2021
मुश्किलों में मुस्कुराना सीख ले, और ख्वाबों को सजाना सीख ले। बेशरम है यदि यहाँ पर आदमी, इसलिए तूँ भी लजाना सीख ले।
गुरु महिमा - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 4 सितम्बर, 2021
गुरु ज्ञान की ज्योति अनोखी, अंतस फैला तिमिर मिटाए। अनगढ़ मूढ़ शून्य शिष्य को, सघन शून्य महत्व सिखाए।। दीपक जैसा ज
गुरु - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : 4 सितम्बर, 2021
शिक्षक वह जो करें मार्ग प्रशस्त, जिसके सीख से अज्ञान हो अस्त। जीवन को मिलता नव संगीत, वही सद्चरित और उन्नति का मीत।
गुरु की महिमा है बड़ी - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 5 सितम्बर, 2021
गुरु की महिमा है बड़ी, दूर करे अज्ञान। गुरु की वाणी है अमृत, मृत में फूँके जान।।
शिक्षक का सच्चा स्वरूप - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 3 सितम्बर, 2019
चरित्रवान शिक्षक बनने के लिए शिक्षक को अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान होना चाहिए। शिक्षक को चाहिए कि वह स्वयं के स्वर
गुरु - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 2 सितम्बर, 2021
धरती पर प्राणी का अवतरण, प्रथम गुरु मात पिता का वरण। अक्षर ज्ञान विज्ञान का प्रदाता, द्वितीय गुरु शिक्षक तेजवरण।
शिक्षक ही पंख लगाते हैं - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 5 जून, 2020
तम-तोम मिटाते हैं जग का, शिक्षक धरती के दिनकर हैं। हैं अंक सजे निर्माण प्रलय, शिष्यों हित प्रभु सम हितकर हैं। शुच
ग़मों में ज़िंदगी का क्या करेंगे - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 4 जनवरी, 2020
ग़मों में ज़िंदगी का क्या करेंगे, लबों की ख़ामुशी का क्या करेंगे। मुहब्बत डायरी में लिख चुके हैं, अमाँ अब शाइरी का क्
पिता और उनका अक्स - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : मई, 2021
कहता नज़र आता है जब हर एक शख़्स, पिता से ही मिलते हैं तुम्हारे नैन और नक़्श। बार-बार नज़र आता है मुझमें, मुझे पिता का ही
श्याम बिन राधा अधूरी - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 25 अगस्त, 2021
न जाओ छोड़कर मोहन, ये राधा रह न पाएगी। बहेंगे अश्रु आँखों से, अधर मुस्कान जाएगी। हुई क्या भूल मुझसे जो, दिया है ग़म हम
उड़े हौसले की उड़ान - आशाराम मीणा
  सृजन तिथि : 1 सितम्बर, 2021
हर क़दम मंज़िल खड़ी है, तुम चलो दो क़दम। जो ठहरा नहीं चलता गया, मिल गया उसे हमदम। रुकना नहीं झुकना नहीं, आगे रखो हर क़दम
मन में खटके बात - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 24 अगस्त, 2021
रीत यहाँ की देख के, मन में खटके बात। मनुज विवेकी कौन थे, जिसने बाँटी जात।। पीड़ा जग की देख के, मन में खटके बात। कौन कर
देशभक्ति - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 12 जुलाई, 2021
तीन रंग का झंडा अपना, भारत माँ की शान है। कण-कण में ख़ुशहाली महके, भारत देश महान है। मर मिटने का जज़्बा सबमें, बलिदान
अमर जवान - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 12 जुलाई, 2021
सरहद पर हैं मुस्तैद फ़ौजी, सोए जनता चैन। आधा सोए आधा जागे, हैं सीमा पर नैन।। कभी नहीं धीरज खोता है, गर्मी ठंड बरसात। क
कड़वी बात न बोलिए - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
कड़वी बात न बोलिए, हो जाते हैं घाव। मधुर वचन बोलें सदा, पार लगेगी नाव।।
दंभ न कर तू जाति का - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
दंभ न कर तू जाति का, लाल सभी का रक्त। मेल-जोल सबसे करें, क्षण भर का है वक़्त।।
अपना-अपना राग है - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
अपना-अपना राग है, अपनी-अपनी पीर। समाजसेवी जो करे, वो ही सच्चा वीर।।
ढाँढस देना सीख है - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
ढाँढस देना सीख है, सुने किसी के आह। चल पड़ती है ज़िंदगी, भरता है उत्साह।।
दीन अबलों की सुनिए - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 30 जुलाई, 2021
दीन अबलों की सुनिए, करूणामय विलाप। अंतः में सुकून मिले, और कटे संताप।।
द्रोपदी का चीर हरण - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 6 सितम्बर, 2021
द्युतक्रीड़ा में हार गए युधिष्ठिर, राज्य धन वैभव भाई बंधुवर। अंत में पंचाली दाँव लगाई, शकुनि चाल से मात खाए कुँवर
ख़्वाहिशें - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 7 सितम्बर, 2021
अंतहीन होती ख़्वाहिशें, अनकही दबी फ़रमाइशें। काश समझता दर्द कोई, झूठी हँसी की नुमाइशें। कलेजे में धँसा तीर सा, आँख
हसीन सपना - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 1984
तन्हा-तन्हा पेड़ों के साए तले, यादें तुम्हारी लेकर सपने हम बीने।। रुक-रुक के चलना चल-चल के रुकना मुड़ना कभी-कभी, सा
बहन-बेटियाँ - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 13 मार्च, 2021
बेटियाँ हँसती हैं तो घर की दीवारें करती हैं बात, बेटियाँ दो दो घर सँवारें, चलती हैं बात। बहन बेटियों के लिए हर सीने
चाँद मिरा हैं - कर्मवीर सिरोवा
  सृजन तिथि : 21 फ़रवरी, 2021
मुबारक़ हो आसमाँ, तिरे हिस्से में हो हुजूम-ए-अंजूम-ओ-चराग़, तिरे सीने में रहे आफ़ताब पर चाँद मिरा हैं हो गया आग़ाज़। उन
आज भी इंतज़ार है - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 3 मई, 2013
आज सुबह-सुबह अचानक; उनकी याद मस्तिष्क में, मेघों सा छा गई। वो लम्हें, मुझे विस्मृत करना चाहती थी। जिन्हें, मैंने स
अकेले में - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 18 अप्रैल, 2020
अकेलेपन की गहन निशा में, अनिमेष देखता हूँ एक सपना कि, डूब रहा हूँ गहरी खोह में; पाताल की गहराइयों में, धँसता, निष्प्
फिर से तुमको माँगूँगी - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 6 सितम्बर, 2019
आज कठिन व्रत धारण करके, फिर से तुमको माँगूँगी। नए जन्म के इंतज़ार में, जीवनपथ पर भागूँगी। जनम-जनम के तुम हो साथी, न
श्री गणेश चतुर्थी - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 9 सितम्बर, 2021
हाथ जोड़ वंदन करूँ, गौरी नन्दन गणेश। दुनिया भव बाधा हरो, हर लो‌ सकल क्लेश।। वक्र तुण्ड महाकाय प्रभू, सर्व देव आदि द
हिन्दी! तू भारत की गंगा है - पारो शैवलिनी
  सृजन तिथि : 1970
माँ गंगे की कोख से जन्म लिया मैंने भारत के धर्म, कर्म, ज्ञान और त्याग के उस चौराहे पर जहाँ हमने सीखा आगे बढ़ना मात
सन्नाटे का शोर - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 10 जुलाई, 2021
मध्यम हो रहा शाम को सूरज, पसर रहा अंधियारा शनैः शनैः, हो रही एक अजीब सी शांति, जंगल चारो ओर घने-घने। पेड़ करे गूँज स
कोकिला - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 17 अगस्त, 2021
बदली-बदली सी है आज, जाने क्यूँ कोकिला की आवाज़? प्रकृति की जर्जर होती हालत, ख़त्म हो रही हरी भरी वादियाँ, नदियों का दू
मानवता केवल मानवता - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : जून, 2021
जाति धर्म के क्यों पीछे है पड़ता, इसमे केवल नेता ही जमता, उसी को शोभित है दानवता। मेरे लिए तो एक ही धर्म है... मानवता...
सरस्वती वंदना - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
  सृजन तिथि : 10 अगस्त, 2021
माँ तेरे पैरों पर, शब्दों का फूल चढ़ाता हूँ। तेरे सम्मुख,‌ अपनी लेखनी अर्पित करता हूँ। ह्रदय से मैं तुझे, नमन बार-बा
नव यौवन - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 20 मई, 2019
नव यौवन की नवल राह पर, नवल स्वप्न की कलिका। नव्य नवेली नयन नशीली, नीरज मुख की मलिका। गज गामिनि वह दर्प दामिनी, कल-क
समदर्शी - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 23 जुलाई, 2013
सुख दुःख क्या? मन के विकल्प! इसी विचार से, कायाकल्प। समभाव रहे, जिसका मन। पाते रहे सुख, निज जीवन। रहे सदा खुश, अपना
सिर्फ़! मैं ही कहूँगा? - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 2 दिसम्बर, 2017
जब भी तुम्हें देखता हूँ; तेरी छवि पहले से मोहक लगती है। संशय होता है तुमसे बात करने में; भय लगता है, अपने प्यार का इज
दुःख और सुख - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 22 अगस्त, 2020
दुःख में ही तो सुख का महत्व ज्ञात होता है, दुःख में ही तो शत्रु, मित्र का पहचान होता है। दुःख में ही तो सुख का महत्व
दो पल की ज़िंदगी - मधुस्मिता सेनापति
  सृजन तिथि : 17 अगस्त, 2020
एक ख़्वाब है जो अक्सर अधूरा होता है, नई चाहत जग जाती है जब पिछला ख़्वाब पूरा होता है। आज जो नया हैं कल वह हो जाती है पु
बेबस ज़िन्दगी - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 17 सितम्बर, 2016
मूक हो के ज़िन्दगी, बहुत कुछ कह जाती है, कभी देती ग़म तो, कभी ख़ुशी दे जाती है। नहीं है पता इसका, कहाँ है ठिकाना, कहाँ इ
हिन्दी भाषा: दशा और दिशा - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 13 सितम्बर, 2021
हिंदी भाषा की आज दशा और दिशा, ज्यों दिवस संग मिश्रित हो जाए निशा। विविध देशज विदेशज भाषा का मेल, भाषा की ऐसी विकृति
हिंदी - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 21 अगस्त, 2021
हिंदी है हिंद की पहचान, है यह हिंद का गौरव। हिंदी हिंद की राष्ट्रभाषा, भाषा यह बड़ी ही सौरभ। हिंदी से मिलता अपनापन
हिन्दी से प्यार करो - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 12 सितम्बर, 2020
हिंदुस्तान के रहने वालों, हिंदी से तुम प्यार करो। ये पहचान है माँ भारत की, हिंदी का सत्कार करो। हिंदी के विद्वानो
हिंदी हमारे हिन्द की शान है - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : 13 सितम्बर, 2021
हिंदी ही हमारी मातृभाषा, हिंदी ही हमारी राष्ट्रभाषा, जननी संस्कृत से लेकर निकली, अपनी नई पहचान है। हिंदी हमारे हिन
हिंदी भाषा - गाज़ी आचार्य
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2021
भारत मेरा देश है, मिट्टी मेरी शान। कहो गर्व से देश की, हिन्दी है पहचान।। एक देश है विश्व में, भारत जिसका नाम। बसते ध
हिन्दी हमारी भाषा - राम प्रसाद आर्य
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2021
हिन्दी से सरल, सरस नहिं, है कोई अन्य भाषा। पढने, पढा़ने इसको, हर राष्ट्र लगता प्यासा।। इसमें बसी हमारी मानव संस्क
हिन्दी भाषा - सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2021
हिंदी की बिंदी ने कह दी, अक्षर अक्षर महत्व कहानी। हिंदी सुशोभित राजभाषा, स्वाधीन भारत की निशानी। हिंदी का सर्वोच
हिन्दी भारतीयों की चेतना है - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 13 सितम्बर, 2019
हिन्दी भारत की आत्मा है, हमारी पहचान है, हिन्दी को उपेक्षित कर शिक्षा का सर्वांगीण विकास अधूरा है। हिन्दी को मातृ भ
तू बन - संतोष ताकर 'खाखी'
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2020
तू किसी के ख़्वाबों की तावीज़ बन, शायरी बन, उसका मीर बन, उसका ख़ून भी लगे तेरे बिन बेरंग, दिल के हर ज़ख़्म को दे इक रंग, तू उ
विश्वकर्मा - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 16 सितम्बर, 2021
जग का किया निर्माण जिन्होंने, करता हूँ मैं आज उन्हे प्रणाम। दुःख संसार के हर लिए जिन्होंने, सुखी वसुंधरा का किया न
मजबूरी - समय सिंह जौल
  सृजन तिथि : 14 सितम्बर, 2021
अपने हाथ में डंडी लिए चुंबक उसमें बाँध लिए ढूँढ़ रहा कूड़े में टुकड़े लोहे के जैसे मछुआरा जाल बिछाकर पानी में छो
उड़ाने सभी आसमानो में है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 1 जनवरी, 2020
उड़ाने सभी आसमानो में है, आज पंछी सभी ठिकानो में है। आँगन में चुगते रहे सारा दिन, उनकी ज़िंदगी उन दानो में है। चुनाँ
काँधे पर चढ़ी धूप - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
पशु-पक्षी और पेड़ों ने जीवन में कितने रंग भरे। है दिवस के काँधे पर चढ़ी धूप। होगा सागर सरिताओं का भूप।। चलते हु
पर्दे के पीछे - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 17 सितम्बर, 2021
शास्त्री मैदान खचाखच भरा था हिंदी पर परिचर्चा चल रही थी। "हिंदी हमारी मातृभाषा है। इसका भाव सौंदर्य अप्रतिम है," वि
काश! ऐसा कोई जतन हो जाए - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 13 नवम्बर, 2020
काश! ऐसा कोई जतन हो जाए, जाति-धर्म का पतन हो जाए। फिर ना रहे आपस में भेदभाव, सारे जहाँ का एक वतन हो जाए। सभी में हो अपन
सीखें सिखाएँ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 25 अगस्त, 2021
ये हमारा सौभाग्य और ईश्वर की अनुकंपा ही है कि हमें मानव जीवन मिला, तो ऐसे में हम सभी की ये ज़िम्मेदारी है कि हम इस चार
श्राद्ध का भोजन - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 20 सितम्बर, 2021
कौआ बनकर मैं तुम्हारे घर की मुँडेर पर नहीं आऊँगा, अपने और पुरखों का सिर मैं झुकाने अब नहीं आऊँगा। मेरी ही कमाई से त
भटक रहे पाँव - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
सतरंगी इन्द्रधनुष बुन रहा आकाश। है मन ऐसे खिला-खिला जैसे पलाश।। बल्लियों सा उछलता है ये दिल। तय करना दूरी होता
हाँ मैं मज़दूर हूँ - पुनेश समदर्शी
  सृजन तिथि : 21 मई, 2021
रहता अधिकतर अपने परिवार से दूर हूँ, चिंता रहती घर के ख़र्चे की हाँ मैं मज़दूर हूँ। करता जी-हुज़ूरी मालिक की मेरा काम च
धन के सँग सम्मान बँटेगा - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : 19 सितम्बर, 2021
धन दौलत के लालच में, भाई भाई से युद्ध छिड़ा है। भूल के सगे रिश्ते नातों को, भाई-भाई से स्वतः भिडा़ है।। एक ही माँ की

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